कोरोना वैक्सीन (सांकेतिक तस्वीर)
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कोरोना वायरस से लड़ने वाली वैक्सीन दुनिया का कोई भी देश बनाए, उसे दुनिया के बाकी देशों के साथ सहयोग करना ही होगा, तभी वैक्सीन को बड़े पैमाने पर तैयार किया जा सकेगा। चेड बाउन का मानना है कि कई छोटी-छोटी, लेकिन बड़ी महत्वपूर्ण कड़ियां हैं, जिन्हें जोड़ना जरूरी है। एक उदाहरण देते हुए चेड बाउन कहते हैं, ''वैक्सीन के लिए छोटी बोतलें, ख़ास तरह की सिरिंज वगैरह की जरूरत हो सकती है जो हर देश के पास मौजूद नहीं होंगी। ऐसे में उन्हें आयात करने के सिवा कोई विकल्प नहीं होगा। वर्ल्ड ट्रेड और सप्लाई चेन के लिए हर विकल्प खुला रखना होगा। बहुत मुमकिन है कि वैक्सीन का कोई घटक ऐसा हो जिसके लिए दूसरे देश पर निर्भर रहना ही पड़े।''
फिर इस बात को भी दिमाग में रखना होगा कि वक्त की दौड़ में आगे निकलने वाली वैक्सीन जरूरी नहीं कि सबसे ज्यादा असरदार भी साबित हो। चेड बाउन के मुताबिक, ''ऐसा भी हो सकता है कि जो पहली वैक्सीन हो, जिसे बड़े पैमाने पर तैयार भी कर लिया जाए, वो बहुत असरदार ना निकले। मान लीजिए कि अमरीका ने सबसे पहले वैक्सीन बनाई, तब ऐसा भी हो सकता है कि वो अपनी वैक्सीन शेयर करने से मना कर दे।
हो ये भी सकता है कि दूसरी जो वैक्सीन यूरोप या ऑस्ट्रेलिया में बने, वो पहली वैक्सीन के मुकाबले ज्यादा असरदार साबित हो और वो देश अमरीका के साथ अपनी वैक्सीन शेयर ना करना चाहें। आपसी सहयोग की यही कमी, सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है।'' अंतरराष्ट्रीय राजनीति और दूसरी तकनीकी दिक्कतें अपनी जगह हैं, लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर हमने कुछ ज्यादा ही उम्मीदें पाल ली हैं?