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एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री में कमी, क्या कम बीमार पड़ रहे हैं लोग?

Sun, 24 May 2020 11:45 PM IST
निलेश कुमार बीबीसी हिंदी
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दवा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI
लॉकडाउन का असर दवाइयों की आपूर्ति पर भले ही ना पड़ा हो लेकिन दवाइयों की बिक्री इससे जरूर प्रभावित हुई है। कोरोना वायरस के चलते हुए लॉकडाउन में एंटीबायोटिक समेत कई और दवाओं की बिक्री में कमी आई है। लोग अब पहले की तरह एंटीबायोटिक दवाएं नहीं खरीद रहे हैं।

इंडियन फार्मासिस्ट असोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी भूपेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले के मुकाबले दवाओं की बिक्री में कमी देखी गई है। ये कमी अप्रैल और मई महीने में आई है। खासतौर पर एंटीबायोटिक दवाओं की बिक्री कम हुई है।
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भूप्रेंद कुमार ने बताया, “हमें बाजार से फीडबैक मिला है कि लोग अब छोटी-मोटी बीमारियों के लिए दवाएं कम खरीद रहे हैं। ऑगमेंटीन, सेफोरॉक्सिम और सेफिक्जिम जैसे एंटीबायोटिक दवाओं कि बिक्री कम हुई है। इसके अलावा माइग्रेन, डायबिटीज और दौरे जैसी बीमारियों के लिए ली जाने वाली दवाएं भी कम बिक रही हैं। पेन किलर की खरीद भी कम हुई है।”
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क्या हैं कारण
बैक्टीरिया को मारने वाली दवाइयों को एंटीबायोटिक कहते हैं। एंटीबायोटिक अलग-अलग इंफेक्शन के इलाज में काम आती है। एंटीबायोटिक की बिक्री कम होने के पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं। लेकिन इसके दो बड़े कारण हैं एक तो ये कि लॉकडाउन में अस्पताल में ओपीडी और निजी क्लिनिक का कम खुलना और दूसरा छोटी-मोटी बीमारियों के लिए दवाएं ना लेना।

भूपेंद्र कुमार बताते हैं कि पहले लोग सर्दी, जुकाम, खांसी जैसी बीमारियों के लिए क्लिनिक पर चले जाया करते थे लेकिन लॉकडाउन में क्लिनिक ही बंद हैं। ऐसे में डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाएं नहीं लिख रहे हैं। फिर लोग कोरोना वायरस के डर से खुद भी डॉक्टर के पास जाने से बच रहे हैं। वो केमिस्ट से भी दवाएं नहीं ले रहे बल्कि छोटी-मोटी बीमारियां घरेलू उपायों से या अपने आप ठीक होने का इंतजार कर रहे हैं।
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कम बीमार पड़ रहे लोग
फोर्टिस अस्पताल में न्यूरोलॉजी के डायरेक्टर एवं हेड डॉक्टर प्रवीण गुप्ता बताते हैं कि इस दौरान ये भी देखने को मिल रहा है कि लोग कम बीमार पड़ रहे हैं। इसकी वजह है साफ-सफाई का ज्यादा ध्यान रखना। वह कहते हैं, “पश्चिमी देशों में संक्रामक रोग बहुत कम होते हैं। उसकी सबसे बड़ी वजह है साफ-सफाई। अब भारत में भी लोग कोरोना वायरस के कारण स्वच्छता का ज्यादा ध्यान रख रहे हैं। जिसके कारण उन्हें इंफेक्शन कम हो रहा है। गंदे हाथों से खाना खाने से ये इंफेक्शन शरीर में पहुंच जाता है लेकिन कोविड19 के चलते लोग बार-बार हाथ धो रहे हैं या सेनिटाइजर का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में हम ना सिर्फ कोरोना वायरस को रोक रहे हैं बल्कि दूसरी बीमारियों को भी रोक रहे हैं।”
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दवा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : PTI
डॉक्टर प्रवीण लोगों के कम बीमारी होने के पीछे कुछ और कारण भी बताते हैं-
  • लोग अभी बाहर नहीं जा रहे हैं। इसके चलते वो दूसरों के संपर्क में कम आ रहे हैं। ऐसे में ड्रॉपलेट्स के जरिए होने वाले इंफेक्शन जैसे जुकाम, वायरल फीवर और फ्लू आदि से लोग बच हुए हैं।
  • पिछले करीब दो महीनों से हम घर का खाना खा रहे हैं। बाहर का या सड़क किनारे मिलने वाला खाना भी हममें इंफेक्शन का कारण बनता है। ज्यादा तला-भुना, मसालेदार खाने से दूसरी स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें भी हो सकती हैं।
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Cough And Cold
कुछ और कारण भी हैं
  • आजकल लोग अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) बढ़ाने की कोशिश भी कर रहे हैं। कोविड19 से सुरक्षा के लिए इम्यूनिटी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है इसलिए लोग अपने खान-पान में सुधार करके इसका प्रयास कर रहे हैं। इससे भी बीमारियां कम पकड़ रही हैं।
  • लॉकडाउन के कारण देश में वायु प्रदूषण कम हुआ है। प्रदूषण के कारण जुकाम, खांसी, गले में खराबी जैसी बीमारियां सामान्य थीं। इससे सांस लेने में भी दिक्कत होती है। प्रदूषण कम होने से ये इंफेक्शन कम हो गए हैं।

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Cold Cough - फोटो : social media
  • आजकल लोग काम पर नहीं जा रहे और इसलिए खांसी, जुकाम जैसी छोटी बीमारियों को ठीक होने का समय दे पा रहे हैं। काम पर जाना हो तो तुरंत दवाई खाकर खुद को ठीक करना होता है लेकिन अब वो ऐसा नहीं कर रहे हैं।
  • डॉक्टर कहते हैं कि लोगों के लाइफस्टाइल में आया ये बदलाव एक सकारात्मक संकेत भी है। अगर वो साफ-सफाई, स्वच्छ खाने को अपनी आदत बना लेते हैं तो कई बीमारियों से निजात मिल जाएगी।
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लोग ऑनलाइन दवाइयां ज्यादा मंगा रहे हैं - फोटो : datalab
दवाओं की ऑनलाइन खरीद
एंटीबायोटिक के अलावा दूसरी दवाइयों की कम बिक्री की बात करें तो भूपेंद्र कुमार इसके पीछे ऑनलाइन खरीद को वजह मानते हैं। उनका कहना है कि लॉकडाउन में लोग केमिस्ट की बजाएं ऑनलाइन दवाइयां ज्यादा मंगा रहे हैं। वहीं, डॉ. प्रवीण के मुताबिक लॉकडाउन के कारण मरीज डॉक्टर के पास आ ही नहीं पा रहे थे। फिर कुछ दवाइयां स्थानीय केमिस्ट के पास मिलती भी नहीं हैं। मेरे कुछ मरीजों ने एक-दो महीनों की दवाइयां ही छोड़ दीं। इसलिए भी दूसरी दवाइयों की मांग कम हुई है।
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