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Lockdown Lifestyle: लॉकडाउन में अगर ये चीजें न होती तो फिर कैसी होती हमारी जीवनशैली?

Sat, 11 Apr 2020 06:21 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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लॉकडाउन के दौरान लोगों का समय घर में ही बीत रहा है
फोन पर इंटरनेट, सोशल मीडिया और एप्स में भले ही कई बुराई हो और भले ही हम अपने बच्चों को इनसे दूर रखने की कोशिशें कर चुके हों, मगर इस वक्त इनसे न सिर्फ लोगों को बचाने में मदद मिल रही है और अर्थव्यवस्था को भी इनसे ही सहारा मिल रहा है।

स्मार्टफोन और सोशल मीडिया को लेकर हमें अक्सर चेतावनी भरी सलाह मिलती रहती है। लेकिन, आज के इस दौर में जब हम एक महामारी का सामना कर रहे हैं तब तकनीक जीवन बचाने के लिहाज से बेहद अहम साबित हो रही है।

जरा सोचिए, अगर ये 2005 का दौर होता तो कैसे हालात होते। तब न तेज ब्रॉडबैंड था, न स्मार्टफोन और न ही आज के वक्त के टूल्स और एप्स ही थे। उस वक्त अगर हमारा सामना इस महामारी से होता तो शायद हमारी मुश्किलें आसमान छू रही होतीं।
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अभी भी वो वक्त याद है जब अमरीकी राष्ट्रपति केनेडी को गोली मारे जाने की खबर फ्लैश हुई थी। बर्लिन की दीवार के गिरने और 9/11 की घटनाएं भी याद हैं। लेकिन, हमारी रोजाना की जिंदगी पर जितना बड़ा असर इस कोरोना नाम की महामारी ने डाला है उतना इनमें से किसी घटना नहीं डाला था।

आज मैं वीडियो-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अपने सहयोगियों से बात कर सकता हूं, फेसटाइम के जरिए लंदन में एक फ्लैट में फंसे अपने रिश्तेदारों का हालचाल जान सकता हूं और अपने सोशल मीडिया पर भी लिख सकता हूं। लेकिन अगर ये वायरस 2005 में स्मार्टफोन के दौर के शुरू होने से ठीक पहले आया होता तो शायद चीजें अगल होतीं।

आज हम अलग-अलग कामों के लिए जितने डिजिटल टूल्स का इस्तेमाल करते हैं तब इनमें से शायद ही कोई उपलब्ध रहा हो। फेसबुक उस वक्त केवल एक साल पुराना था, लेकिन वह अमरीका के एक कॉलेज से शुरू हुआ था और उस साल केवल यूके की यूनिवर्सिटीज में पहुंचा था।
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इंस्टाग्राम और व्हाट्सएप के बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था। सोशल मीडिया के बारे में चर्चा तो दूर की बात थी। हालांकि, कई लोग फ्रेंड्स रीयुनाइटेड के जरिए अपने पुराने दोस्तों से तब कनेक्ट हो रहे थे जिसे आईटीवी ने 2005 में खरीदा था।

उसी साल यूट्यूब का जन्म हुआ था। इसके अगले साल ट्विटर आया। 2007 में एपल ने अपना पहला आईफोन लॉन्च किया। 15 साल पहले करीब 80 लाख घरों में ब्रॉडबैंड कनेक्शन थे। इनके डेस्कटॉप कंप्यूटर 10 एमबीपीएस (मेगाबाइट पर सेकेंड) की अधिकतम स्पीड से चल सकते थे। इसका मतलब यह है कि एक एलबम को डाउनलोड में करने में करीब डेढ़ मिनट का वक्त लगता था।

करीब 70 लाख परिवार उस वक्त डायल-अप कनेक्शंस के जरिए बेहद सुस्त इंटरनेट से जुड़े हुए थे। इसका मतलब है कि जो सेवाएं आज हमारे लिए बेहद अहम हैं उस वक्त उनकी नींव ही रखी जा रही थी।

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लॉकडाउन से नहीं थमा बिजनेस
स्काइप की शुरुआत 2003 में एस्टोनियाई आंत्रप्रेन्योर्स ने की। लेकिन, यह केवल एक इंटरनेट टेलीफोनी और कॉन्फ्रेंस-कॉल सर्विस थी। इसमें वीडियो 2006 में जाकर जुड़ा। अगर आप तब किसी से वीडियो चैट करना चाहते तो उसके लिए बेहद महंगे उपकरणों की जरूरत पड़ती थी। अब फेसटाइम और व्हाट्सएप के जरिए हर कोई अपने परिवार और दोस्तों से बात कर सकता है।

हम जूम और ब्लूजीन्स जैसी सर्विसेज की भी खोज कर रहे हैं। अब तक तकरीब एक्सक्लूसिव तौर पर बिजनेस कस्टमर्स के तौर पर यूज किया जाने वाला जूम पिछले हफ्ते एक बार एपल के एप स्टोर चार्ट पर टिकटॉक के बाद दूसरे नंबर पर आ गया था।

आज यूके के 96 फीसदी घरों में ब्रॉडबैंड इंटरनेट कनेक्शन की एवरेज डाउनलोड स्पीड 54 एमबीपीएस है। इसी वजह से लाखों लोग आज ऑफिस की जगह अपने घर से काम कर पा रहे हैं।
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दो दशक पहले ऑफिस के बाहर भी काम कर सकने का जो अनुमान लगाया गया था वह आखिरकार अब हकीकत की शक्ल लेने में सफल हो पाया है। लेकिन, ऐसा इलसिए हो सका क्योंकि आज हमारे पास कनेक्टिविटी और कई तरह के ऐसे टूल्स हैं जो हमें बना ऑफिस आए भी काम करने की ताकत देते हैं।

अपने घर से ही मैं अमरीका में अपने बॉस से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग पर बात कर सकता हूं या फिर अपने सहयोगियों के साथ स्टोरीज पर चर्चा कर सकता हूं। ये बात सच है कि लॉकडाउन का अर्थव्यवस्था पर बेहद गहरा असर हो रहा है, लेकिन जरा सोचिए कि यह और कितना खराब हो सकता था।
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ऑनलाइन शॉपिंग के मामले में ओकैडो या टेस्को।कॉम की सेवाएं उस वक्त कुछ सालों तक थीं, लेकिन इनका रिटेल सेल्स में केवल 3 फीसदी हिस्सा था। आज इनकी सेल्स में करीब 20 फीसदी हिस्सेदारी है और हालिया दिनों में हमने देखा है कि डिलीवरी वैनों के फ्लीट और ड्राइवरों की हमारी जिंदगी में कितनी अहमियत हो गई है।

15 साल पहले ऑनलाइन रिटेलर्स के लिए बढ़ती हुई डिमांड से निपट पाना पिछले हफ्ते उनके सामने आए संकट के मुकाबले कहीं मुश्किल था। इसकी वजह यह है कि आज क्लाउड कंप्यूटिंग ने किसी भी बिजनेस को आसानी से ऊंचाई पर पहुंचाने की ताकत दे दी है।
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online class - फोटो : pixabay
लॉकडाउन के बीच पढ़ाई के नए रास्ते
कई देशों में कोरोना के कहर के कारण स्कूलों को बंद किए जाने के बाद लाखों बच्चे घर से पढ़ाई कर रहे हैं, ऐसे में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर भी दबाव बढ़ रहा है। 'एडूटेक' को लेकर 2005 में भी काफी चर्चा थी, लेकिन इसका बड़ा हिस्सा स्कूलों में आईटी सिस्टम्स को सुधारने तक सीमित था। तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि ऐसा भी वक्त आएगा जब बच्चे घरों से ही पढ़ाई करेंगे। उस वक्त न तो बच्चों के पास कंप्यूटर थे और न ही ब्रॉडबैंड कनेक्शन।

जहां तक एंटरटेनमेंट की बात है, फ्लैट स्क्रीन टेलीविजन ने तब बाजार में कदम रखा ही था और और हाई-डेफिनिशन टीवी ईजाद हो रहा था। लेकिन ये टीवी इंटरनेट से कनेक्टेड नहीं थे। इसका मतलब है कि कोई स्ट्रीमिंग सर्विस भी नहीं थी। साथ ही पेरेंट्स के ऑनलाइन योग करने की भी गुंजाइश नहीं थी।
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जिस तरह से स्मार्टफोन और सोशल मीडिया हमारी जिंदगी पर असर डाल रहा हैं उसे लेकर हाल के सालों में काफी चिंताएं बढ़ी हैं। हमें बताया गया है कि ऑनलाइन दोस्ती से आप ठगी का शिकार हो सकते है, आमने-सामने के संपर्क से बेहतर कोई विकल्प नहीं है, सारा दिन स्क्रीन से चिपके रहना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है।

लेकिन, आज के संकट को देखते हुए कहा जा सकता है कि टेक्नोलॉजी टूल्स के जरिए इस संकट से उबरने में मदद मिल सकती है। अगर सही से इस्तेमाल किया जाए तो जीवन बचाने में भी टेक्नोलॉजी बेहद अहम साबित हो सकती है।
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