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Coronavirus: क्या है हर्ड इम्यूनिटी, जिसे कोरोना वायरस से जंग में बताया जा रहा बड़ा हथियार?

Sat, 28 Mar 2020 02:56 PM IST
निलेश कुमार लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना वायरस से होने वाली मौतों का आंकड़ा हर दिन बढ़ रहा है। - फोटो : PTI/Amar ujala
चीन से शुरू हुए कोरोना वायरस के संक्रमण का दायरा एशिया, यूरोप से होते हुए अब अफ्रीका तक पहुंच चुका है। इससे होने वाली मौतों का आंकड़ा हर दिन बढ़ रहा है। कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण को देखते हुए दुनियाभर के कई देशों की सरकारें इसे रोकने के प्रयास में लगी हुई है। वैज्ञानिक जहां एक ओर इसकी दवा और वैक्सीन तैयार करने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर इसकी सस्ती जांच किट और वेंटिलेटर जैसे उपकरण तैयार किए जा रहे हैं। भारत समेत दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन किया गया है। घरों में कैद लोग यही सोच रहे हैं कि आखिर कोरोना संकट कब खत्म होगा! इस बीच एक रिपोर्ट यह आई है कि लोगों में हर्ड इम्यूनिटी यानी सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए तो कोरोना का मुकाबला करने में यह महत्वपूर्ण साबित होगा। 
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मालूम हो कि पोलियो और स्मॉल पॉक्स जैसी बीमारियों को भी वैक्सीन के जरिए हर्ड इम्यूनिटी बढ़ाकर ही हराया गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्रिटेन के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार सर पैट्रिक वैलेंस ने सरकार को सलाह दी थी कि सरकार कोरोना वायरस के असर को घटाने के लिए इसे बड़ी आबादी में फैलाया जाए, ताकि 'हर्ड इम्यूनिटी' यानी सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो जाए और कोरोना को खत्म किया जा सके। हालांकि ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से खंडन करते हुए कहा गया कि सरकार ने अभी कोई ऐसा फैसला नहीं लिया गया है। 
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ब्रिटेन के स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता मैट हैनकॉक ने कहा है कि सामूहिक प्रतिरोधक क्षमता किसी भी महामारी का स्वाभाविक सह उत्पाद है। यानी महामारी के फैलने के साथ ही लोगों में अपने आप हर्ड इम्यूनिटी विकसित हो जाती है। हर्ड इम्यूनिटी को समझने के लिए सबसे अच्छा उदाहरण पोलियो है। लोगों को विकलांग कर देने वाली इस बीमारी से पूरी दुनिया डर गई थी, लेकिन भारत समेत दुनिया की लगभग आबादी पोलियो से इम्यून हो चुकी है। 
 

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क्या है हर्ड इम्यूनिटी
हर्ड इम्यूनिटी मेडिकल साइंस की एक बहुत पुरानी प्रक्रिया है, जिसके तहत देश की 60 फीसदी से अधिक आबादी को वायरस से संक्रमित करना होता है, ताकि उनका शरीर इस वायरस से लड़ने के लिए इम्यून हो जाए और भविष्य में कभी इस वायरस संक्रमण उनमें ना फैले। सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के अनुसार, वैक्सीनेसन या संक्रमण के द्वारा हर्ड इम्यूनिटी विकसित की जाती है। इसे अपना कर किसी समाज या समूह में बीमारी के फैलने की शृंखला तोड़ी जा सकती है।


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यह काम कैसे करती है 
हर्ड इम्यूनिटी विकसित करने के लिए सबसे पहले बीमारी के फैलने के तरीके और उसके लिए  जरुरी हर्ड इम्यूनिटी लिमिट का पता लगाना होता है। लिमिट जानने के लिए महामारी वैज्ञानिक आरओ यानी मूल प्रजनन क्षमता स्टैंडर्ड का इस्तेमाल करते है। इसे बेसिक रिप्रॉडक्टिव नंबर(Basic Reproductive Number-R0) कहा जाता है। यह बताता है कि किसी एक संक्रमित व्यक्ति से और कितने लोग संक्रमित हो सकते हैं। इस स्टैंडर्ड के आधार पर ही इसके प्रयोग को आगे बढ़ाया जा सकता है। आईसीएमआर की रिपोर्ट के अनुसार कोरोना से पीड़ित एक व्यक्ति अन्य चार लोगों को संक्रमित कर सकता है। कम्यूनिटी ट्रांसमिशन यानी सामुदायिक प्रसार में यह संख्या बढ़ भी सकती है। 
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कोरोना से खिलाफ कितना कारगर
कोरोना से संक्रमित होने वाले ज्यादातर लोग कमजोर इम्यून सिस्टम वाले हैं। इसमें बुजुर्ग के साथ हार्ट पेशेंट हैं या बीपी के मरीज भी शामिल हैं। वैक्सीनेसन यानी टीकाकारण का तरीका अपनाया जाए तो इसमें बहुत लंबा समय लग सकता है। संक्रमण वाला तरीका भी जोखिम भरा हो सकता है। जानकारों के मुताबिक इस प्रोसेस में उन्हीं लोगों को शामिल किया जा सकता है, जिनके अंदर इम्यूनिटी का निरंतर विकास हो सकता है। ऐसे में हर्ड इम्यूनिटी को इस्तेमाल करने में बहुत अधिक समय लग सकता है। 
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इस खतरनाक कोरोना वायरस के खिलाफ अगर हर्ड इम्यूनिटी को अपनाने का दबाव वैज्ञानिकों पर आता है तो ये सही काम कर सकेगा, इसका न तो कोई प्रमाण है और न ही अनुमान लगाया जा सकता है। ब्रिटिश वायरोलॉजिस्ट (विषाणु विज्ञानी) डॉ. जेरेमी रॉसमैन का कहना है कि कोरोना वायरस के खिलाफ लोगों को बचाने के लिए टीका उपलब्ध नहीं है, ऐसे में हर्ड इम्यूनिटी एक अच्छी सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति नहीं हो सकती है। अन्य पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट भी इसके बढ़ते संक्रमण के बीच लोगों से खुद को और दूसरों की सुरक्षा के लिए सोशल डिस्टेंसिंग और साफ-सफाई जैसे बचाव के उपाय अपनाने पर जोर दे रहे हैं। 
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