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Mental Health: मानसिक विकारों में खुद से इलाज के लिए आने वालों की संख्या एक फीसदी से भी कम, ये है मुख्य वजह

Tue, 06 Feb 2024 07:12 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का इलाज - फोटो : iStock
मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के मामले पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ते हुए देखे गए हैं, विशेषतौर पर कोरोना महामारी के बाद से इसकी दर में और भी बढ़ोतरी आई है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, यह बड़े खतरे के रूप में उभरती समस्या है, जिसके बारे में सभी लोगों को जागरूक होना जरूरी है। मानसिक स्वास्थ्य की समस्या के कारण शारीरिक स्वास्थ्य का जोखिम भी बढ़ जाता है। दुर्भाग्यवश भारत में अब भी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोगों में कलंक की भाव के कारण ज्यादातर लोगों में इसका समय रहते निदान नहीं हो पाता है।

देश में बढ़ते मानसिक रोगों के खतरे को लेकर हाल ही में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईआईटी) जयपुर के अध्ययनकर्ताओं ने एक चौंकाने वाली रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इसमें कहा गया है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के लिए स्व-रिपोर्टिंग दर काफी कम है। इसका मतलब है कि लोगों को इसके लक्षणों को पहचानने और खुद से निदान-इलाज के लिए जाने की दर कम है, जोकि निश्चित ही चिंताजनक है।
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मानसिक स्वास्थ्य की समस्या - फोटो : Pixabay
मानसिक बीमारियों की सेल्फ-रिपोर्टिंग की दर कम

नेशनल सैंपल सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में मानसिक बीमारियों की सेल्फ-रिपोर्टिंग की दर एक प्रतिशत से भी कम है। 555,115 प्रतिभागियों (325,232 ग्रामीण और 229,232 शहरी) पर किए गए शोध में पता चला कि भारत में अमीर आबादी की तुलना में कमजोर वर्ग के लोग मानसिक समस्याओं के इलाज के लिए खुद से नहीं जाते हैं। 

शोधकर्ताओं ने बताया, भारत में मानसिक विकारों की सेल्फ-रिपोर्टिंग में कमी से पता चलता है कि मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों की पहचान करने और उनका निदान-उपचार प्राप्त करने में बड़ा अंतर है।
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मेंटल हेल्थ की समस्या - फोटो : istock
खुद से इलाज के लिए सामने न आने के पीछे कई कारण

अध्ययन में पाया गया कि मानसिक विकारों की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लागत आर्थिक स्थिति को खराब कर सकती है। दिलचस्प बात यह है कि मानसिक विकारों के कारण अस्पताल में भर्ती होने वाले केवल 23 प्रतिशत व्यक्तियों के पास राष्ट्रीय स्तर पर स्वास्थ्य बीमा कवरेज था। लोगों का अस्पतालों में न जाने या खुद से इलाज के लिए सामने न आने का एक कारण मानसिक स्वास्थ्य उपचार पर होने वाला मोटा खर्च भी माना जा रहा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया, शोध का निष्कर्ष मानसिक विकारों के बोझ को कम करने के लिए रणनीति तैयार करते समय स्थानीय, सामाजिक-जनसांख्यिकीय संदर्भ को समझने के महत्व पर जोर देता है।

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मेंटल हेल्थ की समस्या - फोटो : istock
क्या कहते हैं मनोचिकित्सक?

अमर उजाला से बातचीत में भोपाल स्थित वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं की सेल्फ रिपोर्टिंग में कमी के लिए स्टिग्मा को प्रमुख कारक माना जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में लोगों में मेंटल हेल्थ को लेकर जागरूकता काफी बढ़ी है, फिर भी कलंक का भाव बड़ी संख्या में लोगों को मदद प्राप्त करने से रोकती है। डॉक्टर कहते हैं, ज्यादातर लोगों में ट्रीटमेंट गैप (समस्या शुरू होने से लेकर पहली बार डॉक्टर से मिलने तक का समय) दो से तीन साल का देखा जा रहा है।

इस दिशा में विशेष सुधार की आवश्यकता है क्योंकि मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सीधा असर क्वालिटी ऑफ लाइफ पर होता है। समय पर रोग की पहचान और इलाज होने से समस्या में सुधार करने में मदद मिल सकती है।
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मानसिक स्वास्थ्य विकारों का खतरा - फोटो : Pixabay
मेंटल हेल्थ को 'हेल्थ' का हिस्सा मानना होगा

डॉक्टर सत्यकांत कहते हैं, मेंटल हेल्थ, देश में हेल्थ का हिस्सा ही नहीं माना जाता है। इसके अलावा सोशल स्किल्स भी हमारे ट्रेनिंग का हिस्सा नहीं है। यह भी लोगों को समय पर डॉक्टर तक पहुंचने से रोकती है। जब तक हम मानसिक स्वास्थ्य की जरूरतों के बारे में नहीं समझेंगे, इसके इलाज के लिए लोगों का खुद से सामने आना कठिन है।

जहां तक बात मेडिकल खर्च की है तो अब भी हेल्थ इंश्योरेंस में मानसिक स्वास्थ्य विकारों को कवर करना पूरी तरह से क्रियान्वयन में नहीं है। यही कारण है कि अगर लोगों को समस्या के बारे में पता भी होता है फिर भी वह इलाज के लिए सामने नहीं आ पाते हैं।


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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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