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Filariasis: मच्छरों से केवल डेंगू-मलेरिया ही नहीं इस खतरनाक रोग का भी खतरा, हाथी के जैसे हो जाते हैं पैर

Sat, 23 Aug 2025 06:05 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • फाइलेरिया यानी हाथीपांव मच्छर के काटने से होने वाली बीमारी है, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस रोग के कारण रोगी का पांव काफी फूल जाता है और हाथी के पैर जैसा दिखने लगता है। 
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हाथीपांव- फाइलेरिया की समस्या - फोटो : Freepik.com
 Filariasis Symptoms And Risk: बरसात के मौसम में हर साल मच्छर जनित रोगों के कारण बड़ी संख्या में लोगों को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत पड़ती है। डेंगू-मलेरिया, चिकनगुनिया ऐसी ही गंभीर बीमारियां हैं जिसका लाखों लोग शिकार होते हैं। पर मच्छरों का प्रकोप बस यहीं तक सीमित नहीं है, ये फाइलेरिया जैसे गंभीर रोग का खतरा बढ़ाने वाले भी हो सकते हैं।

फाइलेरिया यानी हाथीपांव मच्छरों के काटने से होने वाली बीमारी है, जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है इस रोग के कारण रोगी का पांव काफी फूल जाता है और हाथी के पैर जैसा दिखने लगता है। संक्रमित मच्छरों के काटने से शरीर के अंदर बहुत बारीक कीड़े चले जाते हैं। ये धीरे-धीरे हमारी लिंफेटिक सिस्टम को प्रभावित करने लगते हैं।

लिंफेटिक सिस्टम (लसीका नलिकाएं) हमारे शरीर में पानी और इम्यूनिटी को नियंत्रित करती है। अगर ये खराब हो जाएं तो हाथ-पैर या अंडकोश में सूजन आ जाती है। यही कारण कि इस रोग से प्रभावित लोगों के पैरों में काफी ज्यादा सूजन हो जाती है।

हाथीपांव या एलिफेंटियासिस की समस्या का अगर समय रहते उपचार न किया जाए तो इसके कारण स्वास्थ्य संबंधी कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। भारत का लक्ष्य है कि 2027 तक फाइलेरिया को खत्म करना है।
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हाथीपांव रोग को लेकर सावधानी जरूरी - फोटो : Freepik.com
फाइलेरिया उन्मूलन अभियान

उत्तर प्रदेश में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत 10-28 अगस्त के बीच फाइलेरिया उन्मूलन अभियान चलाया जा रहा है। फाइलेरिया की रोकथाम व नियंत्रण के लिए प्रत्येक वर्ष प्रभावित क्षेत्रों में जागरूकत कार्यक्रम चलाया जाता है। इस दौरान सभी लोगों को दवा दी जाती है, जिसका अवश्य सेवन करना चाहिए।

यह दवा फाइलेरिया संक्रमण से बचाती है और बीमारी के फैलाव को रोकती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, दवा का सेवन करना ही फाइलेरिया से सुरक्षित रहने का सबसे आसान उपाय है।
 
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मच्छरों के काटने से होती है फाइलेरिया की बीमारी - फोटो : Freepik.com
फाइलेरिया की बीमारी कैसे होती है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जब कोई मच्छर किसी संक्रमित व्यक्ति को काटता है, तो वह कीड़े अपने अंदर ले लेता है। वही संक्रमित मच्छर जब किसी दूसरे इंसान को काटता है, तो ये कीड़े उसके खून में पहुंच जाते हैं और उस व्यक्ति के शरीर में लसीका नलिकाओं को अटैक करना शुरू कर देते हैं। 

डॉक्टर बताते हैं, मलेरिया की ही तरह से ये मच्छर भी अक्सर रात के समय में ही काटते हैं। जिन स्थानों पर गंदगी और पानी का जमाव होता है वहीं पर ये मच्छर पनपते हैं और लोगों को संक्रमण का शिकार बना सकते हैं।

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पैरों में होने वाली समस्या को न करें अनदेखा - फोटो : Freepik.com
फाइलेरिया में क्या दिक्कतें होती हैं?

डॉक्टर बताते हैं, वैसे तो इस बीमारी की शुरुआत में आमतौर पर कोई लक्षण नहीं दिखते। लेकिन धीरे-धीरे जैसे ये रोग बढ़ता जाता है आपको कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं। 
  • रोगियों को बार-बार बुखार, दर्द और सूजन बनी रहती है और समय के साथ हाथ-पैर में सूजन बढ़ने लगती है। इसके अलावा पुरुषों के अंडकोश (स्क्रोटम) में पानी भर जाता है, जिसे हाइड्रोसील कहते हैं। लंबे समय तक इलाज न हो तो पैर इतना सूज जाता है कि दिखने में हाथी जैसा लगने लगता है।
जो लोग उन स्थानों पर रहते हैं जहां यह बीमारी पहले से फैली हुई है या फिर गंदा पानी, खुले नाले और ज्यादा मच्छर होते हैं वहां पर लोगों में फाइलेरिया की दिक्कत अधिक होती है।
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मच्छरों से बचाव के उपाय जरूरी - फोटो : freepik.com
कैसे रहें इससे सुरक्षित?

भारत सरकार हर साल फाइलेरिया की दवा एमडीए (मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन) फ्री में देती है। इसमें 2 या 3 तरह की गोलियां होती हैं, ये दवा साल में एक बार खाना बहुत जरूरी है। गर्भवती महिलाओं, एक साल से छोटे बच्चे और गंभीर बीमार वाले लोगों को ये दवा नहीं दी जानी चाहिए। 

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिन स्थानों पर फाइलेरिया के मामले अधिक हैं वहां पर लोगों को बचाव को लेकर सावधान रहना चाहिए। इसके लिए हर साल सरकारी दवा जरूर लें, यही सबसे बड़ी सुरक्षा है। इसके अलावा मच्छरों से बचे रहने के लिए मच्छरदानी, पूरी बांह के कपड़े पहनने और रिपेलेंट का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बरसात में मच्छर बहुत बढ़ जाते हैं। इसी समय फाइलेरिया और दूसरी मच्छर वाली बीमारियों का खतरा अधिक होता है, इनसे बचाव जरूरी है।



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नोट: यह लेख डॉक्टर्स का सलाह और मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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