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Mahatma Gandhi Death Anniversary: बापू की हत्या से पहले क्या कर रहे थे गोडसे, बाकी लोग कहां थे?

Thu, 30 Jan 2020 06:32 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी, नई दिल्ली
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शहीद दिवस 2020: महात्मा गांधी की पुण्यतिथि (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Social Media
दिल्ली के कनॉट प्लेस के मरीना होटल के ठीक आगे स्थित मस्जिद में मगरिब की नमाज शुरू होने वाली है। रमजान का महीना है। उसके बाद रोज़ा खोला जाएगा। मरीना होटल के एक कमरे से एक शख्स मस्जिद की हलचल को देख रहा है। मालूम नहीं कि उस शख्स को पता है या नहीं कि 17 जनवरी, 1948 को जब दिल्ली में कड़ाके का जाड़ा पड़ रहा था, तब इसी होटल में, जिसे अब रेडिसन ब्लू मरीना होटल कहा जाता है, नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे आए।

वक्त सुबह 11 बजे से पहले का था। दोनों ने एस देशपांडे और एसएन देशपांडे नामों से कमरा बुक करवाया। उस दौर में आज की तरह किसी होटल में रूम बुक करवाते वक्त आधार कार्ड या कोई और पहचान पत्र नहीं दिखाना पड़ता था।

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nathuram godse
मरीना होटल का कमरा नंबर 40
ये दोनों मित्र 15-20 मिनट में पहुंच गए होंगे काली-पीली टैक्सी से कनॉट प्लेस. ये होटल जाते वक्त अलबुकर्क रोड (अब तीस जनवरी मार्ग) से गुजरे होंगे। उस दिन यहां के बिड़ला हाउस में 79 साल के महात्मा गांधी का उपवास चल रहा होगा। इन्होंने देखा होगा कि बिड़ला हाउस की तरफ़ हज़ारों दिल्ली वाले बापू से अपना उपवास समाप्त कराने के लिए पहुंच रहे हैं।

दरअसल आप्टे और गोडसे दिल्ली में गांधी जी की हत्या करने की भयानक योजना को अंजाम देने के लिए आए थे। उन्हें होटल के फ़र्स्ट फ्लोर का कमरा नंबरा 40 मिला। गोडसे और आप्टे बंबई से हवाई सफर करके सफदरजंग एयरपोर्ट पर उतरे थे। इनके शेष साथी ट्रेन से दिल्ली आ रहे थे। तब तक पालम एयरपोर्ट भी चालू नहीं हुआ था। इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट की तो बात ही छोड़ दीजिए।
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क्यों थे बापू से खफा
दरअसल जब इन्हें 12 जनवरी, 1948 को मालूम हुआ कि गांधी जी 13 जनवरी से अपना उपवास चालू कर रहे हैं, बस तब ही इन्होंने गांधी की हत्या करने का मन बना लिया था। गांधी जी के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी की पौत्री और लेखिका सुकन्या भरत राम कहती हैं, "गोडसे, आप्टे और इनके साथी गांधी जी से दो कारणों से बेहद खफा थे। पहला, गांधी जी ने दिल्ली में 13 जनवरी, 1948 को अपना उपवास क्यों चालू किया? गांधी जी ने वह उपवास इसलिए रखा था क्योंकि दिल्ली में मुसलमानों को मारा जा रहा था। उनकी संपत्तियां लूटी जा रही थीं। हिंसा और आगजनी थमने का नाम ही नहीं ले रह थी। सारे प्रयास विफल हो रहे थे।''

अंत में दंगाइयों पर नैतिक दबाव डालने के इरादे से गांधी ने 12 जनवरी, 1948 को अपने जीवन का अंतिम उपवास रखने का निर्णय लिया। उनके पुत्र देवदास गांधी, जो तब हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक थे, ने उन्हें उपवास पर ना जाने की सलाह दी थी। दूसरा, जब देश का विभाजन हुआ तब सरकारी संपत्ति भारत-पाकिस्तान में बंटी।

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नाथूराम गोडसे
सरकारी खजाने में उपलब्ध रुपया भी बंटा। तब पाकिस्तान के हिस्से के 75 करोड़ आए। भारत सरकार ने शुरू में पाकिस्तान को 20 करोड़ रुपये दे दिए दिए। अब बचे 55 करोड़ रुपये। बापू चाहते थे कि ये राशि भी पाकिस्तान को अविलंब दे दी जाए। इन कारणों से गोडसे और उनके साथी बापू से नाराज थे।

खैर, गोडसे और आप्टे को अब अपने शेष साथियों के आने का इंतजार था। ये कोई दिल्ली दर्शन के लिए नहीं आए थे। शाम होते-होते इनके साथी, जिनमें मदनलाल पाहवा, विष्णु करकरे और गोपाल गोडसे शामिल थे, मरीना होटल पहुंच गए। ये हैंडग्रेड, टाइम बम और पिस्तौल लेकर दिल्ली आए थे।

'फ्रीडम एट मिड नाइट' में लेखक द्वय डोमिनीक लापिएर और लैरी कॉलिन्स दावा करते है कि मरीना होटल के कमरे में गांधी जी की हत्या पर चर्चा का प्लान बनाते वक्त अपने और आप्टे के लिए व्हस्की मंगवाते हैं। गोडसे व्हस्की नहीं पीते थे। वो कॉफी प्रेमी थे। वह मरीना होटल में बार-बार कॉफ़ी मंगवाता रहते थे।
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Nathuram godse
रीगल से बिड़ला हाउस तक
मरीना होटल में तय हुआ कि गांधी जी पर 20 जनवरी को उनकी प्रार्थना सभा के दौरान बम से हमला किया जाएगा। इस दौरान ये सब बिड़ला हाउस का जायज़ा लेते रहे। तय तारीख 20 जनवरी आ गई। नाथूराम गोडसे, गोपाल गोडसे, नारायण आप्टे, विष्णु करकरे और मदनलाल पाहवा टैक्सी लेकर बिड़ला हाउस पहुंचे। आप्टे ने रीगल से भाव-ताव के बाद बिड़ला हाउस के लिए टैक्सी ली। बिड़ला हाउस में विस्फोट मदनलाल पाहवा ने किया।

बाद में पता चला कि वह एक क्रूड देसी क़िस्म का बम था जिसमें नुकसान पहुंचाने की ज्यादा क्षमता नहीं थी। उस विस्फोट के लिए मदन लाल पाहवा को पकड़ा गया। ये सब गांधी जी की जान के प्यासे थे ही। इनका इरादा था कि पहले प्रार्थना सभा में बम फेंका जाएगा। जब वहां पर भगदड़ मच जाएगी तो बापू पर गोलियां बरसा दी जाएंगी।

पाहवा और विष्णु करकरे पहले बिड़ला हाउस पहुंच गए थे। शेष को टैक्सी ड्राइवर सुरजीत सिंह लेकर आता है। सुरजीत सिंह बाद में सरकारी गवाह बन गए थे। मदन लाल पाहवा वहां पर एक फोटोग्राफर के रूप में पहुंचते हैं। धमाके के बाद उसके साथी वहां से निकल भागे। बहरहाल, इतनी भयावह घटना के बाद क़ायदे से बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद किया जाना चाहिए था।
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महात्मा गांधी - फोटो : फाइल फोटो
पर क्या इस बाबत कोई प्रयास हुए? अगर प्रयास किए गए होते तो बापू मारे नहीं जाते। उधर, पहले प्रयास में कामयाबी ना मिलने के बावजूद गोडसे और आप्टे दस दिनों में दूसरी बार एयर इंडिया वाइकिंग विमान से बंबई से दिल्ली आते हैं। ये दोनों 20 जनवरी के बाद बंबई चले गए थे। जाहिर है कि पुलिस एक्शन के भय से इस बार ये मरीना होटल नहीं जाते। अब इन्हें पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन का वेटिंग रूम ही सुरक्षित नजर आ रहा था।

गोडसे ने नारायण आप्टे के साथ वेटिंग रूप में रात गुजारी। दिल्ली में 27 जनवरी को बापू के महरौली में सूफी बख्तियार काकी की दरगाह में जाने की जानकारी मिलती है। दरअसल काकी की दरगाह को दंगाइयों ने क्षति पहुंचाई थी। इससे बापू आहत थे। ये बापू के जीवन का कोई अंतिम कार्यक्रम था। ये मालूम चलने के बाद इनका ख़ून खौल उठता है।

तब विष्णु करकरे भी इनके साथ थे। इतिहासकार दिलीप सिमियन कहते हैं कि बापू के काकी की दरगाह में जाने के बाद तो इन्होंने तय कर लिया कि अब उन्हें जल्दी ही मार डाला जाए। अब वह मनहूस 30 जनवरी का दिन आ जाता है। उस दिन इन्हें बापू की हत्या करनी है। बापू पर गोली नाथूराम गोडसे को चलानी थी। उधर से वे बिड़ला हाउस के लिए दूसरा तांगा लेते हैं।
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Mahatma Gandhi and Jinnah - फोटो : Social Media
बापू के अंतिम दिन के एक-एक पल का ख़ुलासा करने वाले पत्रकार स्टीफन मर्फी लिखते हैं, "20 जनवरी को हुए हमले के बाद बिड़ला हाउस में 30 पुलिसकर्मियों की तैनाती कर दी गई थी। नेहरू और पटेल के इस आग्रह को बापू ने मान लिया था। पर जब उन पर गोडसे गोली चलाते हैं, तब उनके साथ रहने वाले सादी वर्दी वाला पुलिसकर्मी एपी भाटिया गैर-हाजिर होते हैं। उस दिन उनकी कहीं और ड्यूटी लगा दी जाती है। उनके स्थान पर बापू की सुरक्षा में कोई तैनात नहीं होता। बापू के संग रहने वाले गुरुबचन सिंह भी नहीं थे। वो बापू के अटैंडेंट का काम करते थे।"

एक सवाल ये भी कि क्या तब बिड़ला हाउस के भीतर कोई भी मजे से प्रवेश पा सकता था? क्या उधर आने वालों की कोई छानबीन नहीं होती थी? मतलब ये कि जिन सुरक्षाकर्मियों को बिड़ला हाउस की सुरक्षा व्यवस्था का जिम्मा था, वे क्या कर रहे थे? भाटिया की 30 जनवरी को किसने और क्यों किसी अन्य जगह पर ड्यूटी लगा दी थी? अब इन सवालों के जवाब कोई नहीं देगा?

हां, ये ठीक है कि 30 जनवरी, 1948 को चांदनी चौक इलाके में सफाई कर्मी अपनी मांगों के समर्थन में बड़ा प्रदर्शन कर रहे थे। इसलिए काफ़ी सुरक्षा कर्मी वहां भेज दिए गए थे। 
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तो क्या भाटिया भी चांदनी चौक में ही थे? मतलब बापू को मरने के लिए अकेले छोड़ दिया गया था। अफसोस तो ये देखिए कि बापू के साथ सुबह-शाम रहने वाली उनकी निजी चिकित्सक डॉक्टर सुशीला नैयर भी उस दिन नहीं थीं। वो पाकिस्तान गई हुई थीं।

पर उन्हें गोली मारे जाने के कुछ देर के बाद डॉक्टर डीपी भार्गव और डॉक्टर जीवाजी मेहता वहां पहुंच गए थे। डॉक्टर मेहता ने बापू को मृत घोषित किया था। बापू की निर्विवाद रूप से महानतम जीवनी 'दि लाइफ़ ऑफ महात्मा गांधी' में लुई फिशर लिखते हैं, "नेहरू भी तुरंत बिड़ला हाउस पहुंच गए थे। वे बापू के खून से लथपथ शरीर से लिपटकर रो रहे थे। फिर बापू के सबसे छोटे पुत्र देवदास गांधी, शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद भी बिड़ला हाउस आ गए।

बहरहाल, गांधी जी की हत्याकांड के दो मुख्य अभियुक्तों और मित्रों गोडसे और आप्टे को फांसी की सजा दी गई। शेष को उम्र कैद मिली।
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