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गणेश चतुर्थी: 5 कारण जो बताते हैं क्यों गणेश जी को सबसे ज्यादा भाता है मोदक

Thu, 13 Sep 2018 12:29 PM IST
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
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शास्त्रों में भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाकर प्रसन्न करने का सबसे आसान तरीका बताया गया है। आप गणपति बप्पा को खुश करने के लिए पूजा करते समय भले ही रसगुल्ला, मालपुआ, रसमलाई का प्रसाद चढ़ाएं लेकिन अगर आपने मोदक का भोग नहीं लगाया तो समझ लीजिए गणेश जी को आपके छप्पन भोग भी पसंद नहीं आएंगे।

गणेश जी को मिष्ठानों में सबसे प्रिय है मोदक। गणेश जी का मोदक प्रिय होना भी उनकी बुद्धिमानी का परिचय है। आइए जानते हैं वो पांच कारण जो बताते हैं आखिर क्यों गणेश जी को मोदक इतने पसंद हैं।  
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गणेश चतुर्थी 2018:  गणेश जी का एक दांत परशुराम जी से युद्ध में टूट गया था। इससे अन्य चीजों को खाने में गणेश जी को तकलीफ होती है, क्योंकि उन्हें चबाना पड़ता है। मोदक काफी मुलायम होता है जिससे इसे चबाना नहीं पड़ता है। यह मुंह में जाते ही घुल जाता है और इसका मीठा स्वाद मन को आनंदित कर देता है।
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भगवान गणेश को मोदक इसलिए भी पसंद हो सकता है कि मोदक प्रसन्नता प्रदान करने वाला मिष्टान है। मोदक के शब्दों पर गौर करें तो 'मोद' का अर्थ होता है हर्ष यानी खुशी। भगवान गणेश को शास्त्रों में मंगलकारी एवं सदैव प्रसन्न रहने वाला देवता कहा गया है। वह कभी किसी चिंता में नहीं पड़ते।

इसका कारण संभवतः मोदक है क्योंकि यह गणेश जी को हमेशा प्रसन्न रखता है। मोदक के इसी गुण के कारण गणेश जी सभी मिष्टानों में मोदक को अधिक पसंद करते हैं।
 

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पद्म पुराण के सृष्टि खंड में गणेश जी को मोदक प्रिय होने की जो कथा मिलती है उसके अनुसार मोदक का निर्माण अमृत से हुआ है। देवताओं ने एक दिव्य मोदक माता पार्वती को दिया। गणेश जी ने मोदक के गुणों का वर्णन माता पार्वती से सुना तो मोदक खाने की इच्छा बढ़ गयी।

अपनी चतुराई से गणेश जी ने माता से मोदक प्राप्त कर लिया। गणेश जी को मोदक इतना पसंद आया कि उस दिन से गणेश मोदक प्रिय बन गये। गणपत्यथर्वशीर्ष में लिखा है, "यो मोदकसहस्त्रेण यजति स वांछितफलमवाप्नोति।" इसका अर्थ है जो व्यक्ति गणेश जी को मोदक अर्पित करके प्रसन्न करता है उसे गणपति मनोवांछित फल प्रदान करते हैं।
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यजुर्वेद के अनुसार गणेश जी परब्रह्म स्वरूप हैं। लड्डू को गौर से देखेंगे तो उसका आकार ब्रह्माण्ड के समान है। गणेश जी के हाथों में लड्डू का होना यह भी दर्शाता है कि गणेश जी ने ब्रह्माण्ड को धारण कर रखा है। सृष्टि के समय गणेश जी ब्रह्मण्ड को प्रलय रूपी मुख में रखा लेते हैं और सृष्टि के आरंभ में इसकी रचना करते हैं।
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