बात कोई दो दशक पहले की है। आगरा में वाजपेयी-मुशर्रफ शिखर वार्ता का आयोजन हुआ था। मेजबान और मेहमान के खाने-पीने के बंदोबस्त का जिम्मा मेरे मित्र जिग्स कालरा को सौंपा गया था। मेनू बड़ी सावधानी से तैयार किया गया। जिग्स ने मुझे खबरदार किया, "गुरू! वाजपेयी जी खाने के जबरदस्त शौकीन हैं- कुछ कसर न रह जाए। फिर मुल्क की इज्जत का भी सवाल है। पाकिस्तानियों को नाज है अपनी लाहौर की खाऊ गली पर। हमें उन्हें यह जतलाना है कि सारा बेहतरीन खाना मुहाजिरों के साथ सरहद पार नहीं चला गया। इसके अलावा कुछ नुमाइश साझा विरासत की भी होनी चाहिए।"