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Coronavirus: रिसर्च स्टडी और विशेषज्ञों से समझें, बच्चों के लिए क्यों कम खतरनाक है कोरोना वायरस

Mon, 03 Aug 2020 12:56 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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बच्चों को कोरोना संक्रमण का खतरा कम होता है(File Photo) - फोटो : PTI
कोरोना वायरस का संक्रमण देश और दुनिया में बढ़ता ही जा रहा है। अबतक दुनियाभर में इससे संक्रमित होनेवालों का आंकड़ा 1.82 करोड़ पार कर चुका है, जबकि 6.92 लाख से ज्यादा लोगों की इससे मौत हो चुकी है। अबतक यही देखा गया है कि वयस्कों के मुकाबले बच्चों में इसके संक्रमण के मामले बेहद कम हैं। अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन के जर्नल ‘जेएएमए’ में प्रकाशित एक शोध अध्ययन में इस बारे में विस्तार से बताया गया है कि क्यों बच्चों पर कोरोना वायरस हावी नहीं हो पाता। वहीं, विभिन्न देशों के विशेषज्ञों ने भी इसके पीछे समान तर्क दिए हैं। आइए, जानते हैं इस बारे में विस्तार से: 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
  • शोध अध्ययन के मुताबिक कोरोना वायरस (SARS-CoV-2) संक्रमण के लिए मानव शरीर की बनावट और पहले स्तर के रिसेप्टर ACE2 की मात्रा में इस बात का जवाब छिपा है कि आखिर वयस्कों के मुकाबले बच्चे इस संक्रमण से कम प्रभावित क्यों हो रहे हैं। अमेरिका के माउंट सिनाई में इकॉन स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोधकर्ताओं के मुताबिक, कोरोना वायरस इंसानी शरीर में प्रवेश करने के लिए ACE2 रिसेप्टर का ही इस्तेमाल करता है। 
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बच्चों को कोरोना संक्रमण का खतरा कम होता है - फोटो : पेक्सेल्स
  • बच्चों को कोरोना संक्रमण और इससे होने वाली मृत्यु का खतरा इसलिए कम होता है, क्योंकि बच्चों की नाक में मौजूद एपिथिलियम टिशू में कोरोना वायरस के लिए मददगार रिसेप्टर ACE2 की मात्रा बहुत ही कम होती है। यह रिसेप्टर इंसानी शरीर में उम्र के साथ बढ़ते हैं। इसलिए बच्चों की तुलना में व्यस्क ज्यादा संक्रमित हो रहे हैं।

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बच्चों को कोरोना संक्रमण का खतरा कम होता है - फोटो : Pexels
  • हेल्थ रिसर्च जर्नल ‘जेएएमए’ में प्रकाशित अध्ययन के लिए न्यूयॉर्क के माउंट सिनाई हेल्थ सिस्टम में चार से 60 साल आयु वर्ग के 300 से ज्यादा मरीजों का विश्लेषण किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि बच्चों की नाक के एपिथिलियम टिशू में ACE2 की मात्रा कम होती है। यह बढ़ती उम्र के साथ-साथ बढ़ती है। उनका कहना है कि इस शोध के जरिए यह गुत्थी सुलझ रही है कि आखिरकार वयस्कों के मुकाबले बच्चों में कोरोना संक्रमण के मामले और इससे होने वाली मौतें कम क्यों हैं।
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मुंबई में घर की सीढ़ियों पर बैठकर मोबाइल फोन पर गेम खेलते बच्चे(File Photo) - फोटो : PTI
  • कोरोना वायरस से संबंधित कई अन्य अध्ययनों में ही यह सामने आ चुका है कि वयस्कों की तुलना में बच्चों में कोरोना संक्रमण की दर कम है। इसके बाद हुए शोध अध्ययनों में खुलासा हुआ है कि बच्चों में ACE2 नामक रिसेप्टर के कम सक्रिय होने के कारण ही उनका संक्रमण से बचाव हो पाता है।
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बच्चों को कोरोना संक्रमण का खतरा कम होता है - फोटो : Pexels
  • प्रो. एलिजाबेथ बार्नेट, बोस्टन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन की पीडियाट्रिक इन्फेक्शियस डिसीज विभाग में कार्यरत हैं। वह बताती हैं कि खासकर 10 साल से कम उम्र के बच्चों के संक्रमण के मामले बेहद कम हैं, जिसका सीधा संबंध ACE2 रिसेप्टर से है। 
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Human body - फोटो : Pixabay
क्या है ACE2 रिसेप्टर
  • ACE2 रिसेप्टर कोरोना वायरस का वाहक है। कोरोना वायरस के स्पाइक प्रोटीन इसी रिसेप्टर पर चिपककर शरीर के भीतर प्रवेश करते हैं और कोशिकाओं को संक्रमित कर अपना कुनबा बढ़ाते हैं। नाक और श्वासनली में कोरोना वायरस बहुत तेजी से अपनी संख्या बढ़ाता चला जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों की श्वास नलिका के ऊपरी हिस्से में ACE2 रिसेप्टर ज्यादा होता है, जबकि वयस्कों के फेफड़ों में ACE2 रिसेप्टर अधिक होता है। इसी वजह से वह श्वसन तंत्र पर हावी हो जाता है। 

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बच्चों से दूसरों को संक्रमण का खतरा कम (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Pixabay
  • वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि बच्चों से दूसरों को संक्रमण का खतरा कम है। उनका तर्क है कि बच्चे बड़ों की तुलना में कम जोर से खांसते या छींकते हैं। इस वजह से वायरस कम मात्रा में निकलता है और उनकी लंबाई कम होने के कारण वायरस जल्दी जमीन पर गिर जाता है। इससे वायरस के फैलने की संभावना कम रहती है। 
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बच्ची के शरीर के तापमान की जांच करता स्वास्थ्य कर्मी(File Photo) - फोटो : PTI
  • कोरोना वायरस को इम्यून सिस्टम और मेमोरी सेल रोकते हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास हेल्थ सेंटर की नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. अलवारो मोरेरिया के मुताबिक, बच्चों में मेमोरी सेल्स तब बनती है, जब जन्म के बाद वे संक्रमण की चपेट में आते हैं। बच्चों को जन्मजात मिला इम्यून सिस्टम बच्चों को इससे बचाता है। वहीं, वयस्कों की तुलना में बच्चों में साइटोकाइन स्टॉर्म का अधिक सक्रिय न होना भी बच्चों के ज्यादा सुरक्षित होने का कारण है।
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