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World Milk Day: क्या इंसान गाय-भैंस का दूध पीना बंद कर सकता है?

Mon, 01 Jun 2020 10:17 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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World Milk Day 2020: दूध का महत्व - फोटो : Pixabay
दूध को इंसानों के लिए एक पोषक और संतुलित आहार माना जाता है। लेकिन अब लोग गाय, भैंस, बकरी के दूध की जगह वैकल्पिक दूध जैसे सोयाबीन का दूध, नारियल का दूध, जई का दूध या भांग के दूध का सेवन ज्यादा करने लगे हैं। इन्हें पौधे से निकलने वाला दूध कहा जाता है। एक दौर था, जब इस तरह के दूध को कोई पूछता तक नहीं था। लेकिन अब वेगन लोगों की एक बड़ी आबादी हो गई है, जो दूध की जरूरत पौधों से निकलने वाले दूध से ही पूरा करते हैं। इसीलिए पौधों से निकलने वाला हर तरह का दूध अब बाजार में उपलब्ध है।
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दूध - फोटो : Pixabay
अब से पहले भी कुछ लोग डेयरी दूध की जगह बादाम का दूध पीना पसंद करते थे। बहुत से लोग जानवरों के अधिकारों के लिए ऐसा करते थे, जबकि बहुत से लोग दूध में मौजूद शुगर लैक्टोज नहीं पचा पाने के चलते इस विकल्प को चुनते थे। लेकिन अब बढ़ते जलवायु संकट के चलते एक बड़ी आबादी ऐसा कर रही है। क्या वाकई इससे वातावरण का भला होगा? और क्या इस तरह के दूध में डेयरी दूध से मिलने वाले तमाम पोषक तत्व मौजूद हैं?
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दूध - फोटो : Pixabay
कार्बन उत्सर्जन
जोसेफ पूर, ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एक रिसर्चर हैं। उन्होंने वैकल्पिक दूध पर अपनी एक रिसर्च 2018 में प्रकाशित की थी। जिसमें ये निष्कर्ष निकला था कि नॉन डेयरी मिल्क गाय के दूध से ज्यादा फायदेमंद है। गाय का दूध हासिल करने के लिए बड़े पैमाने पर जमीन और चारे का इंतजाम करना पड़ता है। गाय का दूध हासिल करने में काफी तादाद में कार्बन उत्सर्जन होता है, जो वातावरण के लिए घातक है।

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सोया मिल्क - फोटो : Social Media
अगर बात की जाए कार्बन उत्सर्जन की तो जई, सोया, बादाम, चावल से निकलने वाले दूध तैयार करने में डेयरी के दूध के मुकाबले एक तिहाई से भी कम कार्बन उत्सर्जन होता है। इसे इस तरह समझिए। जई के पौधे से एक लीटर दूध निकालने के लिए जितनी जई बोई जाती है उससे सिर्फ 0.9 किलो ग्राम कार्बन वातावरण में मिलता। चावल से 1.2 किलोग्राम। जबकि, सोया से एक किलोग्राम कार्बन उत्सर्जन होता है। जबकि एक लीटर डेयरी वाला दूध पैदा में 3.2 किलो ग्राम कार्बन उत्सर्जन होता है।
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गाय का दूध - फोटो : pixabay
डेयरी के दूध के मुकाबले पौधों से दूध निकालने में पानी की खपत भी कम होती है। मिसाल के लिए बादाम को सबसे ज्यादा पानी दरकार होता है। एक लीटर बादाम का दूध उत्पादन करने में 371 लीटर पानी की जरूरत होती है। जबकि डेयरी का एक लीटर दूध उत्पादन करने में 628 लीटर पानी की जरुरत होती है।
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दूध
ऑर्गेनिक या जैविक खेती
अगर आप ये फैसला कर चुके हैं कि आप पौधों से निकलने वाले दूध का ही सेवन करेंगे। तो फिर, आपको ये भी तय करना होगा कि आप ऑर्गेनिक खेती से पैदा होने वाला दूध लेंगे या फिर पारंपरिक तरीके की खेती की तरफ जाएंगे। ऑर्गेनिक या जैविक खेती में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का इस्तेमाल नहीं होता है।
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दूध - फोटो : Pixabay
अगर होता भी है तो बहुत कम। ऐसी खेती वातावरण और सेहत दोनों के लिए फायदेमंद है। लेकिन नई रिसर्च बताती हैं कि जैविक खेती का वातावरण पर कुछ खास असर नहीं पड़ता। दरअसल जैविक खेती के लिए ज्यादा जमीन की आवश्यकता होती है। पारंपरिक खेती से एक कार्टन सोया पैदा करने के लिए जितनी जमीन दरकार है, जैविक खेती के लिए उसके दोगुना जमीन चाहिए होती है। 

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दूध
लगातार बढ़ती मांग पूरा करने के लिए महज जैविक खेती पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। वैसे भी अगर जैविक खेती से कार्बन उत्सर्जन कम होगा, तो दूसरे खाद्य पदार्थ पैदा करने के लिए कहीं और जंगल साफ करके खेत तैयार किए जाएंगे। ऐसे में जंगल में कार्बन का जितना स्टॉक होगा वो खत्म हो जाएगा। और बात फिर वहीं आ जाएगी।

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दूध
इसमें कोई शक ही नहीं कि पारंपरिक खेती के मुकाबले जैविक खेती में मिट्टी में कार्बन ज्यादा जमा होता है। जो फसल की गुणवत्ता के लिए जरूरी है। खराब मौसम में भी मिट्टी का यही कार्बन उसे तबाह होने से बचा लेता है। हो सकता है वर्तमान समय में जैविक खेती से उत्पादन ज्यादा ना हो, लेकिन भविष्य में जब मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी हो जाएगी शायद जैविक खेती में भी पारंपरिक खेती जितनी ही उपज हो जाए।

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दूध
दूध से दो पोषक तत्व सबसे ज्यादा मात्रा में मिलते हैं। कैल्शियम और प्रोटीन। अगर आप दूध का इस्तेमाल सिर्फ चाय-कॉफी के लिए करते हैं, तो फिर आप दूध के किसी भी विकल्प पर विचार कर सकते हैं लेकिन अगर दूध आपके या आपके बच्चे की खुराक का अहम हिस्सा है तो फिर संजीदगी से सोचना पड़ेगा। प्रोटीन के मामले में सिर्फ सोया दूध में ही डेयरी के दूध जितना प्रोटीन पाया जाता है। 100 मिलीलीटर सोया दूध में 3.4 ग्राम प्रोटीन होता है। जबकि गाय के 100 मिलीलीटर दूध में 3.5 ग्राम प्रोटीन होता है। वहीं बादाम, चावल, नारियल आदि के दूध में सोया दूध के मुकाबले काफी कम प्रोटीन होता है।

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दूध
हेजलनट, भांग और जई के दूध में भी सोया जितना तो नहीं, लेकिन करीब-करीब उतना ही प्रोटीन होता है। जानकार भी डेयरी दूध की जगह सोया मिल्क की ही सलाह देते हैं। पौधों से निकलने वाले दूध की सबसे अच्छी बात ये है कि इसमें वसा की मात्रा लगभग नहीं के बराबर होती है। सिर्फ नारियल के दूध में फैट ज्यादा होता है। हालांकि वसा मुक्त दूध छोटे बच्चों के लिए उचित नहीं है। ब्रिटेन में तो दो साल तक के बच्चे को गाय या भैंस का ही दूध पिलाने की सलाह दी जाती है। इसके बाद पांच साल की उम्र तक सेमी-स्किम्ड दूध देने को कहा जाता है।
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दूध
बहरहाल, ये आपकी मर्जी है कि आप दूध का कौन सा विकल्प चुनते हैं। लेकिन सच्चाई यही है कि वातावरण की भलाई के लिए पौधों से निकलने वाले दूध, डेयरी मिल्क के मुकाबले बेहतर विकल्प हैं। वैसे आपको तंदुरुस्त रखने के लिए अकेले दूध ही काफी नहीं है। इसके लिए आपको संतुलित आहार लेना लाजमी है।
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