What is Anxiety Disorder: भले ही आज के समय में लोग मेंटल हेल्थ को लेकर काफी अवेयर रहते हैं, लेकिन अभी भी लोगों को एंग्जाइटी डिसऑर्डर के बारे में सही जानकारी नहीं है। आज हम आपको इसी बारे में जानकारी देंगे।
What is Anxiety Disorder: आज की तेज रफ्तार जिंदगी में तनाव, चिंता और भविष्य को लेकर डर महसूस करना आम बात है। नौकरी, पढ़ाई, रिश्ते, आर्थिक परेशानियां या किसी बड़ी घटना के कारण कभी-कभी बेचैनी होना सामान्य है। लेकिन जब चिंता जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए, लंबे समय तक बनी रहे और व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, काम, पढ़ाई या रिश्तों को प्रभावित करने लगे, तो यह एंग्जायटी डिसऑर्डर का संकेत हो सकता है।
एंग्जायटी डिसऑर्डर सिर्फ ज्यादा सोचने या कमजोर इच्छाशक्ति की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक मानसिक स्वास्थ्य स्थिति है, जिसके अलग-अलग प्रकार और लक्षण हो सकते हैं। सही पहचान और समय पर उपचार से इसके लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है। आइए जानते हैं एंग्जायटी डिसऑर्डर क्या है, इसके लक्षण, कारण और इलाज क्या हैं।
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क्या होता है एंग्जाइटी डिसऑर्डर?
- फोटो : AI
क्या होता है एंग्जायटी डिसऑर्डर?
एंग्जायटी यानी चिंता शरीर और दिमाग की तनाव के प्रति स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। किसी परीक्षा, इंटरव्यू या मुश्किल परिस्थिति से पहले घबराहट महसूस होना सामान्य हो सकता है। लेकिन एंग्जायटी डिसऑर्डर में डर या चिंता जरूरत से ज्यादा, बार-बार या लगातार बनी रह सकती है और व्यक्ति के सामान्य जीवन में बाधा डाल सकती है।
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क्या होता है एंग्जाइटी डिसऑर्डर?
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एंग्जायटी डिसऑर्डर के कितने प्रकार होते हैं?
एंग्जायटी डिसऑर्डर एक ही तरह की समस्या नहीं है, बल्कि इसके कई प्रकार हो सकते हैं। हर प्रकार में चिंता, डर और बेचैनी का अनुभव अलग-अलग परिस्थितियों में हो सकता है। इसके प्रमुख प्रकारों को इस तरह समझ सकते हैं:
1. जनरलाइज्ड एंग्जायटी डिसऑर्डर
इसमें व्यक्ति को रोजमर्रा की कई चीजों को लेकर जरूरत से ज्यादा और लगातार चिंता बनी रह सकती है। काम, परिवार, स्वास्थ्य, पैसे या भविष्य जैसी सामान्य बातों को लेकर भी चिंता इतनी बढ़ सकती है कि उसे नियंत्रित करना मुश्किल हो जाए। इसके साथ बेचैनी, चिड़चिड़ापन, थकान, मांसपेशियों में तनाव और नींद की परेशानी हो सकती है।
2. पैनिक डिसऑर्डर
इस स्थिति में अचानक और बार-बार पैनिक अटैक हो सकते हैं। पैनिक अटैक के दौरान तेज धड़कन, पसीना, कंपकंपी, चक्कर, सांस लेने में परेशानी या नियंत्रण खोने जैसा महसूस हो सकता है। अटैक खत्म होने के बाद भी व्यक्ति को दोबारा अटैक आने का डर बना रह सकता है।
3. सोशल एंग्जायटी डिसऑर्डर
इसमें सामाजिक परिस्थितियों में दूसरों के सामने शर्मिंदा होने, जज किए जाने या आलोचना का डर बहुत ज्यादा हो सकता है। इसके कारण व्यक्ति लोगों से मिलने, सार्वजनिक रूप से बोलने या सामाजिक कार्यक्रमों में जाने से बचने लग सकता है।
4. फोबिया
फोबिया में किसी खास वस्तु, जगह, परिस्थिति या गतिविधि का अत्यधिक और लगातार डर हो सकता है। डर की वजह से व्यक्ति उस स्थिति से बचने की कोशिश करता है, भले ही वास्तविक खतरा बहुत कम हो। उदाहरण के तौर पर ऊंचाई, उड़ान, कुछ जानवरों या इंजेक्शन से जुड़ा फोबिया हो सकता है।
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एंग्जायटी डिसऑर्डर के लक्षण
इसके लक्षण व्यक्ति और डिसऑर्डर के प्रकार के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। आम लक्षणों में लगातार चिंता या बेचैनी, चिड़चिड़ापन, आराम करने में परेशानी, ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई और नींद की समस्या शामिल हैं। कुछ लोगों में थकान, मांसपेशियों में तनाव, सिरदर्द, पसीना आना, कंपकंपी, चक्कर या सांस फूलने जैसी शारीरिक परेशानियां भी हो सकती हैं।
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क्या होता है एंग्जाइटी डिसऑर्डर?
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एंग्जायटी और सामान्य तनाव में क्या अंतर है?
हर तरह की चिंता को एंग्जायटी डिसऑर्डर नहीं कहा जाता। सामान्य तनाव आमतौर पर किसी खास परिस्थिति या समस्या से जुड़ा होता है और परिस्थिति सुधरने के बाद कम हो सकता है। वहीं एंग्जायटी डिसऑर्डर में चिंता लगातार बनी रह सकती है, भले ही तत्काल कोई खतरा मौजूद न हो। अगर चिंता व्यक्ति की रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित करने लगे या वह कई कामों और परिस्थितियों से बचने लगे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है।
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एंग्जायटी डिसऑर्डर क्यों होता है?
इसके पीछे कोई एक कारण नहीं होता। शोध के अनुसार आनुवंशिकता, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली, जैविक कारक और आसपास का वातावरण भूमिका निभा सकते हैं। लंबे समय तक तनाव या किसी दर्दनाक अनुभव के बाद भी कुछ लोगों में इसका जोखिम बढ़ सकता है।
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एंग्जायटी डिसऑर्डर का इलाज कैसे होता है?
एंग्जायटी डिसऑर्डर का इलाज व्यक्ति की स्थिति और लक्षणों के आधार पर किया जाता है। इसमें साइकोथेरेपी, दवाएं या दोनों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT) एंग्जायटी से जुड़ी कई स्थितियों में इस्तेमाल होने वाली प्रभावी थेरेपी है। डॉक्टर जरूरत के अनुसार दवाएं भी लिख सकते हैं। इसके साथ पर्याप्त नींद, नियमित एक्सरसाइज, कैफीन का अधिक सेवन कम करना, माइंडफुलनेस और तनाव को मैनेज करने जैसी स्वस्थ आदतें भी मददगार हो सकती हैं। हालांकि, ये आदतें विशेषज्ञ द्वारा बताए गए इलाज का विकल्प नहीं हैं।
अगर चिंता या डर लगातार बना रहता है, नींद और कामकाज प्रभावित होने लगते हैं, सामाजिक गतिविधियों से बचने की आदत बढ़ रही है या लक्षणों के कारण रोजमर्रा की जिंदगी मुश्किल हो रही है, तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ या डॉक्टर से बात करना बेहतर है। खुद से बीमारी का निदान या दवा शुरू करने के बजाय विशेषज्ञ की सलाह लेना जरूरी है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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