प्रतीकात्मक तस्वीर
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ईरान के प्रवासी
19वीं सदी के उपनिवेश काल में बॉम्बे में वे खूब फले-फूले। पारसी उद्यमियों ने अंग्रेजों की शोहबत में पश्चिमी शिक्षा और संवेदनाओं को अपनाया और भारतीय उद्योग और राजनीति में बड़े ओहदे हासिल किए। वे वाणिज्य-व्यापार की अहम शख्सियत बने और अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके गरीबों के लिए स्कूल, कॉलेज और अस्पताल बनवाए। 19वीं सदी में बॉम्बे में जोरोस्ट्रियन प्रवासियों की संख्या बढ़ी।
ये चतुर उद्यमी ईरानी थे, जिन्होंने बॉम्बे में ईरानी कैफे खोले, जहां पारंपरिक रूप से सभी जातियों, धर्मों और लिंग के लोगों को खाना खिलाया जाता है। भारत की तरह पारसी व्यंजनों पर उन सभी संस्कृतियों का प्रभाव पड़ा जिन्होंने इस उपमहाद्वीप में अपनी छाप छोड़ी है। इनका मूल संभवतः इस्लाम से पहले के ईरान में है, लेकिन इस पर गुजरात, गोवा और कोंकण तटों का भी असर है।
ब्रिटेन और यहां तक कि नीदरलैंड ने भी इस पर प्रभाव छोड़ा है। भारतीय समुद्र तटों, खासकर गुजरात के तटीय इलाकों की पारसी बस्तियों ने मछली को पारसी संस्कृति से जोड़ दिया है। हम अन्य मछलियों के साथ छामनो (पॉम्फ्रेट), बोई (मुलेट), कोल्मी (झींगा), लेवटी (मड हॉपर), भींग (शाद), रवास (भारतीय सालमन) और बांगड़ा (मैकेरेल) खाते हैं। और फिर बॉम्बे डक है।