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International Dance Day 2020: इस नृत्य के लिए महिलाएं कर देती हैं पूरी जिंदगी कुर्बान लेकिन नहीं मिलता समाज में मान

Wed, 29 Apr 2020 05:38 AM IST
अपराजिता शुक्ला लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : social media
डांस एक ऐसी विधा है जिसके माध्यम से लोग अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करते हैं। भले ही नृत्य दिवस के रूप में एक दिन नृत्य को समर्पित किया जाता हो। लेकिन भारत के कोने-कोने में अपनी कला और संस्कृति को व्यक्त करने के लिए लोग नृ्त्य का सहारा लेते हैं। लेकिन इस देश में ऐसा भी एक नृत्य है जिसे मनोरंजन की दृष्टि से किया तो जाता है लेकिन समाज में इसे मान्यता नहीं मिली है। महाराष्ट्र के लोक नृत्य के रूप में जाना जाता है लावणी नृत्य। जिसको केवल महिलाएं करती हैं। हालांकि इन महिलाओं को समाज में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता है।

 
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भले ही कत्थक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी जैसे नृत्य के नर्तकों को सम्मान के नजरिए से देखा जाता है। लेकिन उसी भारत में लावणी करने वाली नर्तकियों को समाज में वो स्थान नहीं मिला जो दूसरे नर्तकियों को मिलता है। लावणी महाराष्ट्र के लोक नाट्य शैली तमाशा का एक अंग है जिसे केवल महिलाएं करती हैं। इन नृत्य को करने के लिए महिलाएं नौ गज लंबी परंपरागत साड़ी पहनकर तैयार होती हैं। जिसे ढोलक की थाप पर बड़ी ही तेजी के साथ किया जाता है।


 
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- फोटो : social media
पुराने जमाने से ही जाति विशेष की महिलाओं द्वारा इस नृत्य की प्रस्तुति की जाती रही है। जिनमें से प्रमुख जातियां कोल्हाटी और महार थीं। इन स्त्रियों को समाज में ऊंचा स्थान नहीं प्राप्त था। इन स्त्रियों के शादी के बंधन में बंधने की स्वीकार्यता नहीं थी भले वो किसी पुरुष के साथ संबंध बना सकती थीं।  इस तरह से समाज में इन महिलाओं को अपना पूरा जीवन इस नृत्य को समर्पित करने के लिए बाध्य कर दिया गया और पीढियों से जाति विशेष की स्त्रियां ही लावणी नृत्य को करती रहीं।


 

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- फोटो : instagram
वहीं इस नृत्य को पीढियों से करने वाली कोल्हाटी जाति का मानना है कि वो इस नृत्य के लिए पूरा जीवन समर्पित करते हैं। लेकिन अगर इस जाति की स्त्रियां शादी कर लेंगी तो उनका ध्यान अपनी साधना यानी नृत्य से हट जाएगा और वो सांसारिक जीवन में रच-बस जाएंगी। इसलिए इस समाज में मातृसत्ता चलती है। परिवार को आगे बढाने के लिए समाज में पैदा होने वाली बेटियों के होने पर जश्न मनाया जाता है और उसे इस नृत्य की बारीकियां सिखाई जाती हैं। 


 
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- फोटो : social media
17वी शताब्दी से चले आ रहे इस नृत्य को सबसे पहले पेशवाओं के दरबार में किया गया था। महिलाएं इन पेशवाओं द्वारा संरक्षित होती थीं और इनका जीवनयापन इसी नृ्त्य के जरिए पेशवाओं के दरबार में मनोरंजन के जरिए चलता था। लेकिन पेशवा के शासनकाल के खत्म हो जाने के बाद ये अपने गुजर बसर के लिए तमाशा जैसी लोक नाट्य शैली के माध्यम से इसे आगे बढाने लगीं।

 
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