throat cancer
सर्वाइकल कैंसर का बहुत असानी से पता लग जाता है और इसका पूरी तरह से इलाज संभव है, इससे किसी की मौत नहीं होनी चाहिए। लेकिन देश में महिलाओं को होने वाले कैंसर के कुल मामलों में 26 फीसदी मामले सर्वाइकल कैंसर के होते हैं, जिनमें से 50 फीसदी के करीब मामलों में पांच वर्ष से कम समय में रोगी की मौत हो जाती है। जबकि, सर्वाइकल कैंसर की असल वजह ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) होता है। अगर किशोरवय लड़कियों का एचपीवी टीकाकरण कराया जाए, तो सर्वाइकल कैंसर के करीब 80 फीसदी मामले कम हो सकते हैं। इलाज मौजूद होने के बाद भी कैंसर से मौत हो जाना बेहद निराशाजनक है। यहां आकर, व्यवस्था और जिम्मेदारों के खिलाफ रोष पैदा होता है। फिर याद आते हैं दर्शनशास्त्र के अर्क से बने पेनकिलर सरीखे 'आनंद' के डायलॉग, जो जिंदगी को मजबूरी के बजाय मजबूती से जीने की सीख देते हैं और बताते हैं, “आने वाले गम को खींचकर आज की खुशी पर ले आते हैं, और उस खुशी में जहर घोल देते हैं।...कौन कब कैसे उठेगा यह कोई नहीं बता सकता।...मौत तो एक पल है...जब तक जिंदा हूं, मरा नहीं, जब मर गया, तो मैं ही नहीं।” जीने के लिए जिंदा होना ही नहीं, जिंदादिल होना भी जरूरी है।
डॉ. श्रीगोपाल काबरा, कैंसर विशेषज्ञ