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Rabies Risk: रेबीज होने के बाद जान बचाना लगभग मुश्किल, सालाना 6 हजार लोगों को होती है मौत; कैसे रहें सुरक्षित?

Sat, 05 Jul 2025 07:54 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • एक अनुमान के मुताबिक रेबीज के कारण दुनियाभर में हर साल 59,000 लोगों की मौत हो जाती है। वहीं भारत में प्रतिवर्ष अनुमानित 5,700 लोगों की मौतें हो जाती हैं।
  • रेबीज एक घातक वायरल संक्रमण है जो संक्रमित जानवरों की लार से फैलता है। रेबीज वायरस आमतौर कुत्ते और बंदरों के  काटने से फैलता है। इसके अलावा चमगादड़, लोमड़ी से भी इसका खतरा रहता है।
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कुत्ते काटने से रेबीज का खतरा - फोटो : Freepik.com
Rabies High Mortality Rate: उत्तर प्रदेश के राज्य स्तरीय कबड्डी खिलाड़ी बृजेश सोलंकी (22) की हाल ही में कथित तौर पर रेबीज से मौत हो गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्हें कुत्ते ने काट लिया था, हालांकि इस घटना के बाद किन्हीं कारणों के चलते उन्हें एंटी-रेबीज इंजेक्शन नहीं लग पाया था। इस वजह से बीमारी के लक्षण तेजी से बढ़ने लगे जिससे उनकी मौत हो गई।

खबरों के मुताबिक इस घटना के सामने आने के बाद स्वास्थ्य अधिकारियों ने गांव का दौरा किया और वहां कई लोगों को टीका लगाया और रेबीज जागरूकता अभियान भी चलाया। 

रेबीज एक घातक वायरल बीमारी है जिसके कारण हर साल बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाती है। एक अनुमान के मुताबिक रेबीज के कारण दुनियाभर में हर साल 59,000 लोगों की मौत होती है। हालांकि रेबीज को टीकाकरण और संक्रमित जानवरों के काटने के बाद इलाज के जरिए रोका जा सकता है। 



भारत में रेबीज की रोकथाम को लेकर तमाम प्रयास किए गए हैं, बावजूद इसके अभी भी यहां प्रतिवर्ष अनुमानित 5,700 लोगों की मौतें हो जाती हैं।
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रेबीज जानलेवा बीमारी - फोटो : Freepik.com
रेबीज और इसका खतरा

स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं, रेबीज एक घातक वायरस है जो संक्रमित जानवरों की लार से लोगों में फैलता है। रेबीज वायरस आमतौर कुत्ते और बंदरों के काटने से फैलता है। इसके अलावा चमगादड़, लोमड़ी और रैकून के कारण भी इसका संक्रमण फैल सकता है।

सबसे गंभीर बात ये है कि एक बार जब किसी व्यक्ति में रेबीज के लक्षण दिखने लगते हैं, तो यहां से जान बचा पाना लगभग कठिन हो जाता है। यही कारण है कि जिन लोगों को रेबीज होने का खतरा हो सकता है (जैसे कुत्ते और अन्य जानवरों के संपर्क में रहने वाले लोग) उन्हें सुरक्षात्मक रूप से रेबीज के टीके लगवाने की सलाह दी जाती है।
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रेबीज संक्रमित जानवरों से रहें दूरी - फोटो : Freepik.com
क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

इस समस्या के बारे में समझने के लिए हमने ग्रेटर नोएडा स्थित एक अस्पताल में एमडी, इंटरनल मेडिसिन, डॉ श्रेय श्रीवास्तव से संपर्क किया। डॉ श्रेय बताते हैं, रेबीज वायरस आमतौर पर गली के कुत्ते, बंदर, लोमड़ी और बिल्लियों में पाया जाता है। इन जानवरों के काटने से संक्रमण के प्रसार का खतरा हो सकता है।

सबसे गंभीर बात ये है कि रेबीज के कारण मृत्युदर 100 फीसदी के करीब रहता है, मतलब अगर किसी को रेबीज हो जाए तो इसका इलाज लगभग असंभव हो जाता है। 

रेबीज के कारण रोगियों को हाइड्रोफोबिया होने का खतरा अधिक रहता है, जिसमें व्यक्ति को पानी से डर लगने लगता है, इसके अलावा कुछ भी खाने में दिक्कत होने लगती है।

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रेबीज के कारण होने वाली दिक्कतें - फोटो : Freepik.com
रेबीज के कारण क्या दिक्कतें होती हैं?

डॉ श्रेय बताते हैं, ये मस्तिष्क की परतों में संक्रमण करता है जिसके कारण कुछ स्थितियों में व्यक्ति बहुत अजीब सा व्यवहार करने लगता है, जैसे शरीर में बहुत ज्यादा ऐंठन या भ्रम की दिक्कत होना। 

रेबीज के शुरुआती लक्षण फ्लू के लक्षणों से बहुत मिलते-जुलते हो सकते हैं और कई दिनों तक रह सकते हैं। इसमें भ्रम-अति सक्रियता, निगलने में कठिनाई, अत्यधिक लार आने, अनिद्रा और आंशिक रूप से लकवा की भी समस्या हो सकती है।
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रेबीज का वैक्सीन - फोटो : Adobe Stock
रेबीज के जोखिमों को कम करने के लिए टीकाकरण

इस गंभीर और घातक स्थिति से बचाव के बारे में डॉक्टर श्रेय बताते हैं, रेबीज के जोखिमों को कम करने के लिए प्री और पोस्ट दोनों वैक्सीनेशन उपलब्ध होती हैं।
  • अगर आप जानवर पालते हैं या किसी ऐसे इलाके में रहते हैं जहां पहले किसी को रेबीज हो चुका है तो इसके लिए प्री-एक्सपोजर वैक्सीन लगवानी चाहिए। ये पहले डोज के बाद सातवे, 21वें और 28वें दिन लगाई जाती है। 
  • वहीं अगर आपको किसी रेबीज संभावित जानवर ने काट लिया है तो खास ध्यान देना चाहिए, इसके लिए वैक्सीन की पांच खुराक दी जाती है।  
अगर आपको किसी जानवर ने काट लिया है या आप किसी ऐसे जानवर के संपर्क में आए हैं जिसके रेबीज होने का संदेह है, तो तुरंत डॉक्टर से सलाह लें।


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नोट: यह लेख डॉक्टर्स का सलाह और मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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