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बिहार के गांवों में आखिर क्यों बढ़ रहे हैं कैंसर के मरीज? हैरान कर देगी यह रिपोर्ट

Sat, 07 Nov 2020 12:19 AM IST
सोनू शर्मा लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
आशा देवी चेहरे पर गहरी खामोशी लिए शाम के खाने की तैयारी कर रही हैं। 26 दिन पहले ही उनके पति की मौत गले के कैंसर से हुई है। आशा देवी कहती हैं, 'डॉक्टर ने बोला इसे कैंसर हो गया है, इसे ले जाइए पटना, लेकिन हम नहीं जा पाए। कैसे जाते, न कोई साधन था न पैसा। आखिरी दिनों में बहुत तकलीफ में थे वो।' 

बिहार में सहरसा जिले के सहरवा गांव के एक महादलित टोले में आशा एक कच्चे मकान में रहती हैं। उनके तीन छोटे बच्चे स्कूल जाने लायक हैं, लेकिन सबने पढ़ाई छोड़ दी है। कागज के नाम पर आशा अपने अनाज के खाली ड्रम से निकालती हैं अपना और मृत पति का आधार कार्ड, एक एसबीआई बैंक का कार्ड जो शायद किसी सरकारी मदद के लिए बनाया गया है और पति का मृत्यु प्रमाणपत्र। इसके अलावा उनके पास कोई कार्ड या दस्तावेज नहीं था। उनके पास कमाई का क्या जरिया है? ये पूछने पर बताती हैं कि वे दूसरों के खेतों में धान काटती हैं और बदले में उन्हें कुछ अनाज मिल जाता है जो उनकी और बच्चों की रोजी-रोटी है। ऐसे परिवार के लिए ये वाकई मुश्किल था कि वो नियमित पटना जाकर इलाज करवा सकें। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
वहां से थोड़ी दूर ही सत्तर गांव में भारती अपने पति की तस्वीर लेकर बैठी हैं, जिनकी मौत छह महीने पहले ही हुई है। उनकी पांच साल की बेटी आंगन में खेल रही है। जब उनसे उनके पति के बारे में पूछा तो वह कुछ बोल नहीं पाईं। उनके पति के बड़े भाई ने बताया कि भाई को लिवर कैंसर था। बड़े भाई ने बताया, 'हम लोग उसे दिल्ली ले जाने की तैयारी कर रहे थे, लेकिन ज्यादा गंभीर हुआ तो पहले सहरसा के अस्पताल लेकर गए, फिर पटना मेडिकल कॉलेज लेकर गए। वहीं उसकी मौत हो गई।' उनके भाई बताते हैं कि यहां इलाके में कोरोना से ज्यादा, कैंसर एक महामारी के रूप में फैल रहा है। ये परिवार पढ़ा-लिखा था और आर्थिक तौर पर मध्यम वर्ग कहा जा सकता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
थोड़ी दूर मेनवा गांव के मनोज कुमार की मां को 2004 में मुंह का कैंसर हुआ था, जिसका उन्होंने बाकायदा इलाज करवाया, लेकिन अब फिर से उनका कैंसर लौट आया है। मनोज थोड़े गुस्से में बोले, 'मीडिया में जाने से भी कुछ होता नहीं है। सरकार को ध्यान देना चाहिए कि इस क्षेत्र में कैंसर इतना क्यों बढ़ रहा है, लेकिन सरकार तो चुनाव में व्यस्त है।' 

मनोज का परिवार गांव का एक संभ्रात परिवार है। उनकी मां के कैंसर के इलाज में अब तक ढाई लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। इस खर्चे के अलावा उन्हें मुख्यमंत्री चिकित्सा कोष से भी 80 हजार रुपये मिले थे। हालांकि, ये सहायता गरीबी रेखा से नीचे वाले लोगों के लिए होती है। वह कहते हैं, 'मेरी मां परेशान है और बस प्रार्थना कर रही हैं कि वो इस दुनिया से चली जाएं। इतने दर्द में इंसान और क्या कहेगा।' 

ये तीनों परिवार एक ही इलाके के अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक वर्ग से हैं। लेकिन, तीनों में ही परिजन कैंसर के शिकार हुए हैं। फर्क बस इतना है कि जागरूकता और इलाज तक सबकी पहुंच नहीं है।

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
अचानक कैंसर के इतने ज्यादा मामले क्यों

बिहार में सहरसा का सत्तर कटैया प्रखंड मानो कैंसर का केंद्र बन गया है। जब अचानक यहां कैंसर के कई मरीज निकलने लगे तो यहीं रहने वाले एक पत्रकार अरुण लाल ने छानबीन शुरू की। उन्होंने बताया, 'मेरे पिता की मौत भी कैंसर से हुई। सत्तर गांव में 10 हजार लोग रहते हैं और मैंने खोजना शुरू किया तो देखा कि 50 लोगों की कैंसर से मौत हो चुकी थी। 35 के करीब कैंसर मरीज मुझे और मिले। खबर छपने लगी तो सिविल सर्जन ने अपनी टीम यहां भेजी। वो भी देखकर हैरान रह गए कि इतने छोटे से गांव में इतने कैंसर के मरीज कैसे। इसके बाद यहां इंदिरा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (आईजीआईएमएस) की टीम ने भी आकर देखा।'  
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आईजीआईएमएस से कैंसर सर्जन डॉक्टर शशि के नेतृत्व में एक टीम फरवरी में सत्तर गांव आई थी। उन्होंने यहां कैंप लगाकर कुछ लोगों के लक्षणों की जांच की थी। डॉक्टर शशि ने बताया, 'हम ये तो पता नहीं कर सके कि वहां इतना कैंसर किस वजह से फैल रहा है, लेकिन हमें वहां बड़ी संख्या में मरीज मिले। मान लीजिए हमारे पास अगर 70-80 लोग आए तो उनमें से 15 कैंसर मरीज मिले और ये काफी चिंताजनक बात है।' 

डॉक्टर शशि बताते हैं कि उन्होंने ये रिपोर्ट सरकार के प्रतिनिधि को सौंप दी थी। हालांकि, इसके बाद सरकार की ओर से आगे की कोई कार्रवाई नहीं हो सकी और मार्च में कोरोना वायरस की वजह से लॉकडाउन लग गया। पत्रकार अरुण लाल बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान ही यहां 15 कैंसर मरीजों की मौत हो चुकी है।
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महावीर कैंसर संस्थान, पटना - फोटो : Facebook/Bihar
चिकित्सा संसाधनों का अभाव

बिहार में पटना का महावीर कैंसर संस्थान ही एकमात्र सुपर स्पेशियलिटी कैंसर संस्थान है। संस्थान का कहना है कि बिहार में हर साल कैंसर के 80 हजार से ज्यादा नए मरीज जुड़ रहे हैं। कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर मनीषा सिंह महावीर कैंसर संस्थान में एसोसिएट डायरेक्टर हैं। वे बताती हैं कि कैंसर का ग्राफ तो बढ़ता ही जा रहा है और ये आगे भी बढ़ेगा। 

वह कहती हैं, 'भारत में जांच करवाने का कल्चर नहीं है। जब तक मरीज हमारे पास आता है तब तक काफी देर हो चुकी होती है। मरीज अपने स्थानीय डॉक्टरों के पास सालभर घूम कर हमारे पास आता है। कैंसर स्पेशलिस्ट ही बहुत कम हैं। दूसरी बात ये कि कैंसर स्पेशलिस्ट ही पता लगा सकते हैं कि 10 दिन से ज्यादा का बुखार शायद ब्लड कैंसर भी हो सकता है। हमने ये प्रस्ताव भी सरकार को दिया कि वे गांव-देहात में काम करने वाले एमबीबीएस डॉक्टरों को हमारे साथ कुछ वक्त ट्रेनिंग करवाए।' 
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पटना एम्स (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Facebook/Bihar
बिहार में कैंसर के लिए मरीज के पास सरकारी विकल्प पटना मेडिकल, नालंदा मेडिकल, एम्स और सरकारी मान्यता प्राप्त स्वायत्त अस्पताल आईजीआईएमएस ही है। इसके अलावा वह महावीर संस्थान में जा सकते हैं जो कि एक ट्रस्ट से चलता है या फिर पारस जैसे किसी प्राइवेट अस्पताल में। ये सभी सरकारी या गैर-सरकारी अस्पताल पटना जोन में हैं। 

सहरसा के पूर्व पार्षद प्रवीण आनंद लंबे वक्त से इस मुद्दे को उठा रहे हैं। उन्होंने बताया, 'हम लोगों ने सहरसा में एम्स बनवाने के लिए प्रदर्शन किए, लाख कोशिशें की, जमीन तक तय करके दी, लेकिन सरकार ने एम्स दरभंगा के लिए दे दिया। आज यहां की कैंसर की वजह से जो हालत है, तो सरकार यहां कम से कम एक कैंसर स्पेशियलटी अस्पताल ही बनवा दे।' डॉक्टर मनीषा कहती हैं कि बिहार में कैंसर स्पेशलिस्ट भी कम हैं। यहां के मेडिकल कॉलेज में ऑनकोलॉजी (कैंसर के बारे में पढ़ाई) विषय रख भी दें तो विषय को पढ़ाने के लिए भी फैकल्टी चाहिए। उसका भी अभाव है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
दूसरे इलाकों में भी बढ़ रहा है कैंसर

डॉक्टर मनीषा बताती हैं कि उनके संस्थान में भी एक रिसर्च हो रही है। इस रिसर्च में पाया गया है कि बिहार के गंगा बेल्ट के आस-पास के इलाके में पित्त की थैली का कैंसर बहुत ज्यादा है। वहां मिट्टी और पानी की स्टडी की गई और देखा गया कि वहां आर्सेनिक की मात्रा बहुत ज्यादा थी जो कि कैंसर का एक कारक है। 2016 में इंडियन मेडिकल काउंसिल की एक रिसर्च से सामने आया था कि बिहार कैंसर से सबसे ज्यादा पीड़ित राज्यों में से एक है जहां साढ़े तीन लाख से भी ज्यादा कैंसर के मरीज मिले थे। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
आयुष्मान भारत योजना का असर

आईजीआईएमएस के डॉक्टर शशि भी कहते हैं कि कैंसर के मरीज हर साल बढ़ ही रहे हैं। वह बताते हैं, 'मैं शाम के 5 बजे भी अपनी ओपीडी में बैठा हूं और अब भी 10 मरीज हैं। लॉकडाउन में सरकार ने मरीजों को देखने पर कैप लगा दिया था कि 40 से ज्यादा मरीज न देखें, लेकिन इतने मरीज आ रहे थे कि हमें वो कैप हटानी पड़ी। मैं अब भी 80 से ज्यादा कैंसर के मरीज देखता हूं। कैंसर तो पहले भी था लेकिन अब उसका पता ज्यादा लगने लगा है और आयुष्मान भारत योजना की वजह से भी लोग आ पा रहे हैं।' 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
आयुष्मान भारत योजना में गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के लिए पांच लाख रुपये तक का बीमा होता है। अगर मरीज किसी ऐसे संस्थान में जाएगा जिसका सरकार के साथ इस योजना के तहत टाइ-अप है तो वहां उसका पांच लाख रुपये तक इलाज हो सकता है। ये पैसा बाद में सरकार संस्थान को देती है। डॉक्टर मनीषा भी बताती हैं कि उनके यहां भी कई मरीज आयुष्मान भारत योजना के तहत आ रहे हैं, लेकिन कैंसर से निपटने के लिए सरकार को जांच की ओर ध्यान देना चाहिए। 

वह कहती हैं, 'जिन मरीजों के पास खाने के लिए पैसा नहीं है, उनसे कैसे कह दें कि आप वक्त से जांच क्यों नहीं करवाते। अगर सरकार मेमोग्राफी फ्री कर दे जिससे की स्तन कैंसर का पता लगाया जा सकता है तो शुरुआती स्टेज में कई महिलाओं का इलाज शुरू हो जाएगा। जब जांच फ्री होगी या सस्ती होगी तो लोग अस्पतालों में आएंगे।' 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : pixabay
कैंसर सिर्फ बिहार ही नहीं बल्कि पूरे देश की समस्या बन कर उभर रहा है। 2019 की नेशनल हेल्थ प्रोफाइल रिपोर्ट में सामने आया कि भारत में प्रति लाख व्यक्तियों पर 258 कैंसर मरीज हैं जबकि 2016 में एक लाख पर 106 कैंसर मरीज होते थे। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि 2018 में भारत में 10 लाख से ज्यादा नए कैंसर मरीज आए थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि हर 10 में से एक भारतीय को अपनी जिंदगी में कैंसर होगा और हर 15 में से एक व्यक्ति की कैंसर से मौत होगी। 
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