Global Parenting Day: 'ग्लोबल डे ऑफ पेरेंट्स' पर जानिए कैसे बदलते समय, न्यूक्लियर फैमिली और भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच भी माता-पिता को प्यार, सम्मान और साथ दिया जा सकता है।
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उम्र बढ़ने के साथ माता-पिता को कैसे दें भावनात्मक सहारा?
- फोटो : AI
Global Parenting Day: माता-पिता जीवन की सबसे मजबूत नींव होते हैं। बचपन में जिन हाथों ने हमें चलना सिखाया, गिरने पर संभाला और हर मुश्किल में साथ दिया, उम्र बढ़ने के साथ वही हाथ सहारे की उम्मीद करने लगते हैं। माता-पिता सिर्फ हमारे जन्मदाता नहीं, बल्कि हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत और आशीर्वाद होते हैं। इसलिए उनका सम्मान, देखभाल और साथ देना केवल जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारा फर्ज भी है।
एक समय था जब बुजुर्ग माता-पिता पूरे परिवार के बीच खुशहाल जीवन बिताते थे, लेकिन आज की भागदौड़, न्यूक्लियर फैमिली (एकाकी परिवार), करियर प्रेशर और व्यस्त जिंदगी के कारण कई बार हम चाहकर भी उन्हें उतना समय नहीं दे पाते, जिसके वे हकदार हैं। ग्लोबल डे ऑफ पेरेंट्स हमें यह याद दिलाता है कि माता-पिता सिर्फ जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हमारे जीवन की सबसे बड़ी ताकत हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि हम उन्हें समय, सम्मान और अपनापन महसूस कराएं।
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- फोटो : Adobe stock
बदलते समय में बदलते रिश्ते
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में परिवार छोटे होते जा रहे हैं। काम, जिम्मेदारियों और करियर के दबाव के बीच माता-पिता के साथ समय बिताना मुश्किल होता जा रहा है। इसी कारण कई बुजुर्ग अकेलापन महसूस करने लगे हैं। अक्सर बच्चों के मन में माता-पिता के लिए प्यार और चिंता दोनों होती है, लेकिन रोजमर्रा की व्यस्तता, तनाव और जिम्मेदारियों के कारण चिड़चिड़ापन और दूरियां बढ़ने लगती हैं। ऐसे में रिश्तों को समझदारी और धैर्य से संभालना जरूरी हो जाता है।
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- फोटो : अमर उजाला
दूर रहकर भी तकनीक का सहारा
अगर आप माता-पिता से दूर रहते हैं, तो आज की तकनीक दूरी कम करने में मदद कर सकती है। वीडियो कॉल, वॉइस असिस्टेंट और स्मार्ट डिवाइसेस के जरिए आप रोज उनसे जुड़े रह सकते हैं। आजकल ऐसे स्मार्ट सेंसर्स और हेल्थ डिवाइस भी आ चुके हैं, जो माता-पिता की गतिविधियों और स्वास्थ्य की जानकारी ऐप के जरिए बच्चों तक पहुंचाते हैं। इससे दूर रहकर भी उनकी चिंता काफी हद तक कम हो सकती है।
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- फोटो : Adobe
'रिवर्स पेरेंटिंग' को जान लें
एक उम्र के बाद माता-पिता भी बच्चों की तरह देखभाल चाहते हैं। मेडिकल एक्सपर्ट्स इसे 'रिवर्स पेरेंटिंग' कहते हैं। इस समय उन्हें सबसे ज्यादा जरूरत प्यार, धैर्य और भावनात्मक सहारे की होती है। बुढ़ापे में अकेलापन कई बार एंग्जायटी और डिप्रेशन का कारण बन सकता है। अगर बुजुर्गों को यह महसूस हो कि वे परिवार का जरूरी हिस्सा हैं, तो उनका आत्मविश्वास और खुशी दोनों बढ़ते हैं।
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छोटे फैसलों में लें उनकी राय
घर के छोटे-छोटे फैसलों में माता-पिता की राय लेना उन्हें सम्मानित महसूस कराता है। चाहे घर के खाने का मेन्यू हो या बच्चों से जुड़ी कोई बात, उनकी भागीदारी उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत बनाती है। इसके अलावा आजकल स्मार्टवॉच और हेल्थ ऐप्स की मदद से माता-पिता की सेहत पर नजर रखना काफी आसान हो गया है। ब्लड प्रेशर, शुगर और हार्ट रेट जैसी जानकारी तुरंत मिल जाती है, जिससे समय रहते सावधानी बरती जा सकती है।
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क्वालिटी टाइम बिताएं
दिन भर की थकान के बाद माता-पिता के पास बैठकर पुरानी बातें सुनना बोरिंग लग सकता है। इसे बदलने के लिए 'माइंडफुल शेयरिंग' का तरीका अपनाएं। हफ्ते में सिर्फ एक दिन, मोबाइल फोन को बिल्कुल दूर रखकर, उनके साथ उनकी पसंद का कोई पुराना गाना सुनें या उनके बचपन की कोई कहानी सुनें। जब आप उनके अतीत में दिलचस्पी लेती हैं, तो उनके शरीर में 'ऑक्सीटोसिन' (हैप्पी हार्मोन) रिलीज होता है, जो उनकी शारीरिक तकलीफों को कम करने में दवा से ज्यादा असरदार साबित होता है।
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"यह उनका अड़ियल रवैया नहीं है"
डॉ. रचना खन्ना सिंह, रिलेशनशिप काउंसलर का कहना है कि अक्सर हम कहते हैं कि मम्मी-पापा हमारी बात नहीं समझते या वे बहुत जिद्दी हो गए हैं, लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि उम्र बढ़ने के साथ दिमाग में 'कॉग्निटिव शिफ्ट' (वैचारिक बदलाव) होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, दिमाग का आगे का हिस्सा सिकुड़ने लगता है, जिससे नई चीजों को सीखने और बदलावों को अपनाने में दिक्कत होती है। इसे एक मेडिकल बदलाव के रूप में देखें और उनके प्रति अपना व्यवहार लचीला रखें।