पिछले कुछ वर्षों में भारत में टीबी (ट्यूबरक्लोसिस) के मामलों में भारी वृद्धि देखने को मिली है, जोकि काफी चिंताजनक है। चिंता इस बात को लेकर भी है क्योंकि भारत ने इस साल (2025) तक देश को टीबी मुक्त बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया था, हालांकि अब भी ये लक्ष्य काफी दूर नजर आ रहा है।
ट्यूबरक्लोसिस सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है। हर साल लाखों लोग इस संक्रमण का शिकार होते हैं और इनमें से एक बड़ा हिस्सा गरीब और कमजोर तबके से आता है। इस रोग को लेकर चिंता की सबसे बड़ी वजह है मल्टी ड्रग रेसिस्टेंट टीबी (एमडीआर), जिसपर सामान्य दवाओं का असर नहीं होता है। इसे ऐसे समझा जा सकता है कि बीमारी ने खुद को दवाओं के खिलाफ सुरक्षित कर लिया हो। चूंकि इनपर दवाओं का असर नहीं होता है ऐसे में न सिर्फ रोगियों का उपचार कठिन हो जाता है, बल्कि रोग के गंभीर और जानलेवा होने का खतरा भी काफी बढ़ जाता है।
एमडीआर टीबी का संक्रमण हवा के जरिए एक व्यक्ति से दूसरे में आसानी से फैल सकता है। इसका मतलब है कि अगर इसे समय रहते रोका न गया, तो इससे बड़ी संख्या में लोग संक्रमित हो सकते हैं। इसकी रोकथाम के लिए डॉक्टर समय पर जांच, पूरा इलाज, मरीज की पोषण स्थिति में सुधार, भीड़-भाड़ वाले इलाकों में संक्रमण नियंत्रण और जागरूकता अभियान पर जोर देते हैं।