कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन पचाने की प्रक्रिया काफ़ी पेचीदा होती है. इसमें शरीर के कई अंगों का रोल होता है. जैसे जिगर, अग्न्याश्य, आंतें और प्लीहा. जब दिमाग़ की मास्टर क्लॉक ही कनफ्यूज़ हो, तो वो शरीर के दूसरे अंगों की घड़ियों को क्या निर्देश दे?
जो लोग लगातार कई दिनों तक पांच घंटे से कम सोते हैं, उनके ऊपर इंसुलिन हार्मोन का असर ख़त्म होने लगता है. इससे टाइप-2 डायबिटीज़ और दिल की बीमारियां होने लगती हैं. उनके पेट में जलन रहने लगती है.जो लोग शिफ्ट में काम करते हैं, उनके साथ ये दिक़्क़त होने की आशंका ज़्यादा रहती है. यूरोप और उत्तर अमरीकी देशों में 15 से 30 फ़ीसद आबादी किसी न किसी पाली में काम करती है. इनके मोटे होने, डायबिटीज़ और डिप्रेशन के शिकार होने की आशंका बढ़ जाती है.
वैसे भी वर्किग डे और छुट्टी के दिन सोने-जागने का वक़्त अलग ही होता है. यानी की हमारा पाचन तंत्र भी खाना पचाने के लिए इस उठा-पटक से जूझता है.तो, खाने का वक़्त बेहद अहम है. साथ ही महत्वपूर्ण ये भी है कि हम कब, कितना खाते हैं.किंग्स कॉलेज लंदन की गेर्डा पॉट ने इस बारे में रिसर्च की है. गेर्डा कहती हैं उनकी दादी हमेशा तय वक़्त पर नाश्ता और खाना खाया करती थीं. नतीजा ये कि वो 90 साल के बाद भी सेहतमंद रहीं.