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सावधान! आपका अपना ही घर कर रहा है आपको बीमार, शरीर में हो रही है इसकी कमी

Mon, 04 Jun 2018 06:36 AM IST
खुला पन्ना, अमर उजाला
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home at metropolitan city
शहरों में बढ़ते फ्लैट कल्चर के कारण अब आंगन वाले घर कम ही देखने को मिलते हैं। फ्लैट में रहना बेशक आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा हो, लेकिन यह आपको बीमार करता है। हाल ही में हुए एक शोध्ा के मुताबिक, बंद घरों में रहना या बंद ऑफिस में काम करना बेशक आरामदायक होता है, लेकिन यह हमारी हड्डियों के लिए बेहद नुकसानदेह है। इससे हड्डियां कमजोर होती हैं। बंद घरों में रहने के कारण हमारे शरीर को पर्याप्त धूप नहीं मिलती। धूप न मिलने से शरीर में विटामिन डी की कमी हो जाती है, जो हड्डियों के साथ-साथ, पाचन क्रिया को भी प्रभावित करती है।
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बंद घर में रहने का एक सबसे बड़ा नुकसान यह होता है कि हमें ताजी हवा नहीं मिल पाती। इससे कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। भारत में धूप की कोई कमी नहीं है, फिर भी लगभग 65 से 70 प्रतिशत भारतीयों में विटामिन डी की कमी है। यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के एक अध्ययन के मुताबिक, विटामिन डी की कमी से डिमेंशिया का खतरा बढ़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक शोध के अनुसार, अवसाद के मामलों में दस साल में 18 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। अवसाद की समस्या बंद घर में रहने से भ्ाी बढ़ती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि प्रकृति को निहारने, ताजी हवा और गुनगुनी धूप लेने से डिप्रेशन को काफी हद तक कम किया जा सकता है। बंद घर में रहने से लोगों में बेचैनी, अनिद्रा आदि समस्या हो सकती हैं। इससे दिल की धड़कन आसामान्य होना, हाई ब्लड प्रेशर की समस्या भी होती हैं।
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अगर घर बंद है
बंद घरों में सूरज की पर्याप्त रोशनी नहीं पहुंच पाती। घर में कृत्रिम प्रकाश के लिए हम सीएफएल, बल्ब, ट्यूबलाइट का सहारा लेते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि कृत्रिम प्रकाश सेहत के लिहाज से बिल्कुल भी सही नहीं होता। यूरोपियन कमीशन के एक शोध का कहना है कि ज्यादा देर तक कृत्रिम रोशनी में रहने से मोटापा, डायबिटीज, अवसाद, स्तन कैंसर का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके साथ ही यह आपकी नींद और मूड को भी प्रभावित करता है। 

यूएस की यूनिवर्सिटी ऑफ कनेक्टिकट हेल्थ सेंटर में कैंसर एपिडेमियालॉजिस्ट के प्रोफेसर रिचर्ड स्टीवन का कहना है कि शाम के समय घर में जितना हो सके, धीमी रोशनी का उपयोग करें, विशेषकर सोने के कमरे में। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में न्यूरोसाइंस के प्रोफेसर रसेल फोस्टर भी सूरज ढलने के बाद धीमी रोशनी के इस्तेमाल करने की वकालत करते हैं। वह कहते हैं कि सूरज की रोशनी में रहना बेहद जरूरी है, विशेषकर सुबह के समय। 
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सुबह के समय हमारी बॉडी क्लॉक सबसे अधिक संवेदनशील होती है। सुबह का नाश्ता भी प्राकृतिक  रोशनी में बैठकर कीजिए। खिड़की के पास बैठकर या बरामदे में बैठने के बजाय, घर से बाहर कुछ समय जरूर बिताएं। 

बंद घरों में ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रामें नहीं पहुंचती। घरों के भीतर मौजूद प्रदूषण दूषित हवा के साथ हमारे शरीर में जाकर फेफड़ों से जुड़ी समस्या को बढ़ाता है। इससे सांस लेने में परेशानी, दिल की धड़कन का आसामान्य होना आदि समस्या होती हैं। ताजी हवा घर के अंदर आए, इसके लिए खिड़कियों को खुला छोड़ें। सूरज की रोशनी को घर के अंदर आने दें। रात के समय घर की खिड़कियों को खुला रखें। इससे बासी हवा बाहर जाएगी और ताजी हवा घर के भीतर आएगी। घर के भीतर व बालकनी में एक छोटी बगिया बनाएं। इससे मन भी प्रसन्न रहेगा और तनाव जैसी समस्या भी नहीं होगी।
 
स्कॉटलैंड की स्टर्लिंग यूनिवर्सिटी में हुए एक शोध के अनुसार, बंद घर में रहना डिप्रेशन को बढ़ाता है। डिप्रेशन को दूर करने के लिए टहलना, पेड़ों के बीच जाना, बाहरी वातावरण को देखना असरदार होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रकृति को निहारने, ताजी हवा और गुनगुनी धूप लेने से डिप्रेशन को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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