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चिंताजनक: हर तीसरे बच्चे को है ये गंभीर बीमारी, इस आदत में न किया सुधार तो कई गुना बढ़ सकते हैं मामले

Thu, 28 Nov 2024 07:16 PM IST
अभिलाष श्रीवास्तव हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

हाल के वर्षों में बच्चों में हृदय रोग, सांस की बीमारी सहित टाइप-1 डायबिटीज के मामले बढ़ते हुए रिपोर्ट किए गए हैं। एक अध्ययन से पता चलता है कि दुनियाभर में बच्चों की दृष्टि धीरे-धीरे कम होती जा रही है। हर तीन में से एक बच्चें में मायोपिया का निदान किया जा रहा है।
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बच्चों में बढ़ती आंखों की समस्याएं - फोटो : freepik.com
पिछले एक दशक में दुनियाभर में कई प्रकार की गंभीर बीमारियों के मामले बढ़ते हुए देखे गए हैं, सभी उम्र के लोगों पर इसका असर देखा गया है। बच्चे भी इससे अछूते नहीं हैं। हाल के वर्षों में बच्चों में हृदय रोग, सांस की बीमारी सहित टाइप-1 डायबिटीज के मामले रिपोर्ट किए गए हैं। वहीं एक अध्ययन में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बच्चों में बढ़ती आंखों से संबंधित बीमारियों को लेकर सवाधान किया है।

ब्रिटिश जर्नल ऑफ ऑप्थाल्मोलॉजी में प्रकाशित अध्ययन से पता चलता है, दुनियाभर में बच्चों की दृष्टि धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। हर तीन में से एक बच्चे में मायोपिया का निदान किया जा रहा है, जिसमें दूर की चीजें स्पष्ट रूप से नजर नहीं आती हैं। इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने सभी लोगों को अलर्ट करते हुए कहा है कि इस समस्या के बढ़ने की दर अगर ऐसे ही जारी रहती है और रोकथाम के उपाय न किए गए तो अगले 25 साल में ये समस्या दुनियाभर में लाखों बच्चों को प्रभावित कर सकता है। साल 2050 तक 40 फीसदी बच्चे आंखों की इस समस्या के शिकार हो सकते हैं।

आइए बच्चों में बढ़ती मायोपिया की समस्या के कारण और बचाव के बारे में जानते हैं।
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आंखों की समस्या - फोटो : Freepik.com
मायोपिया (निकट दृष्टिदोष) की समस्या

मायोपिया को निकट दृष्टिदोष भी कहा जाता है जिसमें आपको पास की चीजें तो साफ दिखाई देती हैं लेकिन दूर की चीजें देखने में कठिनाई होती है। अध्ययन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 30 वर्षों में बच्चों और किशोरों में मायोपिया के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। साल 1990 में इसके कुल मामले 24 फीसदी थे जो 2023 में बढ़कर 36 फीसदी हो गए हैं। 

चीन के सन यात-सेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने सभी छह महाद्वीपों के 50 देशों में 5.4 मिलियन से अधिक बच्चों और किशोरों को शामिल करते हुए 276 अध्ययनों के परिणामों का विश्लेषण करके अपने निष्कर्ष निकाले हैं। 
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आंखों की रोशनी जाने का खतरा - फोटो : Freepik.com
क्यों बढ़ रहे हैं मायोपिया के मामले?

अध्ययन में पाया गया है कि बच्चे और किशोरों में पहले भी ये दिक्कत देखी जा रही थी, हालांकि कोविड लॉकडाउन के दौरान चूंकि बच्चों ने घर के अंदर अधिक समय बिताया और उनका मोबाइल-लैपटॉप जैसे स्क्रीन पर अधिक समय बीता, जिसका उनकी दृष्टि पर बुरा असर हुआ है। मायोपिया गंभीर समस्या हो सकती है जिसका अगर समय पर ध्यान न दिया जाए या उपचार न हो पाए तो इसके कारण आंखों की रोशनी जाने का भी खतरा हो सकता है।

बच्चों में आंखों की समस्या के कारण उनके क्वालिटी ऑफ लाइफ पर भी असर हो सकता है, इसलिए सभी माता-पिता को इस समस्या पर गंभीरता से ध्यान देते रहने की आवश्यकता है।

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कम दिखाई देने की समस्या - फोटो : Freepik.com
मायोपिया के कारण होने वाली दिक्कतें

स्वास्थ्य विशेषज्ञ कहते हैं, बचपन में मायोपिया सिर्फ चश्मे पर निर्भरता की समस्या नहीं है बल्कि इसके कारण ग्लूकोमा और रेटिनल डिटेचमेंट जैसी आंखों की अन्य बीमारियों का जोखिम भी बढ़ जाता है। कुछ अध्ययनों का अनुमान है कि बच्चों के अलवाा वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग आधी आबादी मायोपिया से पीड़ित हो सकती है। भारत में भी बच्चों में मायोपिया की घटना लगातार बढ़ रही है।  

ज्यादातर मामलों में मायोपिया का निदान बचपन में ही किया जाता है। ये समस्या सिर्फ आंखों तक ही सीमित नही हैं, इसके कारण मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर होने का खतरा रहता है। 
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आंखों की समस्याओं पर दें ध्यान - फोटो : Freepik.com
स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताना खतरनाक

नेत्र रोग विशेषज्ञों के मुताबिक स्क्रीन टाइम ने बच्चों और युवाओं में मायोपिया के जोखिम को पहले की तुलना में काफी बढ़ा दिया है। स्मार्ट डिवाइस की स्क्रीन पर बहुत अधिक समय बिताना मायोपिया के खतरे को 30 फीसदी तक बढ़ा देता है। इसके साथ ही कंप्यूटर के अत्यधिक उपयोग के कारण यह जोखिम बढ़कर लगभग 80 प्रतिशत हो गया है। स्क्रीन टाइम को कम करना सबसे जरूरी है।

इसके अलावा कोरोना महामारी की नकारात्मक स्थितियों जैसे लोगों को ज्यादा से ज्यादा समय घरों में बीतना, बाहर खेलकूद में कमी और ऑनलाइन क्लासेज के कारण आंखों से संबधित इस रोग के मामले और भी बढ़ गए हैं। 


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स्रोत और संदर्भ
Global prevalence, trend and projection of myopia in children and adolescents from 1990 to 2050: a comprehensive systematic review and meta-analysis


अस्वीकरण: अमर उजाला की हेल्थ एवं फिटनेस कैटेगरी में प्रकाशित सभी लेख डॉक्टर, विशेषज्ञों व अकादमिक संस्थानों से बातचीत के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेख में उल्लेखित तथ्यों व सूचनाओं को अमर उजाला के पेशेवर पत्रकारों द्वारा जांचा व परखा गया है। इस लेख को तैयार करते समय सभी तरह के निर्देशों का पालन किया गया है। संबंधित लेख पाठक की जानकारी व जागरूकता बढ़ाने के लिए तैयार किया गया है। अमर उजाला लेख में प्रदत्त जानकारी व सूचना को लेकर किसी तरह का दावा नहीं करता है और न ही जिम्मेदारी लेता है। उपरोक्त लेख में उल्लेखित संबंधित बीमारी के बारे में अधिक जानकारी के लिए अपने डॉक्टर से परामर्श लें।
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