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क्या आप भी तो नहीं जूझ रहे बीमारी होने के वहम से?

Sat, 09 Nov 2019 03:20 PM IST
पंखुड़ी सिंह लाइफस्टाइल डेस्क
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- फोटो : pixabay
बीमारियां हमें बहुत तकलीफ देती हैं। फिर वो चाहे बुखार हो या दौरा पड़ने की बीमारी। मगर क्या आपको पता है कि बहुत से लोग, बीमारी के वहम से तकलीफ सहते रहते हैं। डॉक्टर उन्हें समझाते हैं कि कोई दिक्कत नहीं, पर बीमारी का वहम है कि जाता ही नहीं। तो चलिए आपको बताते हैं बीमारी के वहम के बारे में और बताते हैं ऐसे वहम से परेशान लोगों के किस्से।

आयरलैंड की डॉक्टर सुजैन ओ सुलिवन ने जैसे ही मेडिकल की पढ़ाई खत्म की, उनका सामना एक अजीबोगरीब मरीज से पड़ा। इवोन नाम की युवती की शिकायत थी कि उसे कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। इवोन एक रिटेल स्टोर में काम करती थीं। एक दिन जब वे फ्रिज में सामान रख रही थीं तो, उनके साथ काम करने वाली दूसरी लड़की ने गलती से उसकी आंखों में विंडो क्लीनर स्प्रे कर दिया। इसके बाद इवोन की आंखों में जलन होने लगी।

इवोन ने आंखें धोईं और घर जाकर सो गईं। उन्होंने सोचा कि इससे उनकी आंखें बेहतर हो जाएंगी। मगर अगली सुबह उन्होंने पाया कि उन्हें तो दीवार पर टंगी घड़ी भी नहीं दिख रही थी। अगले दिन तो उन्हें दिन और रात का फर्क़ भी नहीं पता चल रहा था। डॉक्टरों ने करीब छह महीने तक पड़ताल की तो पता चला कि इवोन की आंख में कोई दिक्कत नहीं। टेस्ट के दौरान लगता था कि वो डॉक्टरों और अपने पति की तरफ देख रही थीं। मगर जब पूछा जाता था तो इवोन कहती थी कि उन्हें कुछ नहीं दिख रहा।
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डॉक्टर सुजैन ओ सुलिवन और उनके साथियों को लगा कि इवोन अपनी बीमारी का नाटक कर रही हैं। शायद वो ऐसा हर्जाने के मुकदमे के लिए कर रही थीं। बाकी साथियों से अलग सुलिवन को इवोन से हमदर्दी थी। वो बहुत प्यारी महिला थीं। मगर सुलिवन को इसका भी यक़ीन था कि वो अंधी नहीं थीं। उस वक्त तो सुलिवन को नहीं पता था। मगर आज उन्हें इवोन के इस बर्ताव की वजह मालूम हो चुकी है। आज सुजैन रॉयल लंदन हॉस्पिटल में काम करती हैं। वो उनका इलाज करती हैं जिन्हें एक से एक गंभीर बीमारी का फितूर है।

जैसे किसी को लगता है कि वह कमर से नीचे लकवे का शिकार है। किसी को लगता है कि उनके हाथ किसी जानवर के पंजे में तब्दील हो गए हैं। सुजैन की एक मरीज तो बिना मशीन के पेशाब तक नहीं कर पाती थी। इनमें से किसी को भी असल में ऐसी कोई बीमारी नहीं थी। इसी से लगता है कि बीमारी किसी अंग में नहीं, लोगों के दिमाग में होती है। जाहिर है, इवोन का दिमाग भी वो चीज महसूस नहीं कर पा रहा था, जो उनकी आंखें देख सकती थीं। इसीलिए उन्हें अंधे होने का अहसास हो रहा था।
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- फोटो : pixa
वहमों की बीमारियों पर सुजैन ओ सुलिवन ने एक किताब लिखी है। इसका नाम है, ''इट्स ऑल इन योर हेड।'' यूं तो डॉक्टर सुलिवन ने अपने करियर की शुरुआत में ही ऐसे मरीज देखे थे। मगर इसके बारे में उनकी समझ तब बढ़ी, जब उन्होंने मिर्गी की बीमारी पर स्पेशलाइजेशन शुरू किया। सुजैन के पास ऐसे मरीज आते थे जिन्हें मिर्गी के बेहिसाब दौरे पड़ते थे। वो जमीन पर गिरकर ऐंठने लगते थे। वो जमीन पर पैर पटकते, मजबूर से दिखते। मगर जब उनके दिमाग की पड़ताल होती तो उनके अंदर मिर्गी के दौरे का एक भी लक्षण नहीं दिखता था।

सुजैन ने कहा कि असल में जो बीमारी मरीज बता रहे थे, वो थी ही नहीं। वह तो वहम था उनका। मगर मेडिकल साइंस में इसकी लगातार अनदेखी होती रही है। इसीलिए सुजैन ने इसकी गहराई में जाकर पड़ताल करने का फैसला किया। जैसे ही किसी इंसान को कहा जाएगा कि उसे दरअसल वह बीमारी है ही नहीं, जिसका वह दावा कर रहा है तो वह फ़ौरन भड़क जाएगा। कहेगा कि आपको ये नाटक लगता है? क्या मैं जानकर ख़ुद को तकलीफ दे रहा हूँ? सुजैन बताती हैं कि अक्सर लोगों में हंसने, रोने, या गुस्से से कांपते वक्त कुछ बीमारियों के लक्षण दिखाई देते हैं। मसलन, कई बार ज्यादा इमोशनल होने पर हमारे अंदर ताकत न होने का अहसास होता है। कोई बुरी खबर सुनकर सिर चकराने लगता है। बिस्तर से उठना मुहाल हो जाता है।

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एक रिसर्च के मुताबिक 30 फीसद लोग ऐसे तजुर्बों को बीमारी समझकर डॉक्टर के पास जाते हैं। महिलाओं में यह तादाद 50 फीसद होती है। ज्यादातर लोग ऐसे हालात से निकलकर सामान्य जिंदगी जीने लगते हैं। मगर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो डॉक्टर सुजैन के मरीज के तौर पर सामने आते हैं। सुजैन एक बात और कहती हैं कि जिनके दिमाग में बीमारी का फितूर होता है, वो अंधेपन या थकान या दौरे के शिकार मरीजों से ज्यादा मुसीबत झेलते हैं।

सुजैन एक ऐसी मरीज का हवाला देती हैं। यह लंदन की रहने वाली कैमिला नाम की वकील थीं। कैमिला को मिर्गी के दौरे पड़ते थे। कैमिला को ये दौरे शर्मिंदगी का अहसास कराते थे। उन्हें यह जानकर तकलीफ होती थी कि दौरे पड़ने के दौरान लोग उनके पैर पर बैठकर ऐंठन रोकने की कोशिश करते थे। उनके गले में उंगली डालकर उनकी सांस सामान्य करने की कोशिश करते थे।

एक आदमी तो मदद करने के नाम पर उनकी बगल में लेट गया और फिर मोबाइल चुराकर भाग निकला। कई लोगों ने कैमिला के दौरे पड़ने के वीडियो तक बनाए और फिर उनका मज़ाक़ उड़ाने लगे। ऐसे लोगों से मिलकर यह कतई नहीं लगता कि यह बनावटी बीमार हैं। हालांकि डॉक्टर सुजैन ऐसे कई लोगों से भी मिल चुकी हैं, जो बीमारी का नाटक करते थे। ऐसी ही एक महिला थी जूडिथ। वह दावा करती थीं कि कैंसर के इलाज के लिए हुई कीमोथेरेपी से उसे दौरे पड़ने लगे हैं।
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सच का पता लगाने के लिए सुजैन ने जूडिथ को अस्पताल बुलाया। वहां उन्हें एक कमरे में रखा गया, जहां कैमरे लगे थे। जब भी जूडिथ को दौरा पड़ता, उसका वीडियो कैमरे में कैद हो जाता। कुछ ही घंटों बाद एक नर्स ने जूडिथ को फर्श पर पड़े देखा, दौरे से कांपते हुए। वह इतनी तेजी से फर्श पर गिरी थीं कि उनका हाथ तक टूट गया था। सच का पता लगाने के लिए कमरे में लगे कैमरे का वीडियो देखा गया। पता चला कि जूडिथ को कोई दौरा नहीं पड़ा था। उन्होंने अपना हाथ कई बार दीवार पर मारकर तोड़ा था और फिर आराम से फर्श पर लेटकर दौरा पड़ने का नाटक कर रही थीं।

एक प्लेट फर्श पर गिराकर उन्होंने नर्स का ध्यान अपनी तरफ खींचने की कोशिश की। बाद में पता चला कि जूडिथ को तो कभी ब्लड कैंसर भी नहीं था। जिसके इलाज की वजह से वह दौरे पड़ने का दावा करती थीं। बीमारी का नाटक करने वाले जूडिथ जैसे लोग कैमिला और इवोन जैसे लोगों की मुसीबत और बढ़ा देते हैं। जिन्हें वाकई इलाज की जरूरत है। डॉक्टर सुजैन को लगता है कि वहम की बीमारी के शिकार लोगों को सबसे ज्यादा हमदर्दी की जरूरत होती है। वैसे इलाज की जरूरत जूडिथ जैसे बीमारी का नाटक करने वालों को भी होती है। यह भी एक किस्म की बीमारी ही है। अब तक तो इसे गंभीरता से लिया ही नहीं गया। न इस पर ढंग की कोई रिसर्च हुई है। जिससे किसी बीमारी का वहम दूर किया जा सके।
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हालांकि डॉक्टर सुजैन ऐसे मरीज़ों को मनोवैज्ञानिकों के पास जाने की सलाह देती हैं। जो समझा-बुझाकर उन्हें इस तकलीफ़ से निजात दिलाते हैं। कई लोगों को वाक़ई इससे फ़ायदा हुआ है। जैसे कैमिला यह समझ पाईं कि उनके दौरे के पीछे वजह उनके बेटे की कम उम्र में मौत है। यह जानने के बाद उन्हें अपनी तकलीफ से उबरने में मदद मिली। वहीं इवोन अपनी परेशानी से उबरने और काम के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में हैं। जिंदगी की तमाम दुश्वारियों के बीच पति का साथ मिलने से इवोन भी धीरे-धीरे बेहतर हो रही हैं।
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लकवे या ऐंठन की बीमारी से परेशान लोगों को भी राहत मिल सकती है। अगर उनकी परेशानी को सही तरीक़े से समझा जा सके। उन्हें सिखाना होगा कि वो कैसे अपने पैरों का सही से इस्तेमाल कर सकें। हालांकि इसमें काफी वक्त लगता है। ऐसे लोगों को लगातार हमदर्दी और सहयोग की जरूरत होती है। डॉक्टर सुजैन को लगता है कि सबसे ज्यादा परेशानी यह है कि अक्सर डॉक्टर सही मर्ज पकड़ने में नाकाम रहते हैं। किसी बीमारी के दिमाग से कनेक्शन को समझना जरूरी है। तभी उसका सही इलाज हो सकता है। जैसे कई बार मिर्गी के मरीजों को इलाज की बेहद मुश्किल प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। 
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वो अपने परिवार, रिश्तेदार और दफ्तर के साथियों को बीमारी के बारे में बता देते हैं। बरसों बाद जब वो बीमारी के साथ जीना सीख लेते हैं, तो उन्हें समझाया जाता है कि असल में तो उन्हें मिर्गी की शिकायत है नहीं। दौरे पड़ने की वजह कुछ और है। डॉक्टर सुजैन मानती हैं कि ऐसे लोगों की मदद के लिए मेडिकल की पढ़ाई में ही कोर्स जोड़ा जाना चाहिए। ताकि डॉक्टर बनने वाले, बीमारी के वहम के शिकार लोगों की सही मदद कर सकें। अब डॉक्टर सुजैन को उम्मीद है कि उनकी किताब ''इट्स ऑल इन योर हेड'' की वजह से मेडिकल साइंस के एक्सपर्ट इसे गंभीरता से लेंगे।
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