प्रतीकात्मक तस्वीर
सबका शरीर एक तरह से काम नहीं करता
कौन सी दवाओं का असर कितना और किस समय ज्यादा होगा ये पता लगाना इतना आसान नहीं है। इसकी रिसर्च पर मोटी रकम खर्च करनी पड़ेगी। इसके अलावा मरीज सही समय पर दवाएं लेता रहे ये भी मुमकिन नहीं है। क्योंकि मरीज को दवाओं के पीछे का गणित नहीं समझाया जा सकता। बहुत बार मरीज को ठीक होने में इसलिए भी समय लगता है, क्योंकि वो समय पर अपनी दवाएं नहीं लेते। बहुत-सी दवाएं कोर्स में चलती हैं। इनकी एक भी खुराक छोड़ दी जाए तो पूरा कोर्स बेकार हो जाता है। लेकिन ये बात सभी मरीज समझ नहीं पाते।
हर इंसान की सर्केडियन रिदम भी अलग होती है। कुछ लोग सोने, जागने और खाने के मामले में समय की पाबंदी रखते हैं। तो, कई लोग देर रात तक जागने और सुबह देर तक सोने के आदी होते हैं। इसके अलावा आज एक बड़ी आबादी रात की शिफ्ट में काम करती है। जिसकी वजह से उनकी सर्केडियन रिदम बिल्कुल अलग हो जाती है इसका असर उनकी सेहत पर भी पड़ता है। फिलहाल किसी की अंदरूनी घड़ी की चाल जानने का कोई आसान तरीका नहीं है। इसके अलावा आज अस्पतालों की इमारतें जिस तरह बन रही हैं, वो भी मरीज को जल्द ठीक करने या नहीं करने के लिए जिम्मेदार हैं। ज्यादातर अस्पतालों में छोटी खिड़कियां होती हैं, जिन पर दिन के समय भी पर्दे डले रहते हैं। मरीज ज्यादा समय तक आर्टिफिशयल लाइट में रहता है। जिससे उसकी बायोलॉजिकल रिदम प्रभावित होती है। इसके सबसे गहरे और साफ सबूत हमें दिल के मरीजों में मिलते हैं। कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम की सर्केडियन रिदम सबसे ज्यादा मजबूत होती है। जब हम सो रहे होते हैं, तो हमारा ब्लड प्रेशर सबसे कम होता है। लेकिन हम जैसे ही जागते हैं, हमारा ब्लड प्रेशर तेजी से बढ़ता है।