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ICMR Report: 2030 तक भारत में बढ़ सकते हैं फेफड़ों के कैंसर और मौत के मामले, इन राज्यों में सबसे ज्यादा रिस्क

Sat, 10 Jan 2026 05:01 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • फेफड़े का कैंसर पुरुषों में कैंसर से होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में गिना जाता है। धूम्रपान इसके लिए सबसे बड़ा जिम्मेदार कारक है, लेकिन अब वायु प्रदूषण, औद्योगिक धुएं और रासायनिक पदार्थों के संपर्क को भी अहम वजह माना जा रहा है।
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भारत में बढ़ता फेफड़ों का कैंसर - फोटो : Adobe Stock
कैंसर वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ती सबसे गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, जिस तरह से लोगों की दिनचर्या और खान-पान में अशुद्धि बढ़ती जा रही है उसने कैंसर के खतरे को और भी बढ़ा दिया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर के अनुसार, बदलती जीवनशैली, पर्यावरणीय प्रदूषण, तंबाकू और शराब का बढ़ता सेवन, असंतुलित आहार और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण भी इस जानलेवा रोग का जोखिम बढ़ता जा रहा है। हाल के वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि आश्चर्यजनक रूप से बच्चे भी इस रोग की चपेट में आते जा रहे है।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने लंग्स कैंसर के बढ़ते खतरे को लेकर एक हालिया अध्ययन में बड़ी चेतावनी दी है। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईजेएमआर) में छपी एक हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि 2030 तक भारत में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी होने की आशंका है। शोधकर्ताओं ने बताया कि देश में उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में फेफड़ों के कैंसर के मामले बढ़ने का खतरा सबसे ज्यादा है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञ सभी लोगों को लंग्स कैंसर से बचाव को लेकर सावधानी बरतते रहने की सलाह देते हैं।
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लंग्स कैंसर का खतरा - फोटो : Adobe Stock
महिलाओं में तेजी से बढ़ सकते हैं कैंसर के मामले

डब्ल्यूएचओ कहता है, फेफड़ों का कैंसर एक गंभीर और तेजी से बढ़ती सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है जिससे दुनिया भर में हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। 
  • साल 2022 में, अनुमानित 20 मिलियन (दो करोड़) नए कैंसर के मामले सामने आए और 9.7 मिलियन (करीब 97 लाख लोगों की मौत हो गई। 
  • हर 5 में से 1 व्यक्ति को अपने जीवनकाल में कैंसर होता है वहीं लगभग 9 में से 1 पुरुष और 12 में से 1 महिला की इस बीमारी से मौत हो जाती है।
आईसीएमआर ने इस रिपोर्ट में चेताया है कि महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के मामले पुरुषों की तुलना में ज्यादा हो सकते हैं। धूम्रपान की बढ़ती आदत, सेकेंड हैंड स्मोकिंग, लाइफस्टाइल में गड़बड़ी को इस रोग के बढ़ते मामलों का प्रमुख कारण पाया गया है।
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फेफड़ों की बढ़ती समस्याएं - फोटो : Freepik.com
नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में बढ़ता खतरा

आईसीएमआर की रिपोर्ट कहती है, नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों में फेफड़ों के कैंसर के मामले सबसे ज्यादा बढ़ने की आशंका है। बहुत ज्यादा तंबाकू के इस्तेमाल के चलते इस क्षेत्र में पुरुषों में 68% वहीं महिलाओं में 54% से ज्यादा मामले रिपोर्ट किए गए हैं। 
  • डॉक्टरों का कहना है कि बीमारी का पैटर्न अब बदल रहा है। हम उन महिलाओं में भी तेजी से लंग्स कैंसर के बढ़ते खतरे को देख रहे हैं जो धूम्रपान नहीं करती हैं।
  • ऐसी महिलाओं में फेफड़ों के कैंसर के बढ़ने के कारणों का जब पता लगाया गया तो इसमें इनडोर वायु प्रदूषण, बायोमास ईंधन के इस्तेमाल और सेकंड-हैंड स्मोक के साथ काम की जगह पर रसायनों को संपर्क को मुख्य कारण पाया गया है।
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फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए क्या करें? - फोटो : Freepik.com
लंग्स कैंसर से बचाव के करें उपाय

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं सभी लोगों को इस बढ़ते खतरे को लेकर अलर्ट रहने की जरूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार साफ हवा, तंबाकू से दूरी और नियमित स्वास्थ्य जांच से लंग्स कैंसर के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
  • धूम्रपान से पूरी तरह दूरी बनाना फेफड़ों के कैंसर से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है। 
  • सिगरेट और बीड़ी के धुएं में मौजूद कैंसरकारी रसायन सीधे फेफड़ों की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं।
  • पैसिव स्मोकिंग यानी सिरगेट के धुएं के संपर्क में आने से भी फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ता है, इसलिए धूम्रपान करने वालों से दूरी बनाए रखना जरूरी है।
  • वायु प्रदूषण भी कैंसर का बड़ा कारण है। इससे बचाव के लिए प्रदूषण वाली जगहों पर मास्क का उपयोग करें।
  • कार्यस्थल पर रसायन और औद्योगिक धुएं जैसे हानिकारक तत्वों से बचाव के तरीके अपनाकर भी जोखिम को कम किया जा सकता है।
  • नियमित शारीरिक गतिविधि और व्यायाम से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है और इम्यून सिस्टम मजबूत होता है, जिससे कैंसर का खतरा घट सकता है।
  • लंबे समय तक खांसी, सांस फूलने, सीने में दर्द या वजन घटने जैसे लक्षण दिखें तो बिना देरी डॉक्टर से जांच कराना चाहिए।



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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