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कोरोना संक्रमण से प्रभावित हो रहा टीकाकरण, बच्चों को वैक्सीन लगवाने जाएं तो ध्यान रखें ये पांच 'एस'

Thu, 07 May 2020 10:46 AM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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कोरोना वायरस और लॉकडाउन के कारण बने हालात का असर बच्चों के टीकाकरण पर भी देखने को मिल रहा है। बच्चों को जन्म के बाद लगाए जाने वाले टीके देने में मुश्किल आ रही है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक कोविड-19 के कारण पूरे दक्षिण एशिया में करीब 40 लाख 50 हजार बच्चों को नियमित टीकाकरण नहीं हो पाया है। कोविड-19 से पहले भी ऐसी स्थितियां थीं लेकिन अब ज्यादा चिंताजनक हो गई हैं।

यूनिसेफ ने चिंता जाहिर की है कि अगर बच्चों को समय से टीका या वैक्सीन नहीं दिया गया तो दक्षिण एशिया में एक और स्वास्थ्य आपातकाल का सामना करना पड़ सकता है। दुनिया के लगभग एक चौथाई (40.5 लाख) बच्चे जिनका टीकाकरण नहीं हुआ है या पूरे वैक्सीन नहीं लगे है, वो दक्षिण एशिया में रहते हैं। इनमें से करीब 97 प्रतिशत बच्चे भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में रहते हैं।
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रुका टीकाकरण अभियान
कोरोना वायरस (कोविड-19 )के चलते कई देशों में टीकाकरण बुरी तरह प्रभावित हुआ है। इसके पीछे कई कारण हैं। जैसे कुछ देशों में टीकाकरण अभियान रोक दिया गया है। वहीं, माता-पिता भी बच्चों को अस्पताल ले जाने से डर रहे हैं।

इसके अलावा टीकों के निर्माण पर भी लॉकडाउन का असर पड़ा है। दक्षिण एशिया के यूनिसेफ रीजनल ऑफिस में रीजनल हेल्थ एडवाइजर पॉल रटर का कहना है, “लॉकडाउन में यात्रा पर प्रतिबंध लगा हुआ है और उड़ाने रद्द होने के कारण कुछ देशों में वैक्सीन का स्टॉक भी तेजी से कम हो रहा है। वैक्सीन के निर्माण में दिक्कतें आ रही हैं।”
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पोलियो ड्रॉप्स
इसके अलावा कई स्वास्थ्य सुविधा केंद्र भी बंद हैं जहां लाखों बच्चों का टीकाकरण किया जाता है। यूनिसेफ के मुताबिक बच्चों को समय पर टीका लगना बेहद जरूरी है। दक्षिण एशिया के यूनिसेफ रीजनल ऑफिस की डायरेक्टर जीन गैफ ने कहा है, “हम बच्चों का टीकाकरण ना होने को लेकर बेहद चिंतित हैं। इनमें से कई बच्चे पहले ही खराब हालात में हैं। कोविड-19 से बहुत ज्यादा बच्चे गंभीर रूप से बीमारी होते नहीं दिख रहे हैं लेकिन नियमित टीकाकरण ना होने से सैकड़ों-हजारों बच्चों के स्वास्थ्य पर असर हो सकता है।”

लेकिन, कोविड-19 के कारण लोगों में डर भी बना हुआ है और वो अस्पताल या क्लीनिक में जाने से बच रहे हैं। पर टीकाकरण ना हो पाना नई स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकता है। ऐसे में जानते हैं कि समय से टीका देना क्यों जरूरी है और इसमें कितनी देरी संभव है।

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बच्चों को लगने वाले टीके
किसी बीमारी के खिलाफ बच्चे के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए उसे वैक्सीन दी जाती है। नवजात शिशु का शरीर वातावरण में मौजूद वायरस, बैक्टीरिया के हमले से अनजान होता है। ऐसे में बच्चे में कुछ खतरनाक बीमारियों के खिलाफ रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित की जाती है ताकि उस वायरस का हमला होने पर बच्चे का शरीर उससे लड़ सके। हर देश अपनी जनसंख्या और वहां मौजूद बीमारी के हिसाब से बच्चों के लिए टीके की श्रेणी बनाता है। जो टीके भारत में लगाए जाते हैं जरूरी नहीं कि वो दूसरे देशों में भी दिए जाते हों।
  • भारत में टीकाकरण का समय
जन्म पर - बीसीजी, ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV-0) और हैपेटाइटस बी
छह हफ्ते पर – डीपीटी-1, इनएक्टिवेटिड पोलियो वैक्सीन (IPV-1), OPV-1, रोटावायरस-1, न्यूमोकॉकल कॉन्जुगेट वैक्सीन (PCV-1)
10 हफ्तों पर – डीपीटी-2, OPV-2, रोटावायरस-2
14 हफ्तों पर - डीपीटी-3, OPV-3, रोटावायरस-3, IPV-2, PCV-2
9-12 महीनों पर – खसरा और रूबेला-1
16-24 महीनों पर – खसरा-2, डीपीटी बूस्टर-1, OPV बूस्टर
5-6 साल – डीपीटी बूस्टर-2
10 साल – टेटनस टोक्सॉइड?/ टेटनस एंड एडल्ट डिप्थीरिया
16 साल -टेटनस टोक्सॉइड?/ टेटनस एंड एडल्ट डिप्थीरिया
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मैक्स अस्पताल में बालरोग विभाग की प्रमुख डॉक्टर बबीता जैन बताती हैं, “बच्चे के जन्म के पहले साल में लगने वाले टीके बहुत अहम होते हैं। ये टीके समय से दिए जाने बहुत जरूरी हैं। इनमें देरी होना किसी बीमारी को न्योता दे सकता है।” जन्म के समय लगने वाले बीसीजी, पोलियो और हैपेटाइटस बी के टीके प्रसव के बाद अस्पताल में ही दे दिये जाते हैं। इसके बाद बच्चों को समय-समय पर टीके लगवाने के लिए डॉक्टर के पास जाना होता है।

कितनी देरी संभव
डॉक्टर बबीता जैन के मुताबिक, “पहले साल में लगने वाले टीकों को जितना हो सके समय से ही लगवाएं। लेकिन आजकल माता-पिता घबरा गए हैं ऐसे में एक-दो हफ्ते की देरी चल सकती है। लेकिन, इसके बाद टीका जरूर लगवा लें। बच्चों में पोलियो और खसरे का टीका बहुत ही जरूरी होता है। 18 महीने वाले टीके में थोड़ी देर सकते हैं।”

“15 महीने के बाद ज्यादातर टीके बूस्टर्स होते हैं यानी वो पहले से मौजूद रोग प्रतिरोधक क्षमता को और बढ़ाते हैं। ये वैक्सीन अगर एक-दो महीने देरी से भी लगाई जाएं तो कोई दिक्कत नहीं क्योंकि पहले से ही शरीर में कुछ रोग प्रतिरोधक क्षमता मौजूद होती है।”
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डॉक्टर बबीता का कहना है कि अगर हम ये टीके रोक देते हैं या इन्हें देर से लगाते हैं तो बच्चों को बीमारी का खतरा हो सकता है। जैसे पोलियो और खसरे जैसी खतरनाक बीमारियां पकड़ सकती हैं। वहीं, अगर कोई टीका लगने में देर हो गई है तो फिर शुरू से सभी टीके नहीं लगाए जाते। बच्चों को सिर्फ वही टीका लगाया जाता है जिसका समय है। टीका जब भी लगाया जाएगा बच्चे में उसका असर होगा।

यूनिसेफ के मुताबिक कई इलाकों में राष्ट्रीय टीकाकारण अभियान स्थगित कर दिया गया है। बांग्लादेश और नेपाल ने अपने खसरा और रुबेला राष्ट्रीय अभियान को स्थगित कर दिया है। इसी तरह पाकिस्तान और अफगानिस्तान में पोलिया अभियान रोक दिया गया है।

ऐसे में बांग्लादेश, पाकिस्तान और नेपाल के कुछ हिस्सों में खसरा और डिप्थीरिया जैसी बीमारियां देखी भी जाने लगी हैं। यूनिसेफ ने जोर देते हुए सिफारिश की है कि जहां भी टीकाकरण अभियान रुका हुआ है, वहां की सरकारें कोविड-19 महामारी नियंत्रण में आने के बाद टीकाकरण गतिविधियों को तेज करने के लिए कठोर योजना बनानी शुरू दे।
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टीके के दौरान सावधानियां
पहले लोगों को लगा रहा था कि लॉकडाउन जल्द ही खत्म हो जाएगा लेकिन फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा है। ऐसे में जितनी जल्दी हो सके बच्चों का प्राथमिक टीकाकरण कराना चाहिए। लॉकडाउन खत्म होने के इंतजार में देरी हो सकती है।

लेकिन, इस दौरान कोरोना वायरस का खतरा भी बना हुआ है। ऐसे में टीकाकरण के लिए जाते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखकर कोरोना वायरस से बचा जा सकता है। बालरोग विशेषज्ञ डॉक्टर राजीव कहते हैं कि समय पर टीका लगाना जरूरी है लेकिन फिलहाल कोरोना वायरस का भी डर है। ऐसे में आप सुरक्षा को ध्यान मे रखते हुए ऐसी जगह पर टीका लगवा सकते हैं जो सुरक्षित हो।
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डॉक्टर बबीता कहती हैं कि बच्चे को वैक्सीन लगवाने के लिए ले जाते समय पांच ‘एस’ का ध्यान रखना चाहिए। इससे आप कोविड -19 से खुद और बच्चे को सुरक्षित रख सकते हैं।
क्या हैं पांच‘एस’
  • पहला‘एस’- अपने साथ सीनियर सिटीजन यानी बुजुर्गों को ना लेकर जाएं। अक्सर लोग बच्चे के नाना-नानी, दादा-दादी को लेकर अस्पताल आते हैं। लेकिन, ऐसा करने से उन्हें कोरोना वायरस होने का खतरा है। फिर इससे पूरे परिवार को खतरा हो सकता है।
  • दूसरा‘एस’- शेड्यूल करके जाएं। पहले डॉक्टर से टाइम लें उसके बाद ही अस्पताल जाएं। इससे वहां पर ज्यादा देर रुकना नहीं पड़ेगा और लोग भी कम मिलेंगे।
  • तीसरा‘एस’- बच्चे और खुद को शील्ड करें यानी उन्हें ढकें। आप खुद मास्क पहनकर जा सकते हैं लेकिन नवजात बच्चे को मास्क ना पहनाएं। वो बहुत छोटे होते हैं। इसलिए उनके चेहरे को ढक सकते हैं।
  • चौथा‘एस’- सोशल डिस्टेंसिंग बनाए रखें। अस्पताल में कोशिश करें कि लोगों से दूरी बनाकर ही बैठें।
  • पांचवा‘एस’- सेफ ट्रांजेक्शन करें यानी पैसों का भुगतान जितना हो सके नकद की बजाए कार्ड से करें।
यूनिसेफ के पॉल रटर का कहना है, “जब तक फ्रंटलाइन पर काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मी उचित सावधानी बरतते हैं, अपने हाथ धोते हैं, तब तक टीकाकरण न करने का कोई कारण नहीं है। यह महत्वपूर्ण है कि टीकाकरण जारी रहे।”
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