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हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, कोरोना से लड़ने वाले मौजूदा दवाओं में कितनी प्रभावी है, क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

Thu, 16 Apr 2020 06:00 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन - फोटो : Social Media
कोरोना वायरस के इलाज के लिए अब तक कोई प्रॉपर यानी निश्चित दवा नहीं बन पाई है, लेकिन अबतक जो दवाएं उपलब्ध है, उनमें से मलेरिया की दवा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन काफी चर्चा में है। विश्व के 30 देशों के 37 फीसदी डॉक्टरों ने इसके असरदार होने पर अपनी मुहर लगाई है। 6200 डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों पर हुए सर्वे में 37 फीसदी ने हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन को कोरोना वायरस के लिए सबसे प्रभावी बताया है। कई देशों में कोरोना के मरीजों पर इसके इस्तेमाल की अनुमति मिल चुकी है। हालांकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक अबतक ऐसी कोई दवा नहीं बनी है जो कोरोना से संक्रमण का इलाज कर सके। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Social Media
दुनियाभर के चिकित्सकों के प्राइवेट सोशल नेटवर्क सेर्मो ने हालिया सर्वे किया है। इस सर्वे के मुताबिक, स्पेन के 72 फीसदी डॉक्टरों ने कोरोना के मरीजों को दवा देने की बात कही। इटली के 53 फीसदी डॉक्टरों ने भी कहा कि उन्होंने यह दवा वायरस का असर कम या खत्म करने के लिए इस दवा का इस्तेमाल किया। चीन में यह आंकड़ा 44 फीसदी है। वहीं ब्रिटेन में भी निजी चिकित्सकों ने इस दवा का कोरोना संक्रमण के मरीजों पर इस्तेमाल किया
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दवा कैसे काम करती है?
यह दवा सिन्कोना नाम के एक पेड़ से तैयार की जाती है, जिसका इस्तेमाल मलेरिया के इलाज में होता है। यह दवा हमारे शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाकर बीमारियों से लड़ने में मदद करती है। कोरोना संबंधित कई शोधों में बताया जा चुका है कि इम्यून सिस्टम मजबूत रहे तो संक्रमण का खतरा कम रहता है। इसलिए इम्यून सिस्टम मजबूत करने के लिए इसका इस्तेमाल कोरोना के मरीजों पर भी किया जा रहा है। चीन में इस दवा को लेकर जो ट्रायल हुआ था, उसमें पाया गया था कि यह दवा कोरोना संक्रमण को गंभीर होने से रोक सकती है।

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हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन - फोटो : social media
कहां-कहां हो रहा इस्तेमाल
यूरोप, अमेरिका और चीन में डॉक्टरों को यह अनुमति मिल चुकी है कि वे कोरोना के मरीजों को दवा दे सकते हैं। वहीं, ब्रिटेन में इस दवा का क्लीनिकल ट्रायल चल रहा है। इसमें सफलता मिलने से पहले डॉक्टर यह दवा कोरोना के मरीजों को नहीं दे सकते। अमेरिका में एनएचएस यानी नेशनल हेल्थ सर्विस द्वारा साल 1940 से ही इस दवा का इस्तेमाल रुमेटॉयड आर्थराइटिस और ल्यूपस के मरीजों पर किया जा रहा है। 
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चीन में भी हुआ शोध
चीन के वुहान में पिछले दिनों हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा पर एक शोध हुआ। वुहान यूनिवर्सिटी की ओर से हुए इस शोध में शोधकर्ताओं ने औसतन 45 साल की उम्र वाले 22 कोरोना संक्रमितों को यह दवा दी। ये सभी मरीज ऐसे थे, जिनमें कोरोना के शुरुआती लक्षण दिखाई दिए थे। इन मरीजों की हालत में तेजी से सुधार हुआ।
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डॉ. रमन गंगाखेड़कर, महमारी विशेषज्ञ प्रमुख, आईसीएमआर - फोटो : Social Media
भारत में क्या स्थिति?
पिछले दिनों आईसीएमआर यानी भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद ने कोरोना महामारी के उपचार के लिए इस दवा के उपयोग का सुझाव दिया है। आईसीएमआर के मुताबिक इस दवा का इस्तेमाल संक्रमित और संदिग्ध दोनों तरह के मरीजों के लिए किया जा सकता है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय ने चेतावनी दी है कि इस दवा का इस्तेमाल डॉक्टर के कहने पर ही किया जा सकता है।
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