'दुर्गा' के जनक की अनसुनी कहानी
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डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनके संघर्ष
डॉ. मुखोपाध्याय केवल आईवीएफ के प्रयोग तक सीमित नहीं थे। उनकी वैज्ञानिक सोच उस दौर की उपलब्ध तकनीकों से कहीं आगे थी।
- उन्होंने अंडाशय को उत्तेजित करने के लिए गोनाडोट्रोपिन आधारित तकनीकों का उपयोग किया, जो बाद में दुनियाभर में मानक उपचार का हिस्सा बनीं।
- सबसे उल्लेखनीय उनका भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन यानी भ्रूण को सुरक्षित तरीके से फ्रीज कर बाद में उपयोग करने का प्रयोग था।
- आज आईवीएफ उद्योग में जो तकनीकें सामान्य मानी जाती हैं, उनमें से कई के शुरुआती प्रयोग डॉ. मुखोपाध्याय ने 1970 के दशक में ही कर लिए थे।
- डॉ. मुखोपाध्याय ने अपने शोध और निष्कर्षों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की, लेकिन समिति ने उनके दावों को अविश्वसनीय, बेतुका और फर्जी घोषित कर दिया।
- लगातार अपमान, मानसिक तनाव और पेशेवर अलगाव ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा। आखिरकार 18 जून 1981 को उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने अंतिम नोट में उन्होंने लिखा, "मैं हर दिन दिल का दौरा पड़ने से मरने का इंतजार नहीं कर सकता।"
उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप 2002 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने आधिकारिक रूप से डॉ. मुखोपाध्याय के योगदान को मान्यता दी। मरणोपरांत डॉ. मुखोपाध्याय के नाम पर कई स्मृति व्याख्यान, अनुसंधान केंद्र और पुरस्कार स्थापित किए गए। 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित डिक्शनरी ऑफ मेडिकल बायोग्राफी में स्थान मिला। 2012 में आईसीएमआर ने उनके नाम पर पुरस्कार की घोषणा की। 2020 में आईसीएमआर-राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने उनके जीवन और उपलब्धियों पर एक विशेष पुस्तक प्रकाशित की। डॉ. मुखोपाध्याय की जिंदगी पर ' एक डॉक्टर की मौत' नाम से साल 1990 में फिल्म भी बनी है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।
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