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चिंता की बात: कोरोना के वैरिएंट सुपर-सेल में फैलकर एंटीबॉडीज से बचने में सक्षम, अध्ययन में दावा

Sun, 13 Jun 2021 02:45 PM IST
सोनू शर्मा हेल्थ डेस्क, अमर उजाला, बर्मिंघम
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कोरोना वायरस - फोटो : iStock
कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बाद या वैक्सीन लग जाने के बाद हमारे शरीर में वायरस के खिलाफ एंटीबॉडीज बन जाती हैं, जो संक्रमण से बचाव करती हैं और गंभीर रूप से बीमार होने से भी बचाती हैं। लेकिन हाल के दिनों में कोरोना के ऐसे कई स्वरूपों का पता चला है, जो एंटीबॉडीज से बच कर संक्रमण फैलाने में सक्षम हैं। अब एक नए अध्ययन में यह पता चला है कि कोरोना वायरस के स्वरूप सुपर-सेल में फैलकर एंटीबॉडीज से बच सकते हैं। अध्ययन के मुताबिक, अधिक संक्रामक कोरोना वायरस मानव कोशिकाओं में बदलाव कर सकता है। वह संक्रमित कोशिका को आसपास की कोशिकाओं के साथ जोड़कर उन्हें सुपर-सेल में बदल सकता है। आकार में सामान्य कोशिकाओं के मुकाबले बड़े होने और जेनेटिक मटेरियल में समृद्ध होने के कारण ये सुपर-सेल कोरोना वायरस को फैलाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इस सुपर-सेल को सिंथिया भी कहा जाता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
अध्ययन के मुताबिक, कोशिकाओं को आपस में जोड़कर कोरोना वायरस उसे मारने में सक्षम एंटीबॉडी के संपर्क में आए बगैर अपनी संख्या बढ़ा पाता है। एलेक्स सिगल नामक शोधकर्ता और उनके सहकर्मियों ने अध्ययन में कोरोना वायरस के दो स्वरूपों, अल्फा और बीटा की एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक जाने और संचरण के दौरान उनके एंटीबॉडी के प्रति संवेदनशील होने की जांच की।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
कोरोना का अल्फा स्वरूप सबसे पहले ब्रिटेन में पाया गया था, जबकि बीटा स्वरूप दक्षिण अफ्रीका में मिला था। अध्ययन में यह बताया गया है कि ये दोनों स्वरूप एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचरण के दौरान एंडीबॉडी से सफलतापूवर्क बचने में सक्षम हैं। इससे यह पता चलता है कि अगर कोई वायरस शरीर में प्रवेश करता है तो उसे कोशिकाओं में खत्म करना ज्यादा मुश्किल होगा। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
विशेषज्ञ कहते हैं कि वायरस सदियों तक इंसानों और जानवरों के साथ रहते हैं, तो वो हमारे प्रतिरक्षा तंत्र द्वारा पहचाने जाने से बचने के तरीके ईजाद कर लेते हैं। यह माना जाता है कि एंटीबॉडीज स्वस्थ कोशिका में वायरस के प्रवेश को रोकने के लिए सबसे प्रभावी हैं और शरीर के उन हिस्सों में कम प्रभावी हैं, जहां संक्रमण पहले से मौजूद है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
अब सवाल उठता है कि उन लोगों में क्या होता है जो बुजुर्ग हो गए हैं या जिनके प्रतिरक्षा तंत्र के हिस्से बेकार हो गए हैं? विशेषज्ञ कहते हैं कि कोरोना वायरस का संक्रमण आमतौर पर युवाओं, स्वस्थ किशोरों और बच्चों में दो हफ्तों के भीतर नियंत्रित हो जाता है, लेकिन जिन लोगों में बेकार टी-कोशिका होती है, उनमें एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक संचरण न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज को रोक सकता है और संक्रमण लंबे वक्त तक रह सकता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
टी-कोशिका क्या है? 
  • विशेषज्ञों के मुताबिक, 'टी-कोशिकाएं श्वेत रक्त कोशिकाएं होती हैं, जो टीकाकरण या संक्रमण के बाद संक्रमित कोशिकाओं को मार देती हैं। एक कोशिका से दूसरी कोशिका तक वायरस के संचरण से उनके संक्रमण फैलाने की क्षमता कम नहीं होती। ये कोशिकाएं एंटीबॉडीज बनाने में भी सक्षम होती है। टी-कोशिकाएं पुराने संक्रमण को याद रख सकती हैं और जब वही वायरस दोबारा हमला करता है तो वह तेजी से उसे रोकने का काम करती हैं।'  
स्रोत और संदर्भ:  
Coronavirus variants can evade antibodies by spreading via super-cells – new research 
https://theconversation.com/coronavirus-variants-can-evade-antibodies-by-spreading-via-super-cells-new-research-162197 

अस्वीकरण नोट: यह लेख 'द कनवर्सेशन' नामक वेबसाइट पर प्रकाशित स्टडी के आधार पर तैयार किया गया है। लेख में शामिल सूचना व तथ्य आपकी जागरूकता और जानकारी बढ़ाने के लिए साझा किए गए हैं। किसी भी तरह की बीमारी के लक्षण हों अथवा आप किसी रोग से ग्रसित हों तो अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लें। 
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