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Guru Gobind singh Jayanti 2020: गुरु गोविंद सिंह जी के अनमोल विचार जो मानवता को रास्ता दिखाते हैं

Thu, 02 Jan 2020 02:29 PM IST
ललित फुलारा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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गुरु गोविंद सिंह - फोटो : अमर उजाला
देशभर में धूमधाम से गुरु गोविंद सिंह जी की जयंती को प्रकाश पर्व के तौर पर मनाया जा रहा है। सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह का जीवन परोपकार और त्याग का जीता जागता उदाहरण है। वे एक आध्यात्मिक गुरु थे जिन्होंने मानवता को शांति, प्रेम, करुणा, एकता और समानता की सीख दी। उन्होंने अपने जीवन में कभी भी धन-संपदा, राजसत्ता की प्राप्ति या यश के लिए लड़ाइयां नहीं लड़ीं। उन्होंने अन्याय, अधर्म, अत्याचार और दमन के खिलाफ लड़ाई लड़ी।
 
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गोविंद सिंह - फोटो : उमर उजाला
गुरु गोविंद सिंह ने 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की। बाबा बुड्ढाजी ने गुरु गोविंद सिंह को मीरी और पीरी दो तलवारें पहनाई थीं जिनमें एक आध्यात्मिकता की प्रतीक थी और दूसरी नैतिकता की। गुरु गोविंद सिंह जी ने भारतीय जीवन मूल्यों की रक्षा और समाज के उत्थान के लिए खालसा पंथ बनाया और इसके जरिए अपने राजनीतिक और सामाजिक विचारों को आकार दिया।

 
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गुरु गोविंद सिंह - फोटो : pixabay
गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि अगर व्यक्ति केवल भविष्य के बारे में सोचते रहेगा तो वर्तमान भी खो देगा। उनका कहना था कि वास्तविक शांति तभी प्राप्त हो सकती है जब भीतर से अंहकार को मिटा दिया जाए। गुरु गोविंद सिंह जी कहा करते थे कि वो उन लोगों को पसंद करते हैं जो सच्चाई के मार्ग पर चलते हैं। उनका मानना था, इंसान से प्रेम ही ईश्वर की सच्ची भक्ति है।

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गुरु गोविंद सिंह - फोटो : pixabay
गुरु गोविंद सिंह दान, दक्षिणा और धर्म को विशेष महत्व देते थे। उनका कहना था कि हर किसी को अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान करना चाहिए। वो कहते थे कि बिना गुरु किसी को भगवान की प्राप्ति नहीं होती है। उन्होंने आनंदपुर साहिब के मेले के अवसर पर सिखों की सभा में 'गुरु के लिए पांच सिर चाहिए' की आवाज लगाई तथा जो व्यक्ति तैयार हो उसे आगे आने को कहा। एक के बाद एक पांच लोगों को पर्दे के पीछे ले जाया गया और तलवार से उनका सिर उड़ा दिया गया। इस प्रकार पांच व्यक्ति आगे आए। बाद में पांचों जीवित बाहर आए और गुरुजी ने उन्हें 'पंच प्यारा' नाम दिया।
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गुरु गोविंद सिंह - फोटो : pixabay
गुरु गोविंद सिंह जी सारे समाज और देश को एक सूत्र में पिरोना चाहते थे। इसी वजह से उन्होंने खालसा पंथ बनाने के बाद खुद पंच प्यारों के चरणों में माथा टेका। ये पंच प्यारे अगल-अलग जाति से थे। जिनमें एक लाहौर, दूसरा दिल्ली, तीसरा गुजरात, चौथा उड़ीसा और पांचवां  कर्नाटक से था। गुरु गोविंद सिंह जी संसार से विरक्ति की जगह कर्म पर जोर देते थे।
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