Banarasi Malaiyo
दिल्लीवाले कहते हैं इसे 'दौलत की चाट'
मलाई दूध-दही के ऊपर जितना जी चाहे इतरा ले, स्थूल भौतिक जगत का सुख है। यह पहेली सुलझाना कठिन नहीं कि कैसे यह पारसियों के हाथ लगी। अनेक पारसी डॉक्टर, वकील आदि तटवर्ती भारत से दूर मर्मस्थल तक पहुंच गए थे अंग्रेजी हुकूमत के विस्तार के साथ। अवध से ही वह यह सौगात अपने साथ ले गए, ऐसा सुझाना तर्कसंगत है। हां, यह सोचने लायक है कि क्यों ब्रजभूमि में दूध, दही और मक्खन की भूमि में यह अदृश्य है। हालांकि, आजकल शादी-ब्याह की दावतों में हर मौसम में 'दौलत की चाट' का खोमचा चटोरों की खिदमत के लिए खड़ा नजर आता है।
मॉलीक्यूलर’ रसोई के दौर में यंत्रों की मदद से सर्द झाग पैदा करना कठिन काम नहीं है। मगर आप ही बताइए हाथ से बुनी ढाके की मलमल का कोई मुकाबला मशीन पर बने कपड़े से हो सकता है? वही फर्क है, जो देसी कुल्फी और आइसक्रीम में है।