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टाइफाइड मैरीः पहली मरीज जिसमें बीमारी का कोई लक्षण नहीं था, तीन साल क्वारंटीन में रहीं

Wed, 29 Apr 2020 04:05 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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मैरी मैलन - फोटो : Social Media
नए कोरोना वायरस के कारण फैली कोविड-19 की महामारी में उन मरीजों का इन दिनों अक्सर जिक्र हो रहा है जिनमें इस बीमारी के लक्षण नहीं दिखाई देते हैं। इसलिए मैरी मैलन को याद करना जरूरी है। वो इतिहास की पहली ऐसी मरीज थीं जिनमें बीमारी का कोई लक्षण नहीं था। ये 19वीं सदी की शुरुआत की बात है। तब अमरीका में मियादी बुखार (टाइफाइड) फैला था। मैरी इससे संक्रमित 50 लोगों में से एक थीं। संक्रमण से होने वाली बीमारियों में परिवार, प्रशासन और डॉक्टरों के लिए लंबे समय तक ये बात एक अबूझ पहेली की तरह ही रही कि ऐसा कैसे हो सकता है, बीमारी भी हो और लक्षण भी न दिखें। लेकिन 110 साल पहले मैरी इस वजह से अमेरिका की सबसे बदनाम औरतों में शुमार हो गई थीं।

पहली 'एसिम्प्टोमैटिक कैरियर'
उनका त्रासदी भरा जीवन 'एसिम्प्टोमैटिक कैरियर' की केस स्टडी में बदल गया था। एसिम्प्टोमैटिक कैरियर यानी वे लोग जिनमें किसी बीमारी के विषाणु या जीवाणु तो हों पर इसके होने का लक्षण न पता चले। जब ये बात पता चली कि मैरी के शरीर में संक्रामक बैक्टीरिया है तो उनकी पहचान पहले 'एसिम्प्टोमैटिक कैरियर' के तौर पर बन गई। तब टाइफाइड को आंत्र ज्वर के नाम से भी जाना जाता था। उन्हें समाज में दरकिनार कर दिया गया, उन्हें दुत्कारा गया। काम हासिल करने के लिए मारिया को अपना नाम तक बदलना पड़ा। और आखिरकार उन्हें लंबे समय के लिए क्वारंटीन में भेज दिया गया, जहां उनकी मौत हो गई।
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मैरी मैलन - फोटो : Social media
एक प्रवासी की कहानी
मैरी मैलन 1883 में आयरलैंड से अमरीका आई थीं। तब वे किशोर उम्र में थीं। अमरीका में उन्हें खाना बनाने और नौकरानी का काम मिला। शुरू में उन्होंने न्यूयॉर्क और लॉन्ग आइलैंड जैसे शहरों में काम किया, जहां पहली बार मियादी बुखार का संक्रमण शुरू हुआ।

तब तक उन्हें कोई जानता भी नहीं था लेकिन साल 1907 तक उस इलाके में संक्रमण के 30 ऐसे मामले सामने आए जो डॉक्टरों के लिए परेशानी का सबब बन गए। ये तलाश शुरू हुई कि बीमारी पहली बार कहां से फैली और किस-किस से होते हुए आगे बढ़ती गई।

तब तक स्वास्थ्य विभाग के लोग इस असामान्य महामारी की वजह पानी या खाने की खराबी को मान रहे थे। हैरानी की एक दूसरी वजह भी थी। तब तक ये माना जाता था कि न्यूयॉर्क के ग़रीब इलाकों में ही टाइफाइड फैलता है और समृद्ध इलाके इससे अछूते रहते हैं।
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बैक्टीरिया (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Social media
मैरी मैलन पर शक
लेकिन इस बार समृद्ध इलाकों के उन घरों में, जो मैरी मैलन जैसी महिलाओं को घरेलू काम के लिए रख सकती थीं, ये बीमारी फैलने लगी थी। उस वक्त तक विज्ञान ने महामारियों के तौर-तरीके समझने लायक तरक्की कर ली थी और कुछ संक्रामक बीमारियों के तो वैक्सीन भी डेवलप कर लिए गए थे। तब तक अमेरिका डॉक्टरों और वैज्ञानिकों को टाइफाइड जैसी बीमारियों में 'एसिम्प्टोमैटिक कैरियर' जैसे किसी मामले के बारे में पता नहीं था। 

इसलिए ये समझे बगैर कि इस बीमारी का मूल कारण कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो सालों तक बिना बुखार का लक्षण दिखाए, अनजाने में इसका संक्रमण फैलाता रहा हो, डॉक्टर और वैज्ञानिक अलग-अलग संभावनाओं पर विचार करते रहे। लेकिन 1907 में मैनहट्टन के पार्क एवेन्यु पर एक घर में एक नया केस आया और न्यूयॉर्क के स्वास्थ्य विभाग के डॉक्टर जार्ज सोपर को मैरी मैलन पर शक हो गया।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
सैल्मनेल बैक्टीरिया
महामारी रोग विशेषज्ञ डॉक्टर जार्ज सोपर ने पाया कि मैरी उस घर में काम कर रही थीं। और उन्होंने ये भी पता लगा लिया कि अतीत में जिन घरों में संक्रमण के मामले सामने आए हैं, मैरी वहां भी काम कर चुकी थीं। डॉक्टर जार्ज सोपर ने मेडिकल जांच के बाद बताया कि मैरी में मियादी बुखार फैलाने वाला सैल्मनेल बैक्टीरिया मौजूद है।

हालांकि इस मेडिकल जांच को अंजाम देने के लिए स्वास्थ्य विभाग और पुलिस के अधिकारियों को दखल देनी पड़ी। डॉक्टर सोपर ने कई सालों बाद ये बताया कि उस महिला से जांच के लिए सैंपल लेने में बहुत मुश्किल पेश आई थी जिसे उन्होंने खुद कभी बदलचलन, जिद्दी और अकेली रहने वाली औरत कहा था।
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मैरी मैलन - फोटो : Social Media
तीन साल तक क्वारंटीन
जैसे ही मैरी मैलन के बारे में दुनिया को पता चल गया, न्यूयॉर्क की मीडिया में वो बदनाम हो गईं। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का ये मानना था कि मैरी अनिश्चितकाल तक इस बैक्टीरिया की 'एसिम्प्टोमैटिक कैरियर' बने रहने की क्षमता रखती हैं।

अस्पताल के किसी कोने में एक वीरान से कमरे में मैरी को हफ्तों आइसोलेशन में रखने के बाद ये तय किया गया कि उन्हें एक छोटे से द्वीप पर बने मेडिकल सेंटर में क्वारंटीन में रखा जाएगा। तीन साल तक (1907 से 1910) उन्हें ऐसे कमरे में रखा गया जहां, उनके लिए खाना रख दिया जाता था ताकि वे उसे पकाकर अकेले खा लें।

तब तक लोकल प्रेस में मैरी मैलन का नाम टाइफाइड मैरी हो गया। हेल्थ मैगजीन्स ने उन पर लिखना शुरू कर दिया। मैरी ने संक्रमण फैलाने के आरोप को कभी स्वीकार नहीं किया और न ही तीन साल की क्वारंटीन अवधि के दौरान आजादी हासिल करने की कोशिश ही की।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : PTI
आजादी और नई पहचान
आखिरकार साल 1910 में उन्हें क्वारंटीन सेंटर से जाने की इजाजत मिल गई। ये शर्त रखी गई कि वे कभी खाना बनाने का काम नहीं करेंगी और न ही किसी के खाने को हाथ ही लगाएंगी। पांच सालों तक मैरी ने दो अलग-अलग नामों के साथ अलग-अलग जगहों पर खाना बनाने का काम किया।

लेकिन ये सिलसिला तभी तक चला जब तक कि नई महामारी नहीं फैल गई। एक ही अस्पताल में अचानक 20 लोग तेज बुखार के लक्षण के साथ भर्ती कराये गए। लेकिन डॉक्टर जार्ज सोपर ने एक बार फिर ये पता लगा लिया कि वो मैरी ही हैं जिनसे ये बीमारी दोबारा फैली है।
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मैरी मैलन - फोटो : Social Media
69 साल की उम्र में मौत
इस बार मैरी का नाम कुछ और था। मेडिकल सेंटर की फाइल पर अलग दस्तखत थे लेकिन डॉक्टर जार्ज सोपर फिर भी समझ गए। इसलिए 1915 में मैरी को एक बार फिर क्वारंटीन में भेज दिया गया। इस बार 23 साल के लिए। यहां वो अपनी मृत्यु तक रहीं।

उसी केबिन में वो वापस लौट आई थीं, अपने लिए खाना बना रही थीं। वे जिंदगी के उस मोड़ पर एक बार फिर से खड़ी थीं, जहां सिर्फ तन्हाई ही उनके साथ रह गई थी। साल 1932 में मैरी को दिल का दौरा पड़ा और उसके बाद उन्हें लकवा मार गया। छह साल बाद 69 साल की उम्र में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।

इस बात पर आज भी बहस की जाती है कि उनका पोस्टमॉर्टम किया गया था या नहीं और उससे भी ज्यादा इस बात पर चर्चा होती है कि उनके अंतिम अवशेष में टायफाइड के बैक्टीरिया आज भी होंगे या नहीं।
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