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आखिर कोरोना वैक्सीन लगने के बाद भी क्यों पहनना पड़ेगा मास्क? सामने आईं ये बड़ी वजह

Sat, 19 Dec 2020 01:20 PM IST
प्रकाश चंद जोशी लाइफस्टाइल, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कोविड-19 की असरदार वैक्सीन में से एक फाइजर/बायोएनटेक ने बीते सोमवार से ब्रिटेन में इसका वितरण शुरू कर दिया है। दिसंबर महीने में इसके मेक्सिको और आने वाले महीनों में लातिन अमेरिकी देशों में पहुंचने की उम्मीद है। लेकिन वैक्सीन मिलने से बाद पहली वो चीज़ क्या होगी जो आप करेंगे? अगर आपको लगता है कि आप तुरंत मास्क से पीछा छुड़ा सकते हैं, यात्रा कर सकते हैं और उन सब से मिल सकते हैं जिनसे आप महामारी के चलते एक साल से नहीं मिले हैं तो डॉक्टर और संक्रामक रोग विशेषज्ञों ने तथ्यों के आधार पर चेतावनी दी है कि जिंदगी इतनी जल्दी पहले की तरह सामान्य नहीं होगी।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
बायोलॉजिस्ट नतालिया पस्टर्नक, ब्राजील के क्वेश्चन्स ऑफ साइंस इंस्टीट्यूट की प्रेसिडेंट हैं। उनके मुताबिक, "वैक्सीन मिलने के बाद जरूरी है कि आप घर लौटें, सोशल आइसोलेशन बनाए रखें, दूसरी डोज का इंतजार करें और उसके बाद कम से कम 15 दिनों तक उम्मीद के मुताबिक, वैक्सीन के पूरी तरह प्रभावी होने का इंतज़ार करें।" वो आगे कहती हैं कि, "इसके बाद एक बड़ी आबादी के प्रतिरक्षित (इम्यून) होने का इंतजार भी जरूरी है ताकि जीवन समान्य हो सके।"
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
सावधानियां बरतने के तीन कारण हैं:

शरीर पर होने वाली प्रतिक्रिया

वैक्सीन कैसे काम करती है, इसका फॉर्मूला हमेशा एक ही है कि ये शरीर में एक तत्व जोड़ता है जिसे एंटीजेन कहते हैं। ये एंटीजेन एक निष्क्रिय (मृत) वायरस, कमजोर वायरस (जो किसी को बीमार नहीं करें), वायरस का एक हिस्सा, कुछ प्रोटीन जो वायरस जैसे दिखते हों या फिर न्यूक्लिक एडिट (जैसे आरएनए वैक्सीन), इनमें से कुछ भी हो सकता है। साओ पाउलो यूनिवर्सिटी के फैकल्टी ऑफ मेडिसिन डॉ. जॉर्ज कलील के मुताबिक, ''एंटीजेन इम्यून प्रतिक्रिया को उकसाता है। यह शरीर को दूषित कीटाणुओं या वायरस से लड़ने के लिए तैयार करता है। ताकि ये वायरस को पहचान सके और उससे लड़ने के लिए एंटीबॉडीज पैदा कर सके।''

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
अगली बार जब वायरस के संपर्क में आएंगे तो शरीर को याद रहेगा कि उससे कैसे लड़ना है और तुरंत इस खतरे से प्रभावी ढंग से निपट सकता है। इस प्रतिक्रिया को एडैप्टिव इम्यून रिस्पॉन्स कहा जाता है और हर वायरस के लिए अलग होता है। नतालिया पस्टर्नक बताती हैं, ''ये ऐसी प्रतिक्रिया है जिसका शरीर में असर दिखने में कम से कम दो सप्ताह का समय लगता है.'' वो आगे कहती हैं कि वैक्सीन मिलने के बाद शरीर की पहली प्रतिक्रिया होती है- एंटीबॉडी बनाना, जो वायरस से चिपका रहता है और उसे बॉडी सेल में घुसने से रोकता है और उनका इस्तेमाल करके और वायरस तैयार करता है। एक बेहतर इम्यून वाले व्यक्ति में रोगाणुओं के शरीर में घुसते ही एंटीबॉडी रिलीज होते हैं जो बॉडी सेल्स (कोशिकाओं) को नुकसान पहुंचने से बचाते हैं।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
लेकिन एक दूसरे तरह का इम्यून रिस्पॉन्स भी है जिसे सेलुलर रिस्पॉन्स कहते हैं। नतालिया पस्टर्नक कहती हैं, ''इन्हें टी-शेल कहते हैं, जो वायरस को रोकती नहीं हैं लेकिन यह पहचान करती हैं कि कौन सी सेल वायरस से ग्रसित है और उसे नष्ट करती है।'' यानी अगर वायरस किसी तरह एंटीबॉडी से बचकर शरीर की किसी सेल में चला गया तो टी-सेल्स उन्हें ढूंढने और 'जॉम्बी सेल्स' को नष्ट करने का काम करता है ताकि और वायरस न पनपें। जॉर्ज कलील बताते हैं, ''सेल्युलर रिस्पॉन्स का असर एंटीबॉडी के मुकाबले थोड़ा देर से दिखता है। यह दूसरी वजह है कि इम्यूनिटी बेहतर होने का इंतजार कुछ हफ्तों तक पड़ता है।'' यानी वैक्सीन लेने के कुछ हफ्ते बाद ही आप सुरक्षित रह सकते हैं। ये ठीक वैसा है, जैसे शरीर को कोई सूचना 'प्रोसेस' करने और उसी के अनुरूप काम करने के लिए वक्त चाहिए।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
कोरोना से बचाव के लिए दो डोज
कोरोना वायरस के मामले में वैक्सीन मिलने के बाद दूसरा मुद्दा कुछ समय के लिए सुरक्षात्मक कदम उठाने का है। इस बीमारी के खिलाफ तैयार हुईं अधिकतर वैक्सीन के पूरी तरह प्रभावी होने के लिए इसके दो डोज जरूरी हैं। अब तक अपना प्रभाव दिखा चुकीं चार वैक्सीन हैं, जिनकी दो डोज की जरूरत होगी। ये हैं- फाइजर, मॉडर्ना, ऑक्सफोर्ड/ एस्ट्राजेनेका और स्पूतनिक वी। यह कोरोनावैक पर भी लागू होता है, जिसे बुटांटन इंस्टीट्यूट के साथ मिलकर फार्मा कंपनी सिनोवैक बना रही है। जॉर्ज कलील कहते हैं, ''संकेत ऐसे हैं कि पहली डोज लेने के बाद एक महीने तक इंतजार करें। फिर दूसरी रोज लें और फिर कम से कम 15 दिनों तक महामारी से बचाव के जरूरी एहतियात बरतते रहें, जैसे सेल्फ आइसोलेशन और मास्क का इस्तेमाल करें। हर वैक्सीन के असर को देखते हुए कहा जा सकता है कि इसके बाद ही आप सुरक्षित हो सकते हैं।''
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
नतालिया पस्टर्नक कहती हैं, ''पहली डोज वह है, जिसे डॉक्टर मुख्य बूस्टर कहते हैं। कह सकते हैं कि यह इम्यून सिस्टम को 'किक-स्टार्ट' देती है। दूसरी डोज बेहतर इम्यून रिस्पॉन्स पैदा करती है।'' हालांकि वैक्सीन लेने और एक से डेढ़ महीने तक सारे एहतियात बरतने के बाद भी, जिंदगी को आम पटरी पर लौटने में वक्त लगेगा। और जब तक ज्यादा आबादी को वैक्सीन नहीं मिल जाती, तब तक लोगों को सावधानी के उपाय करते रहने चाहिए।

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कोरोना वायरस वैक्सीन - फोटो : iStock
क्या वैक्सीन से भी नहीं मरेगा कोरोना वायरस?
तो इसका जवाब है नहीं। वैज्ञानिक बताते हैं कि अगर अच्छे से टीकाकरण हुआ तो वैक्सीन हर्ड इम्यूनिटी के जरिए कोरोना संक्रमण को फैलने से रोक सकती है। यह सच है कि व्यक्तिगत तौर पर कोई भी वैक्सीन 100 फीसदी प्रभावी नहीं है और यह कोविड-19 की वैक्सीन के मामले में भी सच है। उदाहरण के लिए, फाइजर वैक्सीन अपने तीसरे चरण की टेस्टिंग में 95 फीसदी असरदार रही है। इसका मतलब है कि जिस शख्स को वैक्सीन दी जाएगी, उसमें पांच फीसदी यह आशंका बनी रहेगी कि वो वैक्सीन किसी व्यक्ति पर शायद असर न भी करे। लेकिन कुछ लोगों को वैक्सीन देने से वायरस का संक्रमण फैलने से कैसे रुक सकता है? जॉर्ज कलील कहते हैं, ''वैक्सीन हर्ड इम्यूनिटी के जरिए काम करती है। वैक्सीन वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या घटाती है, जिससे संक्रमण आगे न बढ़े और उन्हीं मरीजों में रहे। इसी तरह चेचक का खात्मा हुआ था।''

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कोरोना वायरस वैक्सीन - फोटो : iStock
हर्ड इम्यूनिटी सिर्फ इसलिए जरूरी नहीं है कि वैक्सीन 100 फीसदी असरदार है, बल्कि इसलिए भी जरूरी है क्योंकि बहुत से लोग ऐसे हैं जो इसे हासिल भी नहीं कर सकते। डॉक्टर कलील कहते हैं, ''बहुत लोगों को वैक्सीन इसलिए नहीं मिलेगी क्योंकि वो बुज़ुर्ग नहीं हैं या फिर टीकाकरण अभियान का हिस्सा नहीं हैं। कोरोना वायरस की वैक्सीन का परीक्षण अब तक बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर नहीं हुआ है।'' इसके अलावा वो लोग जिन्हें इम्यून सिस्टम पर असर डालने वाली कोई बीमारी हो, उन्हें भी वैक्सीन नहीं दी जा सकती। डॉ. कलील के मुताबिक, ''जब कम आबादी में टीकाकरण होगा तो बाकी लोगों का बचाव हर्ड इम्युनिटी से होगा.'' कोरोना वायरस के मामले में, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का अनुमान है कि महामारी को रोकने के लिए 80 फीसदी आबादी का टीकाकरण जरूरी है। आदर्श रूप से 90 फीसदी।
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कोरोना वायरस वैक्सीन - फोटो : iStock
इसीलिए यह जरूरी है कि जिन्हें वैक्सीन मिल गई है और जिन लोगों ने एक से डेढ़ महीने का वक्त भी पूरा कर लिया है, वो महामारी से बचाव के उपायों को न छोड़ें। कोरोना के मामले में ऐसा है कि वैक्सीन को बड़ी आबादी तक पहुंचने में कुछ वक्त लगेगा। वैक्सीन की करोड़ों डोज बनाना एक रात का काम नहीं है। सरकार और फार्मा कंपनियों के बीच समझौते, कई देशों की वेटिंग लिस्ट, डिस्ट्रीब्यूशन और स्टोरेज की मुश्किलें (कुछ वैक्सीन को जीरो तापमान से नीचे रखे जाने की ज़रूरत है।) जैसे कई मुद्दे हैं। बायोलॉजिस्ट नतालिया पस्टर्नक कहती हैं, ''यह महत्वपूर्ण है कि जिसे भी पहले वैक्सीन मिले वो महामारी से लड़ने के उपाय अपनाता रहे। वैक्सीन मिलने के एक से डेढ़ महीने के बाद भी अगर उनका इम्यून बेहतर हो भी गया है तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वो इस बीमारी को फैलाने का काम नहीं करेंगे।'' वैज्ञानिक का कहना है कि अब तक जो वैक्सीन टेस्ट की गई हैं वो शरीर में वायरस को फिर से फैलने से रोकेंगी और लोगों को बीमार होने से बचाएंगी। लेकिन इस बात के कोई साक्ष्य नहीं है कि जिस शख्स को वैक्सीन दी जा चुकी है उससे दूसरों को कोरोना संक्रमण नहीं होगा।
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