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हार्ट अटैक झेल चुके मरीज इस आसान तरीके से सुधारें अपने जीवन की गुणवत्ता

Wed, 17 Mar 2021 08:47 AM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : पेक्सेल्स

हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार सचेतन अवस्था में रहने से, ध्यान करने से दिल का दौरा झेल चुके मरीजों की जीवन गुणवत्ता में सुधार आता है। सचेतन वह अवस्था है जिसमें मनुष्य को वास्तविक क्षण के प्रति जागरुक किया जाता है। लंबे समय तक विचारों को एक जगह केंद्रित करके इस अवस्था को पाया जाता है। यह शोध लेखक डॉ केनन करदस द्वारा किया गया। अगली स्लाइड्स से जानिए शोध से जुड़ी विस्तृत जानकारी।  

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वे निम्न गुणवत्ता का जीवनयापन करते हैं - फोटो : Social media

मरीज किनिसीओफोबिया का शिकार हो जाते हैं
इएससी एक्यूट कार्डियोवस्क्युलर केयर 2021 में प्रस्तुत एक शोध के अनुसार, एक बार हार्टअटैक आने के बाद मरीज डर से ग्रसित ही रहते हैं और वे निम्न गुणवत्ता का जीवनयापन करते हैं। शोध लेखक डॉ केनन करदस का कहना है कि यह मुख्य कारण है कि एक बार हार्टअटैक आने के बाद मरीज किनिसीओफोबिया का शिकार हो जाते हैं, एक ऐसा फोबिया जिसमें लोगों की रोजमर्रा की गतिविधियों पर इसलिए रोक जाती है क्योंकि उन्हें दूसरा हार्ट अटैक आने का भय होता है। 

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सभी प्रतिभागियों को दो दलों में बांट दिया गया - फोटो : अमर उजाला

इस प्रकार है शोध
डॉ कदरस के अनुसार शोध में 56 ऐसे लोगों को शामिल किया गया जो  अपने जीवन में एक बार हार्टअटैक झेल चुके हैं। इन सभी के उम्र 55 के आसपास की थी। इन सभी प्रतिभागियों को दो दलों में बांट दिया गया। कुछ को सचेतन दल और कुछ को नियंत्रित दल में विभाजित किया। नियंत्रित दल के लोगों को दिल की बीमारियों, कार्य आदि से जुड़े एक शिक्षा संबंधी सेशन में शामिल किया गया। वहीं सचेतन दल में शामिल लोगों को वाट्सअप के माध्यम से शांत कमरे में 15 मिनट के रिकॉर्डेड निर्देश देकर ध्यान करवाया गया। उन्हें लंबी गहरी श्वास लेने और छोड़ने का अभ्यास करवाया गया। 

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प्रश्नावली से अध्ययन किया गया - फोटो : पेक्सेल्स

इन चीजों से किया अध्ययन
लोगों की थकान, दूसरे बार हार्ट अटैक आने का डर और जीवन की गुणवत्ता को चौथे, आठवें और बारहवें सप्ताह पाइपर फटिग स्केल, टेम्पा स्केल और प्रश्नावली से अध्ययन किया गया। जिससे प्रतिदिन तीन क्षेत्रों (शारीरिक, भावात्मक और सामाजिक) में उनके दिल की स्थिति पता लगाई गई। 

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मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार आया - फोटो : social media

शोध में यह पाया गया 
शुरुआत में कोई खास अंतर नहीं देखा गया। चौथे सप्ताह से सचेतन दल के मरीजों का डर नियंत्रित मरीजों के दल से कम पाया गया। आठवें एवं बारहवें सप्ताह तक मरीजों के जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार आया और भावात्मक रूप से भी उनमें परिवर्तन देखे गए। हालांकि थकान को लेकर कोई खास अंतर दोनों दलों के बीच नहीं देखा गया। 

 

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जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार आता है - फोटो : social media
शोध का निष्कर्ष
डॉ कदरस के अनुसार अध्ययन का निष्कर्ष यह निकलता है कि ध्यान करने और सचेतन की अवस्था में रहने से ह्रदयाघात झेल चुके मरीजों में जहां डर कम होता है, वहीं जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार आता है। ध्यान करने से, सकारात्मक विचारों के प्रवाह से शारीरिक और मानसिक रूप से व्यक्ति स्वस्थ और भयमुक्त रहता है। हालांकि इसके आगे भी इस विषय पर शोध होना चाहिए।
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