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कोरोना वायरस से निपटने के लिए यहां महज 50 हजार रुपये में तैयार किए जा रहे वेंटिलेटर

Wed, 01 Apr 2020 05:01 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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Ventilator - फोटो : Social Media
पश्चिमी भारत के पुणे शहर में कुछ युवा इंजीनियर, समय के साथ दौड़ लगा कर उसे हराने की कोशिश कर रहे हैं। वो करीब 8000 वर्ग फुट के एक कारखाने में ऐसा वेंटिलेटर ईजाद करने की कोशिश कर रहे हैं, जो सस्ता हो। अगर, भारत में कोरोना महामारी फैलती है, तो अस्पतालों में मरीजों की बाढ़ आ जाएगी।

ऐसे में ये सस्ता वेंटिलेटर, हजारों लोगों की जान बचाने में काम आ सकेगा। वेंटिलेटर बनाने में जुटे ये इंजीनियर, भारत के सबसे बड़े इंजीनियरिंग कॉलेजों से निकले हैं। और वो महज दो साल पुरानी एक स्टार्ट अप कंपनी में काम करते हैं, जो बिना पानी के चलने वाले रोबोट तैयार करती है, जो सौर ऊर्जा संयंत्रों को साफ करते हैं।

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कितने वेंटिलेटर मौजूद हैं
इस कंपनी का नाम है, नोक्का रोबोटिक्स। पिछले साल इस कंपनी का टर्न ओवर महज 27 लाख रुपये था। नोक्का रोबोटिक्स में मेकैनिकल, इलेक्ट्रॉनिक और एरोस्पेस इंजीनियर काम करते हैं। इनकी औसत उम्र केवल 26 साल है। 

ज्यादातर लोगों का अनुमान है कि भारत में इस समय केवल 48 हजार वेंटिलेटर मौजूद हैं। हालांकि, किसी को पक्के तौर पर ये नहीं मालूम कि सांस लेने में मदद करने वाली इन मशीनों में से कितनी ठीक से काम कर रही हैं।

लेकिन, माना यही जा रहा है कि भारत में जो भी वेंटिलेटर उपलब्ध हैं, उनका इस्तेमाल आईसीयू में पहले से भर्ती अन्य बीमारियों के रोगियों के इलाज में हो रहा है।
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वेंटिलेटर्स को बनाने की लागत
इस नए कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले हर छह में से एक मरीज की हालत गंभीर हो जाती है। इसमें सांस लेने में परेशानी होना भी शामिल है। दुनिया के अन्य देशों के अस्पतालों की तरह ही भारत में भी मरीजों की भीड़ बढ़ने पर डॉक्टरों के सामने ये सवाल खड़ा हो जाता है कि वो किसे बचाने की कोशिश करें, और किसे जाने दें।

अभी, भारत में दो कंपनियां वेंटिलेटर बनाती हैं। इनके लिए वो विदेशों से उपकरण मंगाती हैं। इन वेंटिलेटर्स को बनाने की लागत लगभग डेढ़ लाख रुपये आती है। इनमें से एक कंपनी एगवा (AgVa) हेल्थकेयर की योजना है कि वो एक महीने में 20 हजार वेंटिलेटर का निर्माण करेगी। इसके अलावा भारत ने चीन से 10 हजार वेंटिलेटर मंगाने का भी ऑर्डर दिया है।

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वेंटिलेटर - फोटो : facebook
पोर्टेबल वेंटिलेटर के प्रोटोटाइप
लेकिन इन सबसे, वेंटिलेटर की कुल संभावित मांग का बस एक छोटा सा हिस्सा ही पूरा किया जा सकेगा। शरीर में लगाए जा सकने वाले जिस वेंटिलेटर को बनाने की कोशिश नोक्का रोबोटिक्स स्टार्ट अप कंपनी के इंजीनियर कर रहे हैं, उसकी लागत करीब 50 हजार रुपए आने का अनुमान है।

काम शुरू करने के पांच दिन के भीतर ही, इस कंपनी के सात इंजीनियर्स के एक ग्रुप ने एक पोर्टेबल वेंटिलेटर के तीन प्रोटोटाइप तैयार कर लिए हैं। इनका परीक्षण कृत्रिम फेफड़ों में किया जा जा रहा है।

ये एक प्रोस्थेटिक उपकरण होता है, जो ऑक्सीजन की आपूर्ति करता है और खून से कार्बन डाई ऑक्साइड को अलग करता है। इस कंपनी के इंजीनियर्स की योजना है कि अगर जरूरी मंजूरी मिल गई, तो 7 अप्रैल से उनके बनाए वेंटिलेटर्स का प्रयोग मरीजों पर किया जा सकेगा।
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एक प्रेरणादायक कहानी
बेंगलुरु के जयादेवा इंस्टीट्यूट ऑफ कार्डियोवैस्कुलर साइंस एंड रिसर्च के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर दीपक पद्मनाभन कहते हैं, "ये लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।" वे इस प्रोजेक्ट में नोक्का रोबोटिक्स के प्रमुख सलाहकार हैं। वो कहते हैं, "इसका प्रयोग कृत्रिम फेफड़ों पर हुआ है और वो अच्छे से काम करते दिखे हैं।"

सांस लेने में मदद करने वाली एक सस्ती और शरीर में लगाए जा सकने वाली देसी मशीन का निर्माण एक प्रेरणादायक उदाहरण है। जिसमें भारत के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र से जुड़े संस्थान मिल कर काम कर रहे हैं। भारत में ऐसा आम तौर पर देखने को नहीं मिलता है। आईआईटी कानपुर में बायोलॉजिकल साइंस के प्रोफेसर अमिताभ बंदोपाध्याय इस प्रोजेक्ट से जुड़े प्रमुख लोगों में से हैं।
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वेंटिलेटर कैसे बनाए जा सकते हैं
वो कहते हैं, "कोरोना वायरस की महामारी ने हम सब को जिस तरह एकजुट कर दिया है, उसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।" नोक्का रोबोटिक्स के युवा इंजीनयरों ने इंटरनेट पर उपलब्ध वैज्ञानिक उपकरणों को तलाशा। फिर ये जानकारी जुटाई कि वेंटिलेटर कैसे बनाए जा सकते हैं।

अधिकारियों से इजाजत लेने के बाद उन्हें पहला प्रोटोटाइप बनाने में कुल आठ घंटे लगे थे। प्रोजेक्ट से जुड़े डॉक्टरों का कहना है कि इस प्रोटोटाइप को बनाने में अमरीका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी (MIT) के बनाए कुछ डिजाइन खास तौर से मददगार साबित हुए। अब चूंकि विदेशों से आयात ठप है।

इसलिए वेंटिलेटर बना रहे इंजीनयर्स ने फेफड़ों को ऑक्सीजन की आपूर्ति नियमित करने वाले इसके प्रमुख पुर्जे यानी प्रेशर सेंसर, को इस्तेमाल हो चुके ड्रोन और बाजार में उपलब्ध अन्य स्रोतों से हासिल किया।
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शोध(File Photo) - फोटो : फाइल फोटो
पुणे से करीब 400 किलोमीटर
वेंटिलेटर में प्रेशर सेंसर की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है। क्योंकि ये फेफड़ों को इस दबाव के साथ हवा पहुंचाता है, जिससे उन्हें चोट न पहुंचे। स्थानीय अधिकारियों ने ऐसी स्थानीय कंपनियों को खुलवाने में मदद की, जहां पर वेंटिलेटर के कल-पुर्जे मिल सकते थे। हर वेंटिलेटर को बनाने में डेढ़ से दो सौ तक कल पुर्जे लगते हैं।

स्थानीय अधिकारियों ने उन इंजीनियरों को भी दोबारा उनकी कार्यशाला तक पहुंचाया, जो लॉकडाउन के कारण पुणे से करीब 400 किलोमीटर दूर नांदेड़ चले गए थे। कुछ बड़े भारतीय उद्योगपतियों (जिनमें मेडकिल उपकरण बनाने वाली प्रमुख कंपनी भी शामिल हैं) ने प्रस्ताव दिया है कि इन मशीनों को बनाने में उनके कारखानों का प्रयोग किया जा सकता है।

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कंपनी की योजना
योजना ये है कि मई महीने तक इस प्रोटोटाइप से 30 हजार वेंटिलेटर तैयार कर लिए जाएं। यानी कंपनी की योजना प्रति दिन डेढ़ से दो सौ वेंटिलेटर बनाने की है। सोशल मीडिया के असरदार लोग भी इस प्रोजेक्ट से जुड़ गए हैं।

लीथियम बैटरी बनाने वाले आईआईटी के छात्र रहे राहुल राज, केयरिंग इंडियन्स नाम के समूह के लिए आम जनता के बीच से पैसे जुटाने का काम किया। ताकि, इस महामारी से जूझने के लिए संसाधन और अनुभवों को इकट्ठा किया जा सके। राहुल राज के प्रयासों से 24 घंटे के भीतर एक हजार लोग इस अभियान से जुड़ गए थे।

राहुल राज ने बताया, "हमने एक स्थानीय सांसद और स्थानीय पुलिस से मदद मांगते हुए एक ट्वीट किया कि वेंटिलेटर बनाने वालों की मदद करें। और उन लोगों से संपर्क किया, जो ऐसे प्रोजेक्ट में दिलचस्पी ले सकते थे।"

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Dyson ventilators(सांकेतिक) - फोटो : Dyson
'बिना ताम-झाम वाली मशीन'
विदेशों में काम करने वाले कई डॉक्टर और उद्यमी, उसी भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान में पढ़े हैं, जहां के ये इंजीनियर्स हैं। जैसे गूगल के सुंदर पिचाई। सुंदर पिचाई ने इन युवा इंजीनियरों से एक वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए बात की।

उन्हें सलाह देने के साथ साथ उन्होंने कुछ सवाल भी पूछे कि वो इस मशीन को कैसे विकसित कर रहे हैं। सुंदर पिचाई ने उन्हें मशीन के उत्पादन का प्रबंधन करने के लिए लगभग डेढ़ घंटे तक मशविरा दिया। एक इंफोटेक कंपनी के पूर्व प्रमुख ने नोक्का रोबोटिक्स के जोशीले डेवेलपर्स को बताया कि वो इस मशीन के लिए कल पुर्जे कैसे जुटा सकते हैं।

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ऑक्सीजन की आपूर्ति
और आखिर में, डॉक्टरों के एक ग्रुप ने इस मशीन को बनाने के हर चरण को परखा और इन युवा इंजीनियरों से मुश्किल सवाल भी पूछे। और अंत में एक दर्जन से ज्यादा जाने माने पेशेवर लोगों, जिनमें फेफड़े के विशेषज्ञ, दिल के विशेषज्ञ डॉक्टर, वैज्ञानिक, इनोवेटर, पूंजी लगाने वाले उद्यमियों ने इन इंजीनियरों की मदद की।

डॉक्टरों का कहना है कि उनका लक्ष्य बिना ताम-झाम वाली सांस लेने में मददगार मशीन बनाने का है, जो भारतीय परिस्थितियों में कारगर साबित हो सके। वेंटिलेटर, अस्पतालों के ऑक्सीजन प्लांट से गैस आपूर्ति से चलते हैं लेकिन, भारत के बहुत से कस्बों और गांवों में पाइप से ऑक्सीजन की आपूर्ति के संसाधन नहीं हैं।

ऐसे में ये वेंटिलेटर बनाने वाले ये भी पता लगा रहे हैं कि क्या वो ऑक्सीजन सिलेंडर से चल सकने वाले वेंटिलेटर बना सकते हैं।

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Coronavirus Ventilator - फोटो : Social Media
सावधान रहने की जरूरत
डॉक्टर पद्मनाभन कहते हैं, "एक तरह से हम इस वेंटिलेटिंग मशीन का आधुनिकीकरण नहीं, बल्कि उसे पुराने दौर में ले जाने का प्रयास कर रहे हैं, जहां हम 20 साल पहले थे।"

नोक्का रोबोटिक्स के सह संस्थापक और सीईओ निखिल कुरेले कहते हैं, "हम तजुर्बेकार लोग नहीं हैं। लेकिन हमें आसानी से किसी चीज को बनाना आता है। हम जो रोबोट बनाते हैं, उन्हें बनाने का काम बहुच पेचीदा है। लेकिन, जान बचाने वाली ये मशीन बनाने में जोखिम है। तो हमें बहुत सावधान रहने की जरूरत है। ताकि ऐसा उत्पाद बना सकें, जिसे हर स्तर से मंजूरी मिल जाए।"

केवल एक हफ्ते के अंदर ही भारत को पता चल जाएगा कि नोक्का रोबोटिक्स के ये युवा इंजीनियर अपने मकसद में सफल रहते हैं या नहीं।
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वेंटिलेटर कैसे काम करते हैं?
मेडिकल वेंटिलेशन दो तरह से काम करता है
1. मेकैनिकल वेंटिलेशन-
  • इस्तेमाल हुई हवा (कार्बन डाई ऑक्साइड) मरीज के शरीर से निकाली जाती है।
  • सांस लेने वाली नली में एक ट्यूब डाली जाती है।
  • मरीज के फेफड़ों के भीतर ऑक्सीजन पहुंचाई जाती है।
  • मेकैनिकल वेंटिलेटर में ह्यूमिडिफायर भी होता है, जो शरीर के तापमान के हिसाब से हवा का तापमान बनाए रखता है और उसमें नमी मिलाता है।
2. बाहर से दिया जाने वाला वेंटिलेशन-
  • फेस मास्क को नाक और मुंह के ऊपर लगा कर सांस लेने में मदद की जाती है। शरीर के भीतर कोई नली नहीं डाली जाती।
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