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World Cancer Day Special: भारत से ज्यादा अमेरिका में पैर पसार रहा है कैंसर

Sun, 03 Feb 2019 04:30 PM IST
प्रशांत राय लाइफस्टाइल डेस्क , अमर उजाला
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breast cancer - फोटो : file photo
कैंसर को जिंदगी का आखिरी पड़ाव मान लेना और पल-पल मौत के इंतजार में जिंदा रहना जरूरी तो नहीं। निदान में देरी और इलाज के अभाव ने इसे इतना भयावह बना दिया है। कैंसर से 2018 में करीब एक करोड़ लोगों की मौत हुई, जबकि करीब दो करोड़ नए मामले सामने आए। लेकिन इन डरावने आंकड़ों की काली घटाओं के बीच रोशनी की भी किरण नजर आती है। हर वर्ष कैंसर से होने वाली मौत की संख्या कम हो रही है। 
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cancer patient
लिम्फोसर्कोमा ऑफ इंटेस्टाइन (कैंसर) से पीड़ित आनंद सहगल, पल-पल मौत की लू के बीच जिंदगी को अपनी जिंदादिली और खुशमिजाजी की ठंडी फुहारों से नम करते हुए अपने राग और अपनी ताल पर जीने की जिद में जब आनंद बोलते हैं, "बाबू मोशाय, जिंदगी और मौत ऊपर वाले के हाथ है, उसे न तो आप बदल सकते हैं, न मैं, हम सब तो रंगमंच की कठपुतलियां हैं, जिनकी डोर ऊपर वाले की उंगलियों में बंधी है। ....बाबू मोशाय, जिंदगी बड़ी होनी चाहिए लंबी नहीं।" यह सुनकर बरबस ही दिल-दिमाग पर ‘आनंद’ छाने लगता है। 
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Cancer patient
1970 के दशक में जब यह 'आनंद' फिल्म बनी थी, तब कैंसर इतनी आम बीमारी नहीं होती थी। लेकिन, अब कहानी कुछ और है। हर डॉक्टर भी भास्कर बनर्जी की तरह नहीं होता और न ही हर कैंसर पीड़ित आनंद सहगल हो सकता है। भारत में करीब 25 लाख लोग कैंसर से पीड़ित हैं। इनमें हर साल 7 लाख नए मामले जुड़ते हैं और हर साल करीब 5 लाख लोग कैंसर की वजह से मर जाते हैं। अब यह तो नहीं कह सकते कि 25 लाख लोग आनंद सहगल बन जाएं। लेकिन यह जरूर बताना चाहेंगे कि कैंसर के साथ जिंदगी को खत्म न होने दें और अपनी जिंदगी को मायने देने का काम खुद ही करना होता है। वक्त के साथ कैंसर के इलाज की तकनीक भी बदल रही है। दुनियाभर में अब दिन-ब-दिन कैंसर से होने वाली मौतें कम हो रही हैं और हर पखवाड़े कोई न कोई नई चीज सामने आती है, जो कैंसर से पीड़ित लोगों की जिंदगी को बेहतर बनाती है। 

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Good bacteria protect from Cancer
कैंसर से पूरी दुनिया में 2018 में करीब एक करोड़ लोगों की मौत हुई, जबकि करीब 2 करोड़ नए मामले सामने आए। लेकिन इन डरावने आंकड़ों की काली घटाओं के बीच रोशनी की एक किरण नजर आती है। हर वर्ष कैंसर से होने वाली मौत की संख्या कम हो रही है। कैंसर की शीर्ष मृत्यु दर (1991 में 1 लाख में से 215) के मुकाबले 2018 में कैंसर से होने वाली मृत्यु दर में करीब 26 फीसदी की कमी आई है। 
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cancer
पिछले एक दशक से इसमें लगातार कमी आ रही है। अगर भारत के संदर्भ में बात करें, तो यकीनन पिछले कुछ वर्षों में कैंसर भारत में महामारी की तरह फैला है। लेकिन अगर प्रत्येक एक लाख लोगों में कैंसर के मामलों को लेकर अमेरिका से तुलना करें तो भारत की स्थिति काफी बेहतर है। अमेरिका में जहां प्रत्येक एक लाख लोगों में से 300 के करीब लोगों को कैंसर है, वहीं भारत में एक लाख लोगों में से करीब 100 लोगों को कैंसर है। लेकिन भारत में ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर के मामलों में मौत की दर दुनिया में सबसे ज्यादा है। भारत में मातृत्व मृत्यु दर की तुलना में ब्रेस्ट और ओवेरियन कैंसर से होने वाली मौतें 1.7 फीसदी ज्यादा हैं। यह बात थोड़ी परेशान करने वाली है कि जहां एक तरफ दुनिया में कैंसर से होने वाली मौत की तादाद में कमी आ रही है, वहीं भारत में कैंसर से होने वाली मौतों में साल दर साल इजाफा हो रहा है। भारत में कैंसर होने की दर तो कम है, लेकिन कैंसर से पीड़ित लोगों की मौत की दर काफी ज्यादा है। इसके लिए भारत में कैंसर के निदान में देरी को बड़ी वजह मान सकते हैं। भारत में कैंसर के 50 फीसदी से ज्यादा मामलों का खुलासा तीसरे या चौथे चरण के कैंसर के दौरान होता है, जिसकी वजह से इलाज मुश्किल होता है। एक अनुमान के मुताबिक अगर भारत में कैंसर की पहचान पर काम किया जाए और कैंसर पीड़ित लोगों में कैंसर की पहचान  शुरुआती अवस्था में हो जाए, तो करीब 60 फीसदी लोगों की मौत को टाला जा सकता है। 
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कैंसर - फोटो : getty images
करीब 100 तरह के कैंसर हैं, जो चिकित्सकीय तौर पर पहचाने जा सकते हैं। भारत में इन 100 तरह के कैंसर्स में से 50 फीसदी रोगी ब्रेस्ट कैंसर, सर्वाइकल कैंसर, मुंह, फेफड़े और कोलोरेक्टल कैंसर से पीड़ित होते हैं। इनमें से ज्यादातर मामलों में कैंसर का पता काफी देर से लगता है, जो इलाज को ज्यादा खर्चीला और कम कारगर बनाता है। इसके अलावा एक दिलचस्प बात यह है कि जहां पूरी दुनिया में महिलाओं में पुरुषों के मुकाबले कैंसर के कम मामले सामने आते हैं, वहीं भारत में महिलाएं, पुरुषों की तुलना में कैंसर से ज्यादा पीड़ित हैं। महिलाओं में होने वाले कैंसर के कुल मामलों में करीब 70 फीसदी मामले ब्रेस्ट कैंसर और सर्वाइकल कैंसर के होते हैं। वहीं पुरुषों को मुंह और फेंफड़ों का कैंसर ज्यादा होता है। मुंह और फेंफडों के कैंसर का सबसे बड़ा कारण तंबाकू उत्पादों का सेवन करना होता है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ कैंसर प्रीवेंशन एंड रिसर्च द्वारा किए गए एक शोध के मुताबिक स्तन कैंसर की बड़ी वजह वसायुक्त खानपान, मोटापा, देर से शादी करना, कम बच्चे, गलत तरीके से स्तनपान करवाना हो सकता है। कुल मिलाकर भारत में शहरीकरण को स्तन कैंसर के बढ़ते आंकड़ों की एक बड़ी वजह माना जा सकता है। 
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throat cancer
सर्वाइकल कैंसर का बहुत असानी से पता लग जाता है और इसका पूरी तरह से इलाज संभव है, इससे किसी की मौत नहीं होनी चाहिए। लेकिन देश में महिलाओं को होने वाले कैंसर के कुल मामलों में 26 फीसदी मामले सर्वाइकल कैंसर के होते हैं, जिनमें से 50 फीसदी के करीब मामलों में पांच वर्ष से कम समय में रोगी की मौत हो जाती है। जबकि, सर्वाइकल कैंसर की असल वजह ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) होता है। अगर किशोरवय लड़कियों का एचपीवी टीकाकरण कराया जाए, तो सर्वाइकल कैंसर के करीब 80 फीसदी मामले कम हो सकते हैं। इलाज मौजूद होने के बाद भी कैंसर से मौत हो जाना बेहद निराशाजनक है। यहां आकर, व्यवस्था और जिम्मेदारों के खिलाफ रोष पैदा होता है। फिर याद आते हैं दर्शनशास्त्र के अर्क से बने पेनकिलर सरीखे 'आनंद' के डायलॉग, जो जिंदगी को मजबूरी के बजाय मजबूती से जीने की सीख देते हैं और बताते हैं, “आने वाले गम को खींचकर आज की खुशी पर ले आते हैं, और उस खुशी में जहर घोल देते हैं।...कौन कब कैसे उठेगा यह कोई नहीं बता सकता।...मौत तो एक पल है...जब तक जिंदा हूं, मरा नहीं, जब मर गया, तो मैं ही नहीं।” जीने के लिए जिंदा होना ही नहीं, जिंदादिल होना भी जरूरी है।
डॉ. श्रीगोपाल काबरा, कैंसर विशेषज्ञ

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breast cancer - फोटो : file photo
विश्वास रखें और जीतें लड़ाई
कैंसर नाम से ही भय लगता है। तब भी भय लगता था, जब इसे कैंसर के रूप में पहचाना भी नहीं गया था। शल्यक्रिया जब सुरक्षित हो गई तब कैंसर की गांठ को निकालना एक मात्र उपचार उभरकर आया। लेकिन कैंसर की गांठ निकालने के कुछ अरसे बाद कैंसर वहीं वापस लौट आता। अतः शल्यक्रिया का विस्तार किया गया - गांठ के आसपास से मांसपेशियों को निकाला जाने लगा। इस बीच एक्स-रे का आविष्कार हुआ और कैंसर की गांठ को नष्ट करने की उसकी शक्ति सामने आई। दिखने वाली गांठ को शल्यक्रिया से और अदृश्य कैंसर को रेडिएशन से नष्ट करने का तरीका पता चला। इससे सफलता का प्रतिशत ताे बढ़ा, लेकिन कुछ समय बाद कैंसर शरीर में दूसरी जगह उभर आता। अब यह तथ्य भी सामने आने लगे कि कैंसर सिर्फ आंतरिक विकार नहीं बाहरी तत्वों के प्रभाव से भी फैलता है। अतः औषधियों से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कैंसर को नष्ट करने के उपायों की खोज चली। किसी रसायन का कैंसर पर प्रभाव मालूम होते ही वैज्ञानिक उसके समकक्ष दूसरे रसायन बनाते और उनका असर देखते। फिर पता चला कि कैंसर तो कैंसर सैंकड़ों तरह के होते हैं। कैंसर किसी भी अंग, किसी ऊतक या कोशिका में हो सकता है। दवा कंपनियों ने करोड़ों डाॅलर अनुसंधान में लगाए, लेकिन सभी प्रकार के कैंसर को एक दवा से ठीक करने का सपना साकार नहीं हुआ। हालांकि ज्यादातर कैंसर से अल्पकालिक या दीर्घकालिक राहत दिलाने वाली दवाएं सामने आने लगीं। अब लक्ष्यपरक उपचार (टारगेटेड थेरेपी) पर जोर है, अनुसंधान चल रहे हैं।
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Cancer
आज भी कैंसर विशेषज्ञों के पास उपलब्ध चिकित्सा विधियों की सार्थकता निश्चित नहीं है। कोई भी ऐसी विधि नहीं है जोे हानि रहित हो, ज्यादातर में तो पहले गंभीर हानि ही होती है। अंग-भंग, रेडिएशन, कीमोथेरेपी आदि में उपचार के दौरान मरीज की हालत इतनी खराब हो जाती है, जैसे आग के दरिया को कैंसर मुक्त होने की क्षीण आशा के सहारे, तैरकर पार जाना है। उस पर महंगा और लंबा उपचार। चिकित्सक की अपनी सीमाएं, विवशताएं होती हैं। परिणाम अपेक्षानुरूप न होने पर दोष चिकित्सक पर जाता है। चिकित्सक इलाज की जो मान्य विधाएं हैं, उन्हीं का प्रयोग कर सकता है। विकल्प बहुत कम होते हैं। हर निर्णय तलवार की धार पर चलने जैसा होता है। आज भी कैंसर एक मारक व्याधि है, लेकिन ज्यादातर कैंसर के लिए सार्थक चिकित्सा उपलब्ध है। कैंसर से पूरी तरह आजादी अलग बात है, लेकिन समय पर उपचार से एक मियाद तक मुक्ति संभव है। उपचार भी अब उतना कष्टदायक नहीं रहा है। आवश्यक है कि सब समझकर चिकित्सा में विश्वास रखें। बिना विश्वास तो कारगर उपचार भी सार्थक नहीं होगा।
- यतींद्र लवानिया
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