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गांजा स्वास्थ्य के लिए कितना खतरनाक है, वैज्ञानिकों को क्यों लुभाती हैं इसकी खूबियां?

Mon, 28 Sep 2020 12:06 AM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Hemp - फोटो : Social Media
ड्रग तस्करों, बॉलीवुड और चंदन तस्करों की कथित साठगांठ को लेकर हाल के सालों में जो सबसे गंभीर चर्चा छिड़ी है उसका असर मनोरंजन और मीडिया जगत समेत कई और क्षेत्रों पर पड़ा है। बॉलीवुड इंडस्ट्री से जुड़े बड़े नामों से लेकर ड्रग तस्करों के जाल में फंस कर गांजा उगाने वाले छोटे किसानों के जीवन पर इसका कितना असर होगा, ये समझने के लिए अभी और वक्त लगेगा। लेकिन ऐसा लगता है कि इस विवाद का बड़ा असर गांजे के पौधे के औषधीय गुणों और इसके गैर-नशीले और लत न लगने से जुड़े गुणों को लेकर जारी वैज्ञानिक शोध पर पड़ रहा है।

जांच एजेंसियों और मीडिया का गांजा और कृत्रिम नशीले पदार्थों को एक ही चश्मे से दिखाने का असर ये हो रहा है कि कई लोग अब ये मानने लगे हैं कि गांजे का पूरा पौधा न केवल बुरा है बल्कि बेहद हानिकारक है। ये हालात तब हैं जब इस पौधे को लेकर किए गए वैश्विक रिसर्च में ये बात सामने आई है कि इसके गैर-नशीले और लत न लगने हिस्सों का इस्तेमाल मिर्गी, मानसिक विकारों, कैंसर के मरीजों में दर्द कम करने, कई तरह के स्क्लेरोसिस और त्वचा की बीमारियों में किया जा सकता है।
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Hemp - फोटो : File
बंगलूरू में मौजूद नम्रता हेम्प कंपनी के प्रबंध निदेशक हर्षवर्धन रेड्डी सिरुपा ने बीबीसी को बताया, "इसका असर ये होगा कि गांजे की खेती और इससे इंडस्ट्रीयल और मेडिसिनल प्रोडक्ट बनाने के लिए रिसर्च की अनुमति देने के लिए नियमन प्रक्रिया बनाने का फैसला लेने में अब तीन से चार साल की देरी हो सकती है।" 

सिरुपा का डर उन व्यवसायियों के डर से मिलता-जुलता है जिन्होंने ये सोच कर इस क्षेत्र में कदम रखा है कि कानून में उचित बदलाव के साथ इस पौधे का इस्तेमाल कृषि और बागवानी, कपड़ा उद्योग, दवा और स्वास्थ्य सेवा जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है। इन उद्यमियों का आकलन है कि साल 2025 तक ये इंडस्ट्री 100 से 150 अरब अमेरिकी डॉलर की हो सकती है।
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Hemp - फोटो : File
भारत में गांजा कितना बड़ा खतरा है?
दिल्ली के एम्स में नेशनल ड्रग डिपेन्डेन्स ट्रीटमेन्ट सेंटर (एनडीडीटीसी) और मनोचिकित्सा विभाग में प्रोफेसर डॉक्टर अतुल अम्बेकर ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मूल रूप से इस पूरे विषय में कई ग्रे एरिया है। इस मामले में अगर ये तय हो कि क्या मान्य होगा और क्या नहीं तो इससे काफी मदद मिल सकती है। लेकिन आम तौर पर हमारे मौजूदा कानून ये संदेश देते हैं कि इससे दूर रहो। इसके नजदीक जाने की कोई जरूरत नहीं है।"

विडंबना ये है कि ये कानून उस दौर में मौजूद हैं जब एम्स और एनडीडीटीसी ने देश में की अपनी ताजा स्टडी में पाया है कि हमारे समाज को सबसे अधिक खतरा कहां से है। इस स्टडी के लिए बीते साल सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्रालय ने आर्थिक मदद दी थी।

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Hemp - फोटो : File
डॉक्टर अम्बेकर कहते हैं, "130 अरब की आबादी में करीब दो करोड़ लोग भांग (भारत में भांग कानूनी तौर पर उपलब्ध होता है), चरस और गांजा जैसे गांजे के पौधे से बने उत्पादों का इस्तेमाल करते हैं। ये देखना भी दिलचस्प है कि वैश्विक औसत के मुकाबले भारत में गांजे का इस्तेमाल कम है (3.9 फीसदी बनाम 1.9 फीसदी)। इसके मुकाबले भारत के लिए चिंता का विषय है अफीम से बनने वाला हेरोइन। जहां दुनिया में औसतन 0.7 फीसदी लोग अफीम से बने नशीले पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं वहीं भारत में 2.1 फीसदी लोग इस तरह के पदार्थों का इस्तेमाल करते हैं।"

यही वो कारण है जिस कारण मौजूदा स्थिति को देखते हुए गांजे के पौधे को लेकर काम करने वाले कुछ उद्यमी असमंजस में हैं।  मौजूदा कानून के मुताबिक नार्कोटिक ड्रग एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (एनडीपीएस एक्ट या स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985) राज्यों को इस मामले में अपने कानून बनाने की इजाजत देता है। लेकिन उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश ऐसे दो ही राज्य हैं जिन्होंने इससे जुड़े कानून बनाए हैं। और इन कानूनों में मौजूद कमियों के कारण उद्यमियों का इस क्षेत्र में काम करना असंभव हो गया है।
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Research(File Photo) - फोटो : Amar Ujala
सिरुपा कहते हैं, "उदाहरण के तौर पर उत्तराखंड का कानून कहता है कि "गांजे के पौधे में 0.3 फीसदी से कम टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल (टीएसी) होना चाहिए। इस मामले में कोई स्पष्टता ही नहीं है। क्योंकि नमी वाले इलाकों में मौसम की मार से बचने के लिए गांजे का पौधा अधिक मात्रा में टीएचसी पैदा करता है।"

भुवनेश्वर में मौजूद डेल्टा बायोलॉजिकल्स एंड रीसर्च प्राइवेट लिमिडेट के विक्रम मित्रा का कहना है, "उत्तराखंड ने गांजे की खेती के लिए 14 उद्यमियों को लाइसेंस दिए गए हैं लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया क्योंकि इसके लिए विदेश से बीज आयात करने होते हैं। हमारी कोशिशों के बाद उत्तराखंड सरकार ने केंद्र सरकार को टीएचसी मात्रा में बदलाव करने के लिए लिखा लेकिन इस मामले में मार्च से अब तक कोई फैसला नहीं लिया गया है।"
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Research - फोटो : Pixabay
गांजे के पौधे में दो रसायन, एक में नशा पर दूजा बड़े काम का
गांजे के पौधे में जो दो रसायन पाए जाते हैं वो हैं टेट्राहाइड्रोकैनाबिनॉल यानी टीएचसी और कैनाबिडॉल यानी सीबीडी। गांजे में नशा टीएचसी की मौजूदगी के कारण होता है। लेकिन वैज्ञानिक समुदाय को पौधे में मिलने वाले दूसरे रसायन कैनाबिडॉल में दिलचस्पी है क्योंकि इसका इस्तेमाल स्वास्थ्य क्षेत्र में किया जाता है। टीएचसी में भी कई ऐसे गुण हैं जिस कारण सीमित मात्रा में लोगों के इलाज के लिए इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। डॉ. अम्बेकर कहते हैं, "अब ये स्पष्ट हो चुका है कि कैनाबिडॉल में नशे के कोई गुण नहीं हैं और इसके इस्तेमाल से किसी को नशे की लत नहीं लगती।"

कोविड-19 महामारी के कारण हुई देरी और फिर उसके बाद फिल्म इंडस्ट्री में ड्रग के मुद्दे को बॉम्बे हेम्प कंपनी (बोहेको) के निदेशक जहान पेस्तून जमास नकारात्मक नहीं मानते। इसके विपरीत वो मानते हैं कि इससे गांजे के सकारात्मक गुणों पर लोगों की दिलचस्पी बढ़ी है। वो बोहेको और राजस्थान के जयपुर में मौजूद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद के साथ हुए करार का जिक्र करते हैं और कहते हैं कि कंपनी के बनाए आयुर्वेदिक फॉर्मुले के क्लिनिकल ट्रायल के लिए ये करार किया गया है। कंपनी के बनाए फॉर्मूले का ट्रायल ऑस्टियोथोरासिस के मरीजों पर किया जाना है।
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Ayurveda(File) - फोटो : Pixabay
जहान पेस्तून जमास ने बीबीसी को बताया, "आयुर्वेद में करीब 200 अलग-अलग जगहों में गांजे का जिक्र है। हमें करीब देढ़ साल पहले लाइसेंस मिला और हमारे कई उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं। हम मुंबई के एक बड़े अस्पताल के साथ टर्मिनल कैंसर के मरीजों के बीच इससे बनी दवा के इस्तेमाल के लिए क्लिनिकल ट्रायल शुरू करने का भी इंतजार कर रहे हैं।"

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेद में इस स्टडी को मार्गदर्शन करने वाले प्रोफेसर पवन कुमार गोडतवार ने बीबीसी को बताया, "इस पौधे के मादक पदार्थ का नाम गांजा है। संस्कृत में इसे विजया कहते हैं। आयुर्वेद में इसके इस्तेमाल को बुरा नहीं माना जाता। कई आयुर्वेदिक दवाएं हैं जिनमें न केवल विजया का इस्तेमाल किया जाता है बल्कि अफीम का भी इस्तेमाल होता है। ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप इसे कैसे इस्तेमाल करते हैं और इसका इस्तेमाल कितना महत्वपूर्ण है।"

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Ayurveda(File)
मुंबई के कस्तूरबा मेडिकल सोसायटी में आयुर्वेदिक सलाहकार डॉक्टर कल्पना धुरी-शाह कहते हैं, "जिन मरीजों को ये बताया गया कि दवा में गांजा भी है, उनमें इसे लेकर कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया देखने को नहीं मिली। एक्जिमा जैसे त्वचा के रोगों में ये दवाएं बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।"

डॉ. धुरी-शाह के एक मरीज ने बीबीसी को बताया, "मेरे पैरों में खुजली शुरू हो गई थी और जहां खुजली होती थी वहां में काले धब्बे बन जाते थे। मुझे तेल दिया गया कहा गया कि इसकी दो बूंदे नाभि में डालनी हैं। डॉक्टर ने मुझे बतया था कि इसमें गांजे के पौधे का अर्क शामिल है। मुझे इस कारण किसी तरह का साइड इफेक्ट नहीं हुआ है। न ही मुझे इसकी लत लगी है। और कुछ महीनों में मेरी बीमारी भी पूरी तरह ठीक हो गई।"

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गांजा रखने पर सजा का प्रावधान!
कानूनी तौर पर बदलावों की जरूरत
मित्रा कहते हैं, "चीनी, मसालों, चाय और कॉफी की तरह सरकार ने गांजे को व्यापार की वस्तुओं के रूप में चिन्हित नहीं किया है, जो सबसे बड़ी मुश्किल है। इसे जुड़े कानून में बदलाव की जरूरत है ताकि कंपनियां रिसर्च और डेवेलपमेंट में निवेश कर सकें। कंपनियां इस क्षेत्र में निवेश नहीं कर रहीं क्योंकि इसके लिए नियमन की कोई निश्चित प्रक्रिया नहीं है। इसके व्यावसायीकरण के लिए कोई रोड मैप भी नहीं है।"

विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के सह-संस्थापक आलोक प्रसन्ना कुमार ने बीबीसी से कहा, "इसके लिए कानून में बदलाव की शुरूआत ये कहते हुए करने की जरूरत है कि गांजा रखने पर सजा का प्रावधान नहीं होगा। सबसे पहले इसके लिए एनडीपीएस एक्ट में बदलाव करना होगा। इसके साथ ही इसकी खेती और इसे बेचने के लिए भी विशेष लाइसेंस की व्यवस्था करनी होगी।"
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Ayurveda(File) - फोटो : Pixabay
वो कहते हैं कि "ये बदलाव केंद्र सरकार को करने होंगे। केंद्र सरकार को इसके लिए एक फ्रेमवर्क बनाना होगा जिसका पालन राज्य सरकारें कर सकें और लाइसेंस जारी कर सकें। फिलहाल किसी को भी गांजा से कोई लेना-देना नहीं है।" डॉ. अम्बेकर कहते हैं, "ये मजाक भी है और विडम्बना भी कि भारत में उगने वाले इस पौधे से जो दवा बनती है हमें वो विदेशों से आयात करना पड़ती हैं। हमारी भौगोलिक स्थिति को देखें तो हम इस मामले में वैश्विक लीडर बन सकते हैं।"

सिरुपा कहते हैं, "मौजूदा दौर में गांजे का सबसे अधिक, 80 फीसदी उत्पादन चीन करता है और वहां इसका इस्तेमाल धागे से लेकर कपड़े तक सभी में होता है। गांजे से जो कपड़ा बनता है उसमें एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण होते हैं।"
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