फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Tuberculosis: दवाओं से भी हार न मानने वाली टीबी का भारतीय विशेषज्ञों ने खोजा इलाज, रोगियों के लिए बड़ी राहत

Sat, 09 Aug 2025 08:02 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • भारतीय वैज्ञानिकों ने मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी को कमजोर करने के लिए न्यूट्रास्युटिकल चिकित्सा पद्धति की खोज की है, जो मरीज की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाकर टीबी के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकती है। 
  • इस चिकित्सा पद्धति को एटीएलएस-पीए 2021 नाम दिया है।
विज्ञापन
1 of 5
भारत में टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) के मामलों में वृ्द्धि - फोटो : Adobe Stock
पिछले कुछ वर्षों में भारत में टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) के मामलों में भारी वृद्धि देखने को मिली है, जोकि काफी चिंताजनक है। चिंता इस बात को लेकर भी है क्योंकि भारत ने इस साल (2025) तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, हालांकि अब भी ये लक्ष्य काफी दूर नजर आ रहा है।

ट्यूबरक्लोसिस सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। हर साल लाखों लोग इस संक्रमण का शिकार होते हैं और इनमें से एक बड़ा हिस्सा गरीब और कमजोर तबके से आता है। इस रोग को लेकर चिंता की सबसे बड़ी वजह है मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी (एमडीआर), जिसपर सामान्य दवाओं का असर नहीं होता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि बीमारी ने खुद को दवाओं के खिलाफ सुरक्षित कर लिया हो। चूंकि इनपर दवाओं का असर नहीं होता है ऐसे में न सिर्फ रोगियों का उपचार कठिन हो जाता है, बल्कि रोग के गंभीर और जानलेवा होने का खतरा भी काफी बढ़ जाता है। 

एमडीआर टीबी का संक्रमण हवा के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे में आसानी से फैल सकता है। इसका मतलब है कि अगर इसे समय रहते रोका न गया, तो इससे बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हो सकते हैं। इसकी रोकथाम के लिए डॉक्टर समय पर जांच, पूरा इलाज, मरीज की पोषण स्थिति में सुधार, भीड़-भाड़ वाले इलाकों में संक्रमण नियंत्रण और जागरूकता अभियान पर जोर देते हैं।
विज्ञापन

2 of 5
टीबी और इसका बढ़ता खतरा - फोटो : Adobe Stock
ड्रग रेसिस्टेंट टीबी का खोजा नया इलाज

अब भारतीय वैज्ञानिकों ने मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी को कमजोर करने के लिए न्यूट्रास्युटिकल चिकित्सा पद्धति की खोज की है, जो मरीज की रोग प्रतिरोधक प्रणाली को मजबूत बनाकर टीबी के खिलाफ लड़ाई में मदद कर सकती है। इस चिकित्सा पद्धति को एटीएलएस-पीए 2021 नाम दिया है, जिसमें एल-सेरीन और पामिटॉयल सीओ-ए जैसे दो अणु शामिल हैं। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के साथ कुछ अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं ने यह खोज की है। 
विज्ञापन

3 of 5
टीबी के नए इलाज की खोज - फोटो : Freepik.com
न्यूट्रास्युटिकल के बारे में जानिए

न्यूट्रास्युटिकल वह उत्पाद होते हैं, जो पोषण और औषधीय गुणों को एक साथ लेकर आते हैं। ये न केवल रोग से लड़ने में मदद करते हैं बल्कि शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाते हैं। एटीएलएस-पीए 2021 इस श्रेणी का एक टीबी विशिष्ट उत्पाद है जो शरीर के इम्यून रिस्पांस को टीबी के खिलाफ सशक्त करता है।

शोधकर्ताओं का कहना है कि एमडीआर टीबी के मामलों में लंबे समय तक इलाज, महंगी दवाएं और उच्च मृत्यु दर जैसी समस्याएं आम हैं, ऐसे में एटीएलएस-पीए 2021 एक कम लागत, कम साइड इफेक्ट और अधिक असरदार विकल्प के रूप में उभर सकता है।

यह उपचार विशेषरूप से एमडीआर टीबी रोगियों में पारंपरिक एंटी-टीबी दवाओं की प्रभावशीलता को बढ़ाने के लिए खोजा गया है। विशेषज्ञ कहते हैं, यह न केवल फेफड़ों में मौजूद बैक्टीरिया को सीधे मारता है, बल्कि नाइट्रिक ऑक्साइड उत्पन्न कर हाइपोक्सिया जैसी स्थिति को भी ठीक करता है जो गंभीर टीबी मामलों में आम होती है।

4 of 5
फेफड़ों की बीमारी, टीबी से बचाव - फोटो : Adobe Stock
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

एमिटी सेंटर फॉर ट्रांसलेशन रिसर्च के उप निदेशक प्रो. हृदयेश प्रकाश ने बताया कि टीबी के उपचार में यह थेरेपी दवाओं के प्रतिरोधी माइक्रोबैक्टीरिया को पारंपरिक दवाओं के प्रति फिर से संवेदनशील बनाती है। यानी जो दवाएं पहले असर नहीं कर रही थीं, वे इस चिकित्सा पद्धति के सहारे फिर से प्रभावी हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि भारत ने इस नई खोज को पेटेंट भी कराया है।

यह भारत का पहला आईसीएमआर अनुमोदित न्यूट्रास्युटिकल है, जो एमडीआर टीबी पर केंद्रित है। उन्होंने बताया कि यह नवाचार टीबी मुक्त मिशन- 2025 के लक्ष्यों को पूरा करने में सहायक होगा।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
टीबी संक्रमण और इसका इलाज - फोटो : Adobe stock
एस्क्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामलों में भी बढ़ोतरी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बताया कि बड़ी संख्या में ऐसे मरीजों का निदान किया जा रहा है जिनमें टीबी संक्रमण के कोई लक्षण नहीं होते हैं। जब उनकी इम्युनिटी कमजोर होने लगती है तो इसके स्पष्ट संकेत दिखने लगते हैं। आमतौर पर 15 दिन से अधिक समय तक खांसी, बलगम का आना टीबी के लक्षण माने जाते हैं, लेकिन बिना खांसी- बलगम के भी यह बीमारी को सकती है।

ग्रेटर नोएडा स्थित  राजकीय आयुर्विज्ञान संस्थान (जिम्स) में बीते वर्ष 1,000 से अधिक मरीजों की टीबी की जांच की गई है। इसमें से 50 फीसदी मरीज एस्क्ट्रा पल्मोनरी टीबी के मामले सामने आ रहे हैं। ऐसे मरीज खांसी-बलगम के बिना सामने आ रहे हैं।  यहां पढ़िए पूरी रिपोर्ट




-----------------------------
नोट: 
यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है। 

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें