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Lungs Problem: कहीं दीवारों की सीलन तो नहीं बढ़ा रही फेफड़ों की बीमारी? मानसून के दिनों में रहें सावधान

सार

हवा में बढ़ी नमी, घरों की सीलन, दीवारों पर फफूंद  सांस की नली और फेफड़ों को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि मानसून के दौरान कई लोगों में सांस फूलना, लगातार खांसी, घरघराहट और एलर्जी के मामले बढ़ जाते हैं।
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सांस की समस्याएं - फोटो : Amarujala.com/AI
इन दिनों देशभर में मानसून एक्टिव है। ये मौसम गर्मी से राहत देने वाला तो जरूर माना जाता है, पर मानसून अपने साथ कई तरह की बीमारियां लेकर भी आता है। अमर उजाला में प्रकाशित रिपोर्ट्स में हमने बताया कि किस तरह से इस मौसम में फूड पॉइजनिंग और टाइफाइड जैसी बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है। इसके अलावा स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, ये मौसम सांस के मरीजों के लिए भी समस्या बढ़ाने वाला हो सकता है।

अगर आपको अस्थमा, क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी), एलर्जी या फेफड़ों से जुड़ी कोई बीमारी है, तो इन दिनों आपको अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। मानसून के दिनों में हवा में बढ़ी नमी, घरों की सीलन, दीवारों पर लगी फफूंद और सड़ते जैविक पदार्थो में तेजी से पनपने वाले फंगस सांस की नली और फेफड़ों को प्रभावित कर सकते हैं। यही वजह है कि मानसून के दौरान कई लोगों में सांस फूलना, लगातार खांसी, घरघराहट और एलर्जी के मामले बढ़ जाते हैं।

अगर आप भी पहले से इसका शिकार हैं तो बारिश के दिनों में थोड़ी सावधानी जरूरी है।
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फेफड़ों में संक्रमण की समस्या - फोटो : Adobe Stock
मानसून के दिनों में सेहत को खतरा

विशेषज्ञ बताते हैं कि वातावरण में मौजूद फंगस कई बार सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। ज्यादातर स्वस्थ लोगों की प्रतिरक्षा तंत्र इन्हें नियंत्रित कर लेती है जिससे उनपर ज्यादा असर नहीं होता है। हालांकि  जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर है या जो पहले से ही फेफड़ों की बीमारी का शिकार हैं, उनमें संक्रमण का कारण बन सकते हैं। 

मानसून के दौरान वातावरण में नमी बढ़ जाती सकती है। मेडिकल रिपोर्ट्स से पता चलता है कि यह नमी फफूंद और अन्य सूक्ष्म कवकों को बढ़ने में मदद करती है।  
 
  • घरों की सीलन, गीली दीवारें, पुराने कपड़े, गद्दे पर आसानी से फंगस विकसित हो सकते है। 
  • इनके सूक्ष्म बीजाणु हवा में फैल जाते हैं और सांस के साथ शरीर में प्रवेश करते हैं।
  • इसलिए मानसून के दिनों में सावधानी बहुत जरूरी है।
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सांस की दिक्कतें - फोटो : Adobe Stock
किन लोगों को सबसे ज्यादा खतरा रहता है?

वैसे तो फंगस के कारण होनी वाली दिक्कतें सभी लोगों को प्रभावित करने वाली हो सकती हैं। हालांकि कुछ लोगों में इसका खतरा अधिक रहता है।
 
  • अस्थमा, सीओपीडी, ब्रोंकाइटिस, पुरानी फेफड़ों की बीमारी, हाई डायबिटीज और कैंसर के मरीजों को खतरा ज्यादा रहता है।
  • लंबे समय तक स्टेरॉयड या इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं लेने वाले लोगों में फंगल संक्रमण का खतरा अधिक रहता है। 
  • इसके अलावा बुजुर्गों और बहुत छोटे बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है, ऐसे लोगों को भी अलर्ट रहना चाहिए।

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सांस की समस्या - फोटो : Freepik.com
कैसे करें इसकी पहचान?

फेफड़ों की समस्याओं को पहचानने के लिए इसके लक्षणों पर गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए।
 
  • इसके शुरुआती लक्षण वैसे तो सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे लग सकते हैं, लेकिन अगर ये लंबे समय तक बने रहें तो इन्हें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। 
  • लगातार खांसी, सांस फूलना, सीने में जकड़न, घरघराहट, बुखार के साथ बलगम बढ़ना और कभी-कभी खून की खांसी जैसे लक्षण गंभीर संक्रमण का संकेत हो सकते हैं।
  • एलर्जी की स्थिति में छींक आने, नाक बंद होने जैसी दिक्कत हो सकती है। 
  • जिन्हें पहले से अस्थमा है उन्हें इनहेलर लेने के बावजूद लक्षण बढ़ रहे हैं, तो तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।
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फेफड़ों की समस्याओं का रखें ध्यान - फोटो : Adobe Stock
इन समस्याओं से बचाव के लिए क्या करें?

मानसून के दौरान होने वाली सांस की समस्याओं और फेफड़ों के संक्रमण के खतरे को कम करने के लिए घर को सूखा रखें और पानी का रिसाव तुरंत ठीक कराएं।
 
  • बाथरूम और रसोई की नियमित सफाई जरूरी है। 
  • गीले कपड़े लंबे समय तक घर के अंदर न रखें। एयर कंडीशनर और कूलर के फिल्टर साफ करें।
  • कमरे में पर्याप्त वेंटिलेशन बनाए रखना जरूरी है। डीह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल भी मददगार हो सकता है।




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स्रोत: 
Monsoon-driven dynamics of infectious diseases: Climatic determinants, outbreak patterns, and public health implications


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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