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Ganesh Chaturthi 2019:आखिर भगवान गणपति को क्यों इतना प्रिय है मोदक, ये हैं पांच कारण

Sun, 01 Sep 2019 04:36 PM IST
मोना नारंग लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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गणेश चतुर्थी अगले सप्ताह है और इस उत्सव पर भगवान गणेश की पूजा बड़े ही धूमधाम से की जाती है। वैसे तो पूजा करने के लिए बहुत सारी सामग्री का प्रयोग किया जाता है। लेकिन बात जब उन्हें भोग लगाने की आती है तो मोदक का ही नाम आता है। क्योंकि गणपति देव को चाहे छप्पन व्यंजन का भोग लगा दिया जाए लेकिन बिना मोदक के वो प्रसन्न नही होते हैं। तो आइए जानते हैं क्यों प्रथम पूज्य भगवान गणेश को यह मोदक इतना प्रिय है।

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गणेश जी का एक दांत परशुराम जी से युद्ध में टूट गया था। इससे अन्य चीजों को खाने में गणेश जी को तकलीफ होती है, क्योंकि उन्हें चबाना पड़ता है। मोदक काफी मुलायम होता है जिससे इसे चबाना नहीं पड़ता है। यह मुंह में जाते ही घुल जाता है और इसका मीठा स्वाद मन को आनंदित कर देता है।

 
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भगवान गणेश को मोदक इसलिए भी पसंद हो सकता है कि मोदक प्रसन्नता प्रदान करने वाला मिष्ठान है। मोदक के शब्दों पर गौर करें तो 'मोद' का अर्थ होता है हर्ष यानी खुशी। भगवान गणेश को शास्त्रों में मंगलकारी एवं सदैव प्रसन्न रहने वाला देवता कहा गया है। वह कभी किसी चिंता में नहीं पड़ते। इसका कारण संभवतः मोदक है क्योंकि यह गणेश जी को हमेशा प्रसन्न रखता है। मोदक के इसी गुण के कारण गणेश जी सभी मिष्टानों में मोदक को अधिक पसंद करते हैं।

 

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- फोटो : social media
पद्म पुराण के सृष्टि खंड में गणेश जी को मोदक प्रिय होने की जो कथा मिलती है उसके अनुसार मोदक का निर्माण अमृत से हुआ है। देवताओं ने एक दिव्य मोदक माता पार्वती को दिया। गणेश जी ने मोदक के गुणों का वर्णन माता पार्वती से सुना तो मोदक खाने की इच्छा बढ़ गयी।

 
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अपनी चतुराई से गणेश जी ने माता से मोदक प्राप्त कर लिया। गणेश जी को मोदक इतना पसंद आया कि उस दिन से गणेश मोदक प्रिय बन गये। गणपत्यथर्वशीर्ष में लिखा है, "यो मोदकसहस्त्रेण यजति स वांछितफलमवाप्नोति।" इसका अर्थ है जो व्यक्ति गणेश जी को मोदक अर्पित करके प्रसन्न करता है उसे गणपति मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।

 
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यजुर्वेद के अनुसार गणेश जी परब्रह्म स्वरूप हैं। लड्डू को गौर से देखेंगे तो उसका आकार ब्रह्माण्ड के समान है। गणेश जी के हाथों में लड्डू का होना यह भी दर्शाता है कि गणेश जी ने ब्रह्माण्ड को धारण कर रखा है। सृष्टि के समय गणेश जी ब्रह्मण्ड को प्रलय रूपी मुख में रख लेते हैं और सृष्टि के आरंभ में इसकी रचना करते हैं। 
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