क्लोरोक्वीन दवा शुरुआत में मलेरिया के लिए आई थी
इन मच्छरों में पाए जाने वाले चार तरह के पैरासाइट के कारण मलेरिया होता है। इनमें प्लासमोडियम वाइवेक्स, प्लासमोडियम ओवाले, प्लासमोडियम फेल्किपेरम और प्लासमोडियम मलेरिया शामिल हैं। भारत में 60 फीसदी मामले प्लासमोडियम वाइवेक्स की वजह से होते हैं, जिनमें सर्दी, बुखार, थकान और डायरिया जैसे लक्षण दिखते हैं।
मलेरिया के इलाज में क्लोरोक्वीन दवा बहुत ही कारगर साबित होती है। क्लोरोक्वीन दवा शुरुआत में मलेरिया के लिए ही आई थी, जिसका एडवांस वर्जन यानी उन्नत रूप है- हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन। हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन का इजाद द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान किया गया था। मलेरिया के अलावा इसे जोड़ों के दर्द के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अमेरिका की जॉन हॉपकिंस यूनिवर्सिटी के लुपस सेंटर के मुताबिक, यह दवा मांसपेशियों और जोड़ों के दर्द को कम करती है।
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष डॉ. अनिल बंसल के मुताबिक, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन, एंटी मलेरिया ड्रग क्लोरोक्वीन से थोड़ी अलग है। डॉ. बंसल कहते हैं कि इसका उपयोग आर्थराइटिस के इलाज में भी किया जाता है। अब तक की जांच में यह साबित हुआ है कि यह दवा कोरोना के इलाज में भी कुछ हद तक कारगर है। चूंकि कोरोना का इलाज नहीं है, ऐसे में इसका विकल्प के तौर पर प्रयोग किया जा रहा है।
मलेरिया की दवा (प्रतीकात्मक तस्वीर)
भारतीय दवा कंपनियां बड़े पैमाने पर मलेरिया की दवाओं का उत्पादन करती हैं। कोरोना के इलाज में इसकी भूमिका को देखते हुए प्रमुख दवा कंपनियां जायडस कैडिला और आईपीसीए को सरकार ने पर्याप्त मात्रा में दवाएं बनाने का निर्देश दिया है।
इनके अलावा अग्रणी दवा कंपनी सिप्ला, ल्यूपिन लिमिटेड, एमसीडब्ल्यू हेल्थकेयर ऑफ इंदौर, इंटास फार्मास्युटिकल्स, मैक्लीओड्स फार्माक्यूटिकल्स भी यह दवा बनाती है। इस दवा को तैयार करने के लिए जिन एपीआई यानी एक्टिव फार्माक्यूटिकल्स इंग्रेडिएंट्स की जरूरत होती है, उनकी आपूर्ति यूनीकैम रेमेडीस, लॉरस लैब्स, एबोट इंडिया, रुसान फार्मा, मंगलम ड्रग्स आदि कंपनियां करती हैं।
मलेरिया की इस दवा की भूमिका कोरोना के इलाज को लेकर और ज्यादा बढ़ गई है। पिछले दिनों भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कोरोना महामारी के उपचार के लिए इस दवा के उपयोग का सुझाव दिया था। आईसीएमआर के मुताबिक इस दवा का इस्तेमाल संक्रमित और संदिग्ध मरीजों के लिए किया जा सकता है।
Hydroxychloroquine Tablet
- फोटो : Social Media
हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय की चेतावनी है कि इस दवा का इस्तेमाल डॉक्टर के कहने पर ही किया जा सकता है। मेडिकल स्टोरों पर भी बिना डॉक्टर के रिकमेंडेशन यानी अनुशंसा के यह दवा नहीं बेची जा सकती है। यानी कि कोई व्यक्ति किसी मेडिकल स्टोर से अपने मन से हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन दवा नहीं खरीद सकता। इसे बिना डॉक्टर की अनुशंसा के खरीदना और बेचना दोनो अवैध माना जाएगा।
पिछले दिनों भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने कोरोना महामारी के उपचार के लिए इस दवा के उपयोग का सुझाव दिया था। आईसीएमआर के मुताबिक इस दवा का इस्तेमाल संक्रमित और संदिग्ध मरीजों के लिए किया जा सकता है। हालांकि स्वास्थ्य मंत्रालय की चेतावनी है कि इस दवा का इस्तेमाल डॉक्टर के कहने पर ही किया जा सकता है। मेडिकल स्टोरों पर भी बिना डॉक्टर के रिकमेंडेशन यानी अनुशंसा के यह दवा नहीं बेची जा सकती है।
फिलहाल बहुत सारे कोरोना संक्रमितों के लिए जीवनरक्षक साबित हो रही इस दवा की कीमत करीब तीन रुपये से भी कम है। दरअसल, पहले दुनिया के कई देश बड़े पैमाने पर यह दवा बनाते थे, लेकिन चूंकि दवा की लागत और कीमत कम होती है। ऐसे में वैश्विक कंपनियों ने इस दवा की मांग कम होने पर बड़े पैमाने पर इसे बनाना बंद कर दिया और वर्तमान परिदृश्य में भारतीय कंपनियां ही दुनिया भर में 80 फीसदी मांग पूरी करती है।
हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन
- फोटो : social media
बीबीसी की एक रिपोर्ट में इंडियन ड्रग्स मैन्युफेक्चरर्स एसोसिएशन यानी भारतीय दवा निर्माता संघ के कार्यकारी निदेशक अशोक मदान ने कहा है कि भारत के पास अपनी आबादी के लिए पर्याप्त मात्रा में यह दवा है। उन्होंने बताया कि देश में हर महीने करीब 20 लाख यानी साल में करीब 2.40 करोड़ टैबलेट की जरूरत पड़ती है, जोकि हमारी क्षमता से लगभग नौ गुना ज्यादा है। वर्तमान में हम ये कह सकते हैं कि हम घरेलू जरूरत को सहजता से पूरा करने की स्थिति में हैं।
उनका कहना है कि हमारे पास इस दवा का कुछ सरप्लस भी है लेकिन निर्यात करने का निर्णय सरकार को ही लेना है। वहीं, एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय दवा कंपनियों ने इस दवा का उत्पादन बढ़ा दिया है और अप्रैल के अंत तक इसे बढ़ाकर चार गुना अधिक यानी 40 मीट्रिक टन कर लेंगी। वहीं, अगले महीने इसका उत्पादन 70 मीट्रिक टन होने की उम्मीद है।