आनन्दमूर्ति गुरुमाँ
संसार में परिवर्तन का एक प्रवाह चल रहा है। उस प्रवाह में वस्तुएं बनती हैं, रहती हैं और मिट जाती हैं। यह आण्विक तल पर संघटन-विघटन की प्रक्रिया प्रति क्षण हो रही है। हमारे शरीर में भी चयापचय की प्रक्रिया निरंतर चल रही है, जिसमें नए सेल्स बन रहे हैं और पुराने मर रहे हैं। उसी से शरीर का बनना, चलना और मिटना होता है। यही प्रक्रिया बाहर सारी वस्तुओं में भी हमको प्रतीत होती है। जब किसी वस्तु का विघटन होता है, तब एक नई सृष्टि का और एक नई वस्तु का सृजन भी होता है। इस सृजन के क्रम में उस वस्तु का कुछ काल तक टिकना और फिर उस वस्तु का विघटित हो जाना घटित होता है। इसी को हम संसार कहते हैं।
जहां संसरण होता है, वही संसार है। इस संसरण की प्रक्रिया, परिवर्तन की प्रक्रिया हमको न केवल भौतिक वस्तुओं में दिखाई देती है, बल्कि कालखंड में भी प्रतीत होती है। इसलिए इस कालचक्र से बंधे हुए सूर्य, चंद्रमा, ग्रह, नक्षत्र, पृथ्वी आदि और जीव, जंतु, मनुष्य आदि सब उस कालक्रम के हिस्से हैं, जिसमें ये सब कुछ बनता है, दिखता है और विघटित हो जाता है। हम विघटन को बुरा नहीं मानते और सृजन में कुछ विशेष आह्लाद की आवश्यकता नहीं होती है। यह एक सहज प्रक्रिया है, जो संसार में अनंतकाल से निरंतर चलती आ रही है। हर वस्तु का मरना, हर देह का मरना एक नए सृजन का द्योतक होता है।
सूर्य सृष्टि का प्राण है
मनुष्य ने अपनी सुविधा के लिए काल को दिन-रात, भूत-वर्तमान और भविष्य में बांट दिया, ताकि हम काल की गणना कर सकें। सूर्य के उदय से दिन और सूर्य के अस्त होने पर हम रात्रि का आरंभ मानते हैं। जैसे सूर्य का उदय होना प्रकाश और ऊर्जा को लेकर आता है, वैसे ही सूर्य का अस्त होना हम पृथ्वी वासियों के लिए एक दिन की समाप्ति का संकेत होता है। सूर्य अस्त होते-होते यह संदेश देता है कि मैं फिर उदित होऊंगा। सूर्य सारी सृष्टि का प्राण है। सूर्य अपनी रश्मियों को, ऊर्जा को, शक्ति को और किरणों को फैला देता है। सृजन सूर्य से है, प्राण भी सूर्य से हैं। क्षण, घंटा, दिन, रात्रि, सप्ताह, महीना और वर्ष इसका विभाग मनुष्य की बुद्धि ने किया है। सृष्टि में ऐसा कोई विभाग दिखाई नहीं देता, सहज नदी के प्रवाह जैसे काल बहता रहता है, लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि से इस काल को दिन-रात में बांट दिया, इसलिए नया दिन उत्साह से शुरू करता है, पूजा-पाठ से शुरू करता है, नाम स्मरण से शुरू करता है।
नए का आना नव सृजन
नया महीना चढ़ता है तो हमारे देश की परंपरा है कि हम उसको भी उत्साहित होकर मनाते हैं। ज्योतिष के अनुसार, भारत देश में नव वर्ष का आरंभ चैत्र मास से होता है। वहीं अंग्रेजी कैलंडर के अनुसार एक जनवरी से आरंभ होता है, जो हमारे सरकारी कार्यालयों में, स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी आदि में मनाया भी जाता है। इसी नाते 31 दिसंबर को वर्ष का अंतिम दिन होता है और एक जनवरी को नया वर्ष प्रारंभ होता है। वैसे तो कैलेंडर में तिथि बदलती है, लेकिन सूर्य तो रोज एक जैसा ही उगता है। रोज एक जैसा ही अस्त होता है और रात भी रोज एक जैसी होती है, लेकिन फिर भी इस बदलते हुए वर्ष का हम सहृदयता से स्वागत करते हैं। पुराने का जाना और नए का आना निश्चित रूप से प्रसन्नता, नव सृजन और नव चेतना का श्रीगणेश होता है।
इस नवीन वर्ष 2025 को हम लोग नई ऊर्जा, नई चेतना, अपार शक्ति, अपार बुद्धि, अपार रचनात्मकता के साथ बिता सकें, इसके लिए आत्ममंथन, अंतर्विचार करने की आवश्यकता होती है। नए साल के कुछ दिन चिंतन के लिए होने चाहिए। अभी तक जो कुछ करने में आप असमर्थ रही हैं, नव वर्ष के प्रारंभ में विवेकपूर्ण बुद्धि से आत्मचिंतन करें कि कैसे अपने जीवन में सकारात्मकता और रचनात्मकता को लाएंगी और जो भी बुरा है, उससे कैसे पार पाएंगी।