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Coronavirus: कोरोना वायरस आखिर कैसे करता है म्यूटेट और एंटीबॉडी से बचता है, अध्ययन में हुआ खुलासा

Fri, 05 Feb 2021 01:14 PM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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कोरोना वायरस - फोटो : iStock
कोरोना वायरस के बारे में पूरी तरह जानने के लिए कई शोध चल रहे हैं। चूंकि यह वायरस लगातार अपना रूप बदल रहा है, ऐसे में वैज्ञानिकों ने ये पता लगा लिया है कि कैसे कोरोना वायरस म्यूटेट कर रहा है और कैसे यह शरीर में विकसित एंटीबॉडीज से भी बच रहा है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययन के मुताबिक, कोरोना वायरस अपने जेनेटिक सीक्वेंस (अनुवांशिक क्रम) के उस हिस्से को खत्म कर दे रहा है जिससे उसकी स्पाइक प्रोटीन का आकार बदल जाता है। इस अध्ययन को 'साइंस' नामक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
क्या है स्पाइक प्रोटीन? 

दरअसल, स्पाइक प्रोटीन कोरोना वायरस की उस बाहरी परत को कहते हैं, जो कांटों की तरह दिखती है। ये स्पाइक प्रोटीन शरीर की कोशिकाओं से जाकर चिपक जाता है और फिर इसके कांटे कोशिकाओं की बाहरी परत को भेद देते हैं, जिससे वायरस कोशिकाओं के अंदर प्रवेश कर जाता है और फिर वह खुद को विकसित करने लगता है।  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया से स्पाइक प्रोटीन के 1.50 लाख जीन सीक्वेंस इकट्ठा किए। जब इनकी जांच की गई तो पता चला कि कोरोना वायरस के कई वैरिएंट अपने जेनेटिक सीक्वेंस के उस हिस्से को खत्म कर दे रहे हैं, जिससे बाहरी परत तैयार होती है। इस अध्ययन से पता चला कि दुनियाभर में मौजूद कोरोना के वैरिएंट में से करीब नौ ऐसे हैं, जो चिंता का कारण बने हुए हैं। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
अध्ययन में यह भी सामने आया कि कोरोना के नए म्यूटेशन वाले रूप बेहद ही खतरनाक हैं और ये वैक्सीन और एंटीबॉडी के हमला करने की ताकत से खुद को बचा लेते हैं। अध्ययन के मुताबिक, अगर किसी मरीज की प्रतिरोधी शक्ति कम है और वह 74 दिनों से संक्रमित है तो वायरस उसकी जान भी ले सकता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
इस अध्ययन में शामिल यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग के शोधकर्ता केविन मैक्कार्थी के मुताबिक, कोरोना वायरस के ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका वाले स्ट्रेन बेहद ही चिंताजनक हैं। उनका कहना है कि अगर वायरस ऐसे ही अपना रूप बदलता रहा, तो दुनियाभर के वैज्ञानिकों को इसके खिलाफ नई-नई वैक्सीन ईजाद करनी पड़ सकती हैं। 
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