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IVF India: भारत में कब हुआ पहले आईवीएफ बच्चे का जन्म, कैसे मिली सफलता? यहां जानिए सबकुछ विस्तार से

Fri, 19 Jun 2026 01:24 PM IST
Abhilash Srivastava हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

25 जुलाई 1978 को ब्रिटेन में वैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स और डॉ. पैट्रिक स्टेप्टो के प्रयासों से दुनिया की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन का जन्म हुआ।  इसके केवल 67 दिन बाद कोलकाता में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनकी टीम ने आईवीएफ तकनीक से भारत की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी 'दुर्गा' के जन्म की घोषणा की। 
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आईवीएफ क्रांति - फोटो : Amarujala.com/AI
दुनियाभर में लाखों दंपतियां बांझपन की समस्या का शिकार हैं। हालांकि मेडिकल साइंस की क्रांति और इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) जैसी चिकित्सा प्रक्रिया ऐसे लोगों के लिए वरदान साबित हो रही है। 

'टेस्ट ट्यूब बेबी' के सपने को साकार करने के पीछे दशकों की मेहनत, असफल प्रयोग, आलोचनाएं और वैज्ञानिकों का अथक संघर्ष छिपा है। 25 जुलाई 1978 को दुनिया के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन के जन्म ने यह साबित कर दिया कि विज्ञान असंभव लगने वाले सपनों को भी हकीकत में बदल सकता है। उस ऐतिहासिक पल ने प्रजनन चिकित्सा के इतिहास में एक नया अध्याय लिख दिया। ये दुनियाभर के लाखों परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बन गया।

क्या आप जानते हैं कि भारत में पहली बार टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म कब हुआ और इसके जनक कौन हैं? 
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डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय - फोटो : आईएएनएस
भारत के पहले टेस्ट-ट्यूब बेबी के जनक

भारत में आईवीएफ की कहानी कम दिलचस्प नहीं है। यहां सीमित संसाधनों के बावजूद वैज्ञानिकों ने ऐसा काम कर दिखाया, जिसकी गूंज बाद में पूरी दुनिया में सुनाई दी। डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने उस समय आईवीएफ तकनीक पर उल्लेखनीय सफलता हासिल की। उन्हें भारत के पहले टेस्ट-ट्यूब बेबी के जनक के रूप में जाना जाता है। आज उनकी पुण्यतिथि है। 

मौजूदा समय में आईवीएफ केवल एक चिकित्सीय प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उन लोगों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम भी है जो वर्षों से माता-पिता बनने का सपना संजोए हैं पर इसमें सफलता नहीं मिल पा रही है। खराब जीवनशैली, अधिक उम्र में शादी, स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों ने प्रजनन स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाला है। ऐसे लोगों के लिए आईवीएफ या 'टेस्ट ट्यूब बेबी' वरदान साबित हो रहा है।
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आईवीएफ तकनीक से लाखों निसंतान दंपतियों को मिली उम्मीद - फोटो : Adobe Stock
इन विट्रो फर्टिलाइजेशन क्रांति

19 जून की तारीख हमें उस महान वैज्ञानिक की याद दिलाता है, जिन्होंने दुनिया के सबसे बड़े चिकित्सा चमत्कारों में से एक को भारत में संभव बनाया।

भारत के पहले टेस्ट-ट्यूब बेबी के जनक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने इन विट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक से लाखों निसंतान दंपतियों के जीवन को नई उम्मीद दी। यहां ये जानना भी जरूरी है कि भारत में इस क्रांति की नींव रखने वाले वैज्ञानिक को अपने ही देश में मान्यता पाने के लिए मौत के बाद दो दशक से अधिक इंतजार करना पड़ा। 
 
 
  • 25 जुलाई 1978 को ब्रिटेन में वैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स और डॉ. पैट्रिक स्टेप्टो के प्रयासों से दुनिया की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी लुईस ब्राउन का जन्म हुआ। 
  • इसके केवल 67 दिन बाद कोलकाता में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनकी टीम ने आईवीएफ तकनीक के माध्यम से भारत की पहली और दुनिया की दूसरी टेस्ट-ट्यूब बेबी कनुप्रिया अग्रवाल के जन्म की घोषणा की, जिसे 'दुर्गा' नाम दिया गया।
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'दुर्गा' के जनक की अनसुनी कहानी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/आईएएनएस
डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनके संघर्ष

डॉ. मुखोपाध्याय केवल आईवीएफ के प्रयोग तक सीमित नहीं थे। उनकी वैज्ञानिक सोच उस दौर की उपलब्ध तकनीकों से कहीं आगे थी। 
 
  • उन्होंने अंडाशय को उत्तेजित करने के लिए गोनाडोट्रोपिन आधारित तकनीकों का उपयोग किया, जो बाद में दुनियाभर में मानक उपचार का हिस्सा बनीं। 
  • सबसे उल्लेखनीय उनका भ्रूण क्रायोप्रिजर्वेशन यानी भ्रूण को सुरक्षित तरीके से फ्रीज कर बाद में उपयोग करने का प्रयोग था। 
  • आज आईवीएफ उद्योग में जो तकनीकें सामान्य मानी जाती हैं, उनमें से कई के शुरुआती प्रयोग डॉ. मुखोपाध्याय ने 1970 के दशक में ही कर लिए थे।
  • डॉ. मुखोपाध्याय ने अपने शोध और निष्कर्षों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की, लेकिन समिति ने उनके दावों को अविश्वसनीय, बेतुका और फर्जी घोषित कर दिया। 
  • लगातार अपमान, मानसिक तनाव और पेशेवर अलगाव ने उन्हें भीतर से तोड़ दिया। उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा और उन्हें दिल का दौरा भी पड़ा। आखिरकार 18 जून 1981 को उन्होंने अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली। अपने अंतिम नोट में उन्होंने लिखा, "मैं हर दिन दिल का दौरा पड़ने से मरने का इंतजार नहीं कर सकता।" 


उनके प्रयासों के परिणामस्वरूप 2002 में भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने आधिकारिक रूप से डॉ. मुखोपाध्याय के योगदान को मान्यता दी। मरणोपरांत डॉ. मुखोपाध्याय के नाम पर कई स्मृति व्याख्यान, अनुसंधान केंद्र और पुरस्कार स्थापित किए गए। 2007 में उन्हें प्रतिष्ठित डिक्शनरी ऑफ मेडिकल बायोग्राफी में स्थान मिला। 2012 में आईसीएमआर ने उनके नाम पर पुरस्कार की घोषणा की। 2020 में आईसीएमआर-राष्ट्रीय प्रजनन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने उनके जीवन और उपलब्धियों पर एक विशेष पुस्तक प्रकाशित की। डॉ. मुखोपाध्याय की जिंदगी पर ' एक डॉक्टर की मौत' नाम से साल 1990 में फिल्म भी बनी है। 



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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस के आधार पर तैयार किया गया है।

अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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