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Alert: फेफड़ों के कैंसर से लेकर बच्चों के दिमाग पर भी देखा जा रहा है बुरा असर, सामने आई इसकी बड़ी वजह

Mon, 21 Jul 2025 06:48 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

माइक्रोप्लास्टिक आज 'अंटार्कटिका की बर्फ से लेकर महासागरों की गहराइयों, पहाड़ों, मिट्टी, हवा, पानी और यहां तक कि मानव रक्त, मस्तिष्क और फेफड़ों तक में अपनी पैठ बना चुका है। यह अध्ययन उस खतरनाक मोड़ को दर्शाता है जहां केवल पर्यावरण ही नहीं, मानव शरीर भी प्लास्टिक प्रदूषण का शिकार बन चुका है।
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माइक्रोप्लास्टिक का फेफड़े और ब्रेन पर असर - फोटो : Freepik.com
दुनियाभर में तेजी से क्रॉनिक बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। लिहाजा हृदय रोग, डायबिटीज और कैंसर के मामले जो कुछ दशकों पहले तक उम्र बढ़ने के साथ होते थे, वह अब न सिर्फ बच्चों तक को अपना शिकार बना रहे हैं बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं पर अतिरिक्त दबाव भी बढ़ाते जा रहे हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि इसमें कई पर्यावरणीय कारकों की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है, बढ़ते माइक्रोप्लास्टिक का प्रदूषण उनमें से एक है जिसको लेकर विशेषज्ञ काफी चिंतित हैं।

क्या आपको पता है कि रोजाना हमारे शरीर में अनजाने में ही सही, प्लास्टिक का कचरा इकट्ठा होता जा रहा है? वैज्ञानिकों ने पाया कि हर इंसान एक हफ्ते में लगभग 5 ग्राम तक माइक्रोप्लास्टिक निगल रहा है। ये छोटे-छोटे प्लास्टिक के टुकड़े जिन्हें माइक्रोप्लास्टिक कहते हैं, हमारी हवा, पानी, खाने और यहां तक कि नमक में भी मिल चुके हैं।

लैंसेंट प्लैनेटरी हेल्थ की साल 2023 की एक रिपोर्ट बताती है कि माइक्रोप्लास्टिक कोशिकाओं में इंफ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस बढ़ा सकता है, जिससे कैंसर जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ता जा रहा है। इसी से संबंधित एक हालिया अध्ययन की रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने बताया है कि माइक्रोप्लास्टिक धीरे-धीरे फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है, इसे लंग्स कैंसर का जोखिम भी बढ़ता जा रहा है। 
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माइक्रोप्लास्टिक और इसके कारण होने वाली समस्याएं - फोटो : Freepik.com
हर तरफ बढ़ता माइक्रोप्लास्टिक का खतरा

सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि माइक्रोप्लास्टिक आज 'अंटार्कटिका की बर्फ से लेकर महासागरों की गहराइयों, पहाड़ों, मिट्टी, हवा, पानी और यहां तक कि मानव रक्त, मस्तिष्क और फेफड़ों तक में अपनी पैठ बना चुका है। यह अध्ययन उस खतरनाक मोड़ को दर्शाता है जहां केवल पर्यावरण ही नहीं, मानव शरीर भी प्लास्टिक प्रदूषण का शिकार बन चुका है।

हालिया अध्ययन में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जो प्लास्टिक रोजमर्रा की जिंदगी में आसानी से इस्तेमाल हो रहा है, वही अब हमारे शरीर में सांसों के साथ घुसकर फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को कैंसर जैसी बीमारियों की ओर धकेल रहा है।
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फेफड़ों पर माइक्रोप्लास्टिक का असर - फोटो : Adobe stock
फेफड़ों की कोशिकाओं पर माइक्रोप्लास्टिक का असर

जर्नल हैजर्डस मैटेरियल्स में प्रकाशित यह अध्ययन पहली बार वैज्ञानिक रूप से स्पष्ट करता है कि माइक्रोप्लास्टिक केवल प्रदूषण नहीं, बल्कि एक जैविक खतरा बन चुका है। दही के कप से लेकर खाने की पैकेजिंग तक जो प्लास्टिक हमारी रोजमर्रा की सुविधाओं का हिस्सा बन चुका है वही अब वैज्ञानिकों की नजर में एक गंभीर जैविक खतरा बनकर उभरा है।

ऑस्ट्रिया स्थित मेडिकल यूनिवर्सिटी ऑफ विएना के वैज्ञानिकों ने चेताया है कि हवा में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद नैनोप्लास्टिक के महीन कण हमारे फेफड़ों की कोशिकाओं में कैंसर और जैसे बदलाव पैदा कर सकते हैं।

पॉलीस्टायरीन से बने सूक्ष्म प्लास्टिक कण जिनका इस्तेमाल आमतौर पर खाद्य पैकेजिंग में होता है, फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को डीएनए क्षति, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और कोशिका वृद्धि से जुड़े जोखिमों को बढ़ाने वाला हो सकता है।

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प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल शिशु की सेहत के लिए नुकसानदायक - फोटो : Freepik.com
शिशु की सेहत पर भी बढ़ता खतरा

माइक्रोप्लास्टिक सिर्फ फेफड़ों के लिए खतरा नहीं बढ़ा रहा, इससे बच्चों की सेहत पर भी गंभीर असर हो सकता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ लंबे समय से इस बात पर जोर देते रहे हैं कि प्लास्टिक की बोतलों का इस्तेमाल शिशु की सेहत के लिए बिल्कुल ठीक नहीं है। इससे न सिर्फ शरीर में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा बढ़ने की आशंका रहती है, बल्कि इससे क्रॉनिक बीमारियों का भी खतरा हो सकता है।

स्वीडन स्थित कार्लस्टेड यूनिवर्सिटी में पब्लिक हेल्थ साइंसेज के प्रोफेसर कार्ल गुस्ताफ बोर्नहैग कहते हैं, प्लास्टिक की चीजों को बनाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन बिस्फेनॉल एफ के कारण शरीर में कई प्रकार के ऐसे परिवर्तन आ सकते हैं जिससे बच्चों की दिमागी क्षमता प्रभावित हो सकती है।
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भ्रूण की सेहत पर माइक्रोप्लास्टिक का असर - फोटो : Freepik.com
माइक्रोप्लास्टिक के कारण होने वाली इन समस्याओं को भी जानिए
  • इससे पहले यूनिवर्सिटी ऑफ वियाना के ही साल 2022 में प्रकाशित के शोध में पाया गया कि माइक्रोप्लास्टिक आंतों की परत को कमजोर कर सकता है और पाचन से जुड़ी बीमारियां बढ़ा सकता है।
  • इसके अलावा एनवायरमेंटल साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित एक अन्य शोध में विशेषज्ञों ने बताया था कि गर्भावस्था के दौरान माइक्रोप्लास्टिक का संपर्क भ्रूण तक पहुंच सकता है, जिससे गर्भावस्था से संबंधित समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है।



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स्रोत
Microplastics in the Air May Be Leading to Lung and Colon Cancers

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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