Toxic Positivity Symptoms: दुख और गुस्से जैसी भावनाओं को नजरअंदाज कर जबरदस्ती पॉजिटिव रहना नहीं है सही, जानिए क्यों जरूरी है अपनी भावनाओं को स्वीकार करना।
Toxic Positivity Symptoms: कई बार आप काफी दुखी होती हैं और ऐसे में कोई आकर मुस्कुराते हुए बस कह दे- "अरे, सब ठीक हो जाएगा, चिल करो!" इस दौरान कहने वाले की नीयत भले ही अच्छी हो, लेकिन उस पल मन करता है कि बस चिल्ला ही पड़ें। हर हाल में 'सअच्छा है' बोलने और जबरदस्ती मुस्कुराने के इसी दबाव को आजकल 'टॉक्सिक पॉजिटिविटी' कहा जा रहा है। मेडिकल साइंस भी मानता है कि दुख, गुस्सा या उदासी छुपाना कोई समझदारी नहीं, सेहत के साथ खिलवाड़ है।
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जानें Toxic Positivity के नुकसान
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पहले समझें टॉक्सिक पॉजिटिविटी
टॉक्सिक पॉजिटिविटी का मतलब है, हर स्थिति में जबरदस्ती सकारात्मक रहने की उम्मीद करना और नकारात्मक भावनाओं को नजरअंदाज करना। यह तब दिखाई देती है, जब कोई दुख, गुस्सा या परेशानी बताने पर कहे, 'सब ठीक हो जाएगा' या 'हमेशा खुश रहो।' इससे भावनाओं को समझने के बजाय उन्हें दबाने का अहसास होता है।
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भावनाएं दबाना नहीं है समाधान
जब हम दुख या डर को जबरदस्ती दबाते हैं और बाहर से खुश होने का नाटक करते हैं तो मेडिकल साइंस इसे 'इमोशनल सप्रेशन' कहता है। न्यूरोलॉजिकल शोध बताते हैं कि भावनाएं दबाने से शरीर में कॉर्टिसोल (स्ट्रेस हार्मोन) का स्तर तेजी से बढ़ता है। इससे नींद न आना, सिर दर्द और इम्यून सिस्टम कमजोर होने लगता है। उदासी को महसूस करना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि दिमाग का स्वाभाविक हीलिंग प्रोसेस है।
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'मैं तुम्हारे साथ हूं' कहना बेहतर यदि आपकी कोई सहेली या घर का सदस्य परेशान है तो उसे 'सब ठीक हो जाएगा' जैसी टॉक्सिक पॉजिटिव बातें बोलने के बजाय सॉलिडैरिटी स्टेटमेंट्स का इस्तेमाल करें, जैसे- 'यह समय कठिन है' या 'मैं तुम्हारे साथ हूं।' आप मन की भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें नाम भी दे सकती हैं। 'नेम इट टू टेम इट' तकनीक के अनुसार, 'मुझे गुस्सा आ रहा है' या 'मैं निराश हूं' कहने से भावनाओं को स्वीकार करने में मदद मिलती है और तनाव कम हो सकता है।
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पॉजिटिव रहें, वास्तविकता को नकारें नहीं
टॉक्सिक पॉजिटिविटी कई बार खुद पर भी अत्यधिक दबाव बनाती है। ऐसे में आपको हर समय खुश दिखने या अपनी भावनाओं को छिपाने की जरूरत नहीं है। दुख, गुस्सा और थकान भी जीवन का हिस्सा हैं। ऐसी स्थिति में अपनी भावनाओं को स्वीकार करना चाहिए और खुद को समझने का समय देना चाहिए। जरूरत पड़ने पर किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात भी की जा सकती है। सकारात्मक सोच अच्छी है, लेकिन वास्तविकता को नकारना सही नहीं है। इसलिए खुद के प्रति बेशक दयालु रहें, लेकिन अपनी सीमाओं को पहचानें।
मनोवैज्ञानिक डॉ. वर्षा सिंह बताती हैं कि टॉक्सिक पॉजिटिविटी, हर नकारात्मक भावना को जबरन सकारात्मक सोच से ढक देने का एक तरीका है। यह मानसिक स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक होता है। इससे व्यक्ति वास्तविक भावनाओं को दबाने, अपराधबोध महसूस करने और समस्याओं को नजरअंदाज करने लगता है। लंबे समय में तनाव, चिंता, भावनात्मक थकान और आत्मसम्मान में कमी बढ़ती है। इसलिए दुख, गुस्सा या निराशा को नकारने के बजाय स्वीकार करें, समझें और मदद लें।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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