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रोचक खबर: लाखों वर्षों से इंसानी जीन लेकर घूम रहा है ये वायरस, वैज्ञानिकों का बड़ा खुलासा; क्या होगा इसका असर?

Wed, 30 Sep 2026 02:04 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Latest Study: वैज्ञानिकों को अब एक ऐसा वायरस मिला है, जो इंसानों से जुड़ा एक जीन करीब एक लाख साल से अपने साथ लेकर घूम रहा है। यह जीन सिर्फ वायरस के भीतर मौजूद ही नहीं है, बल्कि आज भी डीएनए में अपनी जगह बदलने की क्षमता रखता है।
 
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जीन को लेकर बड़ा खुलासा - फोटो : Amarujala.com/AI
हमारे शरीर के अंदर मौजूद डीएनए को आमतौर पर एक ऐसी किताब समझा जाता है, जिसमें शरीर के काम करने की पूरी आनुवंशिक जानकारी दर्ज होती है। लेकिन इस किताब में कुछ ऐसे हिस्से भी हैं, जो हमेशा एक ही जगह टिके नहीं रहते। वे डीएनए के अंदर एक जगह से दूसरी जगह जा सकते हैं। इन्हें वैज्ञानिक ‘जंपिंग जीन’ कहते हैं।

कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा इंसानी आनुवंशिक तत्व खोजा है, जिसने इस कहानी को और दिलचस्प बना दिया है। बीसी200 नाम का यह जीन एक तरफ दिमाग की कोशिकाओं में पाया जाता है और शरीर की सामान्य जैविक प्रक्रियाओं में भूमिका निभाता है, वहीं दूसरी तरफ इसमें डीएनए के अंदर अपनी जगह बदलने की क्षमता भी बनी हुई है।

दिलचस्प बात यह है कि इसकी कहानी इंसानों तक सीमित नहीं है। वैज्ञानिकों को यही आनुवंशिक तत्व मोलस्कम कॉन्टेजियोसम वायरस, यानी त्वचा को संक्रमित करने वाले एक पॉक्सवायरस में भी मिला। शोधकर्ताओं के मुताबिक बीसी200 की जड़ करीब 4 करोड़ साल पुराने एक ‘जंपिंग जीन’ तक जाती है।
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वायरस को लेकर अध्ययन - फोटो : Freepik.com
वायरस में इंसानों से जुड़ा जीन

इंसान के शरीर में मौजूद जीन को आमतौर पर डीएनए के ऐसे हिस्से के रूप में देखा जाता है, जो शरीर की कोशिकाओं को जरूरी निर्देश देता है। वैज्ञानिकों को अब एक ऐसा वायरस मिला है, जो इंसानों से जुड़ा एक जीन करीब एक लाख साल से अपने साथ लेकर घूम रहा है। 
 
  • यह जीन सिर्फ वायरस के भीतर मौजूद ही नहीं है, बल्कि आज भी डीएनए में अपनी जगह बदलने की क्षमता रखता है।
  • कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के जीवविज्ञानी सेड्रिक फेशोटे और उनके सहयोगियों ने बीसी200 नामक इस जीन को मोलस्कम कॉन्टेजियोसम वायरस (एमसीवी) में पाया। यह पॉक्सवायरस परिवार का वायरस है, जो केवल इंसानों को संक्रमित करता है और त्वचा पर छोटे उभरे हुए दाने या गांठ पैदा करता है। 
  • संक्रमण आम तौर पर हल्का होता है और कुछ महीनों में ठीक हो जाता है। 
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ब्रेन में मौजूद होता है ये जीन - फोटो : Adobe Stock
जर्नल साइंस में प्रकाशित रिपोर्ट में बताया गया है कि बीसी200 में दो विशेषताएं एक साथ मिली हैं, जिन्हें पहले कभी किसी इंसानी जीन में इस तरह नहीं देखा गया था।

बीसी200 जीन के बारे में जान लीजिए

बीसी200 मुख्य रूप से न्यूरॉन्स, यानी दिमाग की उन कोशिकाओं में पाया जाता है जो एक-दूसरे तक संदेश पहुंचाने का काम करती हैं। लेकिन इसकी शुरुआत लाखों साल पहले एक ट्रांसपोसॉन से हुई थी।
 
  • ट्रांसपोसॉन डीएनए का ऐसा हिस्सा होता है, जो अपने स्थान से निकलकर जीनोम यानी शरीर के पूरे आनुवंशिक नक्शे में किसी दूसरी जगह जाकर जुड़ सकता है। इसी वजह से इन्हें आसान भाषा में ‘जंपिंग जीन’ कहा जाता है।
  • जब ऐसे ट्रांसपोसॉन किसी जीन के अंदर जाकर डीएनए का हिस्सा जोड़ देते हैं, तो उस जीन का सामान्य काम प्रभावित हो सकता है। कई बार इससे बीमारी भी हो सकती है।

अध्ययन के वरिष्ठ लेखक सेड्रिक फेशोटे के मुताबिक, आमतौर पर जब किसी ट्रांसपोसॉन से कोई नया जीन बनता है और वह शरीर के किसी काम के लिए इस्तेमाल होने लगता है, तो समय के साथ उसकी इधर-उधर जाने की क्षमता खत्म हो जाती है।
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कैंसर के जोखिमों को लेकर अध्ययन - फोटो : Adobe Stock Images
क्या बीसी200 कैंसर और अल्जाइमर से भी जुड़ा हो सकता है?

शोधकर्ताओं को यह भी शक है कि बीसी200 त्वचा की कोशिकाओं में इसलिए पहुंचा होगा, क्योंकि मोलस्कम कॉन्टेजियोसम वायरस मुख्य रूप से त्वचा की कोशिकाओं को ही संक्रमित करता है। इसके अलावा, कुछ कैंसर वाली कोशिकाओं में भी बीसी200 सामान्य से ज्यादा मात्रा में पाया गया है। अल्जाइमर रोग से पीड़ित मरीजों के दिमाग में भी इस जीन की मात्रा अधिक पाई गई है।

अभी वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इसकी ‘जंपिंग’ क्षमता इन बीमारियों में कोई भूमिका निभाती है या नहीं?



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स्रोत:
Escape of the BC200 gene to a human poxvirus reveals its persistent transposition in primates


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। ये रिपोर्ट आज के समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर तैयार की गई है। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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