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स्कूल में बच्चे दादागिरी क्यों करने लगते हैं?

Sat, 05 Oct 2019 07:00 PM IST
नवनीत राठौर लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixa
बचपन में बहुत से लोग दादागिरी के शिकार होते हैं। कुछ बच्चे तो खुद ही ऐसे काम करते हैं। दूसरों को डराते-धमकाते हैं। हो सकता है कभी हमने भी, दूसरे बच्चों को बिना किसी बात के पीटा भी हो, या हमने खुद मार खाई हो। अंग्रेजी में इसे 'बुली' करना और हिंदी में 'धौंस जमाना' कहते हैं। स्कूल में बहुत से बच्चे ऐसे अनुभवों से गुजरते हैं। लेकिन जो बच्चे दादागिरी करते हैं, उन पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। डर उनके जहन की गहराइयों में बैठ जाता है। उनमें आत्मविश्वास और साहस की कमी हो जाती है। बच्चे तो मासूम होते हैं। फिर उनमें ये प्रवृत्ति कहां से पैदा हो जाती है?

यूनिवर्सिटी ऑफ नॉर्थ कैरोलिना की प्रोफेसर डोरोथी स्पेलेज का कहना है कि इस बारे में अभी तक जितनी रिसर्च हुई थी, उसके आधार पर माना जा रहा था कि बहुत आक्रामक स्वभाव वाले बच्चे ही इस तरह का बर्ताव करते हैं। ऐसा स्वभाव बनाने में घर का हिंसक माहौल भी अहम भूमिका निभाता है। ये ज्यादातर ऐसे बच्चे होते हैं जिन्हें घर में तवज्जो नहीं मिलती। लेकिन अब नई रिसर्च बताती है कि तस्वीर बदल रही है। नई रिसर्च के मुताबिक, दो ग्रुप या बच्चों के बीच आक्रामक टकराव में किसी भी तरह की ताक़त का असंतुलन होना शामिल है। नई रिसर्च ये भी बताती है कि हिंसक माहौल से आने वाले बच्चे को भी अगर स्कूल में अच्छा माहौल और प्यार मिले, तो उसमें आक्रामकता पनपने की आशंका काफी कम हो जाती हैं। इसमें एंटी बुलीइंग प्रोग्राम भी मददगार हो सकते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixa
भीड़ का लीडर बनना पसंद
रिसर्च के मुताबिक हाल के वर्षों में दादागीरी के मामले में बच्चे ज्यादा शातिर हो गए हैं। वो अब अपनी शख्सियत के इस पहलू का इस्तेमाल जरूरत के मुताबिक कूटनीतिक तरीके से करते हैं। आमतौर पर इन बच्चों का व्यवहार बहुत शालीन होता है। ये अध्यपकों की पसंद बन जाते हैं। लेकिन जब इन्हें जरूरत होती है, तो ऐसे बच्चे अपनी ताकत का इस्तेमाल कर दूसरे बच्चों पर धौंस जमाते हैं। प्रोफेसर स्पेलेज के मुताबिक़ इस तरह के बच्चे भीड़ का लीडर बनना पसंद करते हैं। एक अन्य रिसर्च इस बात पर जोर देती है कि डराने-धमकाने वाले बच्चे दूसरे बच्चों से ज्यादा खुद को तंग करते हैं। इटली और स्पेन में स्कूल के बच्चों को एक एक्सरसाइज कराई गई जिसमें उन्हें या तो किसी पर धौंस जमानी थी, या खुद पीड़ित होना था।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social Media
दूसरों पर दादागिरी करने वाले बच्चों का कहना था कि वो खुद ज्यादा प्रभावित हुए हैं। दूसरों को धमकाने के बाद वो खुद मानसिक पीड़ा से गुज़रे हैं। तकनीक के इस दौर में दादागिरी का तरीका भी बदल गया है। अब किसी को सामने से डराना-धमकाना या मारपीट करना ही एक तरीका नहीं है। अब साइबर बुलिंग भी होने लगी है। फर्क सिर्फ इतना है कि साइबर बुलिंग में किसी को बार-बार नहीं धमकाया जा सकता। क्योंकि एक बार सोशल मीडिया पर जो लिख दिया, तो वो एक ही समय में लाखों करोड़ों लोगों तक पहुंच जाता है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर
साइबर बुलिंग ज्यादा हो रही है
लेकिन कुछ रिसर्चर इससे इत्तेफाक नहीं रखते। मनोवैज्ञानिक कैली जानी-पेपेसी का कहना है कि स्कूल बुलिंग की तुलना में आज साइबर बुलिंग ज्यादा हो रही है। आज बच्चे क्लासरूम में भी स्मार्ट फोन लेकर जाने लगे हैं। उन्होंने अपनी रिसर्च में पाया है कि अगर बच्चे अगल-बगल बैठे हों, तो भी वो सोशल मीडिया के जरिए धौंस जमाते हैं। उन्हें लगता है कि ऐसा करके उन्हें ज्यादा लोग जान पा रहे हैं। उन्हें अपनी ताकत का एहसास होता है।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
अगर आपको पता चल जाए कि आपका बच्चा दूसरे बच्चों को बुली कर रहा है तो आपको क्या करना चाहिए?
सबसे पहले तो बच्चे के बर्ताव पर नजर रखनी चाहिए। अगर कहीं से उसकी शिकायत मिलती है, तो उससे प्यार से पूछना चाहिए कि वो ये सब कहां से सीख रहा है। वो ऐसा क्यों कर रहा है। ऐसा करके उसे क्या हासिल हो रहा है। साथ ही मां-बाप को अपने बर्ताव पर भी गौर करना चाहिए। कहीं जाने-अनजाने वो ऐसा बर्ताव तो नहीं कर रहे जिसका गलत असर बच्चे पर पड़ रहा है। स्कूल में ऐसे बहुत से बच्चे होते हैं, जिनके बर्ताव से दूसरे बच्चे डरते हैं। लेकिन अगर स्कूल में सभी बच्चों को मित्रता का माहौल दिया जाए, तो कोई भी बच्चा ना तो बुली करेगा और ना ही बच्चों के मन में भय पैदा होगा। स्कूल स्टाफ और शिक्षक इसमें अहम किरदार निभा सकते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
बुली करने वाले बच्चे बनते हैं पुलिस, वकील
रिसर्च के मुताबिक जिन स्कूलों में बच्चों में एहसास पैदा किया गया है कि स्कूल उनका है, वहां पढ़ने वाले सभी बच्चे उनके साथी हैं, वहां बुली करने वालों की संख्या बहुत कम पाई गई हैं। 2014 में स्पलेज और उनके साथियों ने पांच साल की रिसर्च प्रकाशित की थी। इसके मुताबिक स्कूल में की जाने वाली बुली और बाद की उम्र में किए जाने वाले यौन उत्पीड़न में गहरा संबंध है। कम उम्र बच्चों में बुली करने की प्रवृत्ति में समलैंगिकों के प्रति प्रबल घृणा शामिल होती है। जो आगे चलकर यौन उत्पीड़न में बदल जाती है। यहां यौन उत्पीड़न करने वाले और पीड़ित होने वाले दोनों ही बच्चों को नहीं पता होता कि वो कितना संगीन अपराध कर रहे हैं। शायद इसलिए भी कि स्कूल में टीचर्स उन्हें इसकी जानकारी नहीं देते। या जो बच्चे ऐसा बर्ताव करते हैं उन्हें रोकते नहीं। नजरअंदाज कर देते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर
रिसर्च तो ये भी बताती है कि जो बच्चे स्कूल में बुली करते हैं, आगे चलकर वो पेशा भी कुछ ऐसा ही चुनते हैं जहां उनका ये बर्ताव काम आ सके। जैसे पुलिस, वकील या यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर आदि बन जाते हैं। वहीं जो बच्चे बुली होते हैं, वो ऐसा पेशे चुनते हैं जहां वो दूसरों को ऐसे बर्ताव से बचाने में मदद कर सकें। लेकिन बुली होने का अनुभव ताउम्र उनके साथ साये की तरह रहता है।
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