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World Sjogren’s Day: आंखों और मुंह के ड्राइनेस से परेशान हैं? कहीं ये ऑटोइम्यून बीमारी का संकेत तो नहीं

Thu, 23 Jul 2026 02:25 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

स्जोग्रेन सिंड्रोम एक क्रॉनिक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र गलती से अपनी ही स्वस्थ ग्रंथियों पर हमला करने लगता है।इसकी वजह से आंखों और मुंह में पर्याप्त नमी नहीं बन पाती। कहीं आप भी तो इसका शिकार नहीं हैं?
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ड्राई आइज-ड्राई माउथ की समस्या - फोटो : Amarujala.com/AI
क्या आपकी आंखों में अक्सर सूखापन बना रहता है, ऐसा लगता है जैसे हमेशा कुछ चुभ सा रहा हो? ये ड्राई आइज बीमारी का संकेत हो सकता है। कुछ अध्ययन लगातार इस बात को लेकर अलर्ट करते रहे हैं कि जिस तरह से लोगों की स्क्रीन टाइम बढ़ गया है, उसने आंखों में सूखेपन की समस्या को काफी बढ़ा दिया है।

मोबाइल-लैपटॉप के बढ़ते इस्तेमाल ने आंखों में सूखापन के खतरे को जरूर बढ़ाया है, पर हर बार ड्राई आइज का यही कारण हो ये जरूरी नहीं है। कई बार ये स्थिति किसी गंभीर बीमारी की तरफ भी इशारा हो सकती है।

मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि अगर ड्राई आइज के साथ मुंह भी बार-बार सूखने लगे, पानी पीने के बाद भी आराम न मिले, खाना निगलने में दिक्कत हो या लंबे समय तक थकान और जोड़ों में दर्द बना रहे, तो यह एक ऑटोइम्यून बीमारी स्जोग्रेन सिंड्रोम का संकेत हो सकता है।

इस बीमारी को लेकर लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य से हर साल 23 जुलाई को वर्ल्ड स्जोग्रेन डे मनाया जाता है। कहीं आप भी तो इसका शिकार नहीं हैं?
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आंखों में ड्राइनेस का बढ़ता खतरा - फोटो : Freepik.com
स्जोग्रेन सिंड्रोम का बढ़ता खतरा

मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि दुनियाभर में लाखों लोग इस बीमारी से प्रभावित हैं और सबसे चिंताजनक बात यह है कि शुरुआती लक्षण इतने सामान्य होते हैं कि मरीज वर्षों तक सही कारण नहीं जान पाता। 40-60 की आयु वालों में ये समस्या ज्यादा देखी जाती रही है।

महिलाओं में इसका खतरा पुरुषों की तुलना में कई गुना अधिक पाया गया है। 
 
  • स्जोग्रेन एक ऑटोइम्यून बीमारी है। इसमें शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र गलती से अपनी ही स्वस्थ ग्रंथियों पर अटैक करने लगता है। इसका सबसे ज्यादा असर लैक्रिमल ग्लैंड (आंसू बनाने वाली ग्रंथि) और सैलिवरी ग्लैंड (लार बनाने वाली ग्रंथि) पर पड़ता है। इसकी वजह से मरीजों को आंखों और मुंह में सूखापन की समस्या बनी रहती है।
  • धीरे-धीरे इसका असर केवल आंखों और मुंह के साथ-साथ जोड़ों, फेफड़ों, किडनी, नसों और अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकता है।

डॉक्टर कहते हैं, अच्छी बात यह है कि समय रहते पहचान और सही इलाज से इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है और गंभीर जटिलताओं का जोखिम कम किया जा सकता है।
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आंखों की समस्याएं - फोटो : Adobe Stock
क्यों होती है ये समस्या?

अमेरिकन कॉलेज ऑफ रूमेटोलॉजी और स्जोग्रेन फाउंडेशन की रिपोर्ट के अनुसार, यह बीमारी महिलाओं में पुरुषों की तुलना में लगभग 10 गुना अधिक पाई जाती है। अधिकतर मामलों में इसका  40-60 वर्ष की उम्र में होता है।
 
  • स्जोग्रेन सिंड्रोम क्यों होता है ये स्पष्ट नहीं है, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि आनुवंशिकता और पर्यावरणीय स्थितियां इसका खतरा बढ़ाने वाली हो सकती हैं।
  • जिन लोगों के परिवार में पहले से किसी को ऑटोइम्यून बीमारी रही हो उनमें जोखिम अधिक हो सकता है।
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स्जोग्रेन सिंड्रोम की समस्या के बारे में जानिए - फोटो : Freepik.com
कैसे जानें कहीं आप भी तो नहीं हो गए हैं इसका शिकार?

स्जोग्रेन सिंड्रोम चूंकि आंसू और लार बनाने वाली ग्रंथियों पर अटैक करता है, ऐसे में इसके कारण आंखों में सूखापन, आंखों में जलन या चुभन जैसा महसूस होता रहा है। आपको ऐसा महसूस हो सकता है जैसे आंखों में रेत पड़ी हो। इसके अलावा कुछ लोगों में धुंधला दिखने, मुंह के लगातार सूखने और खाना निगलने में कठिनाई भी हो सकती है।
 
  • बार-बार पानी पीने की जरूरत
  • दांतों में जल्दी कैविटी होना
  • लंबे समय तक थकान
  • जोड़ों में दर्द और सूजन
  •  त्वचा, नाक और गले में भी सूखापन

स्जोग्रेन सिंड्रोम से कैसे बचा जा सकता है?

स्जोग्रेन सिंड्रोम ऑटोइम्यून बीमारी है इसलिए इसे पूरी तरह रोका नहीं जा सकता। हालांकि इसके लक्षणों और जटिलताओं को कम करने में कुछ चीजें मददगार हो सकती हैं।
 
  • स्क्रीन का इस्तेमाल करते समय 20-20-20 नियम अपनाएं।
  • खूब पानी पीते रहें।
  • आंखों के लिए किसी भी ड्रॉप उपयोग डॉक्टर की सलाह के बिना न करें।
  • धूम्रपान से बचें।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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