पितृपक्ष कब से शुरू हो रहे हैं?
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इसके पीछे की परंपरा क्या कहती है?
हिंदू परंपरा में मनुष्य के जीवन को केवल वर्तमान पीढ़ी तक सीमित नहीं माना गया, बल्कि पूर्वजों से प्राप्त जीवन, संस्कार और पारिवारिक परंपरा से जोड़ा गया है। इसलिए पितृपक्ष को अपने दिवंगत पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और उनके नाम से धार्मिक कर्म करने की अवधि माना जाता है।
परंपरा में मुख्य रूप से ये बातें कही जाती हैं:
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श्राद्ध — 'श्रद्धा' से जुड़ा कर्म माना जाता है। इसका भाव पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करना है।
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तर्पण — जल आदि अर्पित करके पितरों का स्मरण किया जाता है।
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पिंडदान — चावल आदि से बनाए गए पिंड अर्पित करने की परंपरा है। इसके धार्मिक अर्थ अलग-अलग परंपराओं में कुछ भिन्न रूप में समझाए जाते हैं।
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दान और भोजन — ब्राह्मणों, अतिथियों या जरूरतमंदों को भोजन कराने और दान देने की परंपरा भी कई परिवारों में है।