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गुमनामी में ऐतिहासिक राम मंदिर: यादों का किस्सा बनकर रह गया मंदिर का 50 प्रतिशत हिस्सा

Sun, 18 Apr 2021 07:28 PM IST
प्रशांत कुमार पंकज मिश्रा, कठुआ
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राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
श्रीराम जन्म के बाद खुशियों से झूमती अयोध्या नगरी हो, वनवास काल के किस्से और रावण के साथ वानर सेना का युद्ध। दुर्लभ वॉल पेंटिंग में एक से बढ़कर एक दृश्यों की श्रृंखला को दर्शाती यह तस्वीर सुमवां स्थित ऐतिहासिक राम मंदिर की है, जो गुमनामी झेल रही है। शहर से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर के भवन का 50 प्रतिशत हिस्सा सिर्फ यादों का किस्सा बनकर रह गया है। 
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राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
एक सदी से भी अधिक पुरानी धरोहर सरकारी नजर-ए-इनायत की बाट जोह रही है। सदियों बाद भी रंगों में वही चमक और कूची का हुनर हर देखने वाले को भौचक करता है। मंदिर की दीवारों पर एक तरफ रामायण और दूसरी तरफ महाभारत कालीन दृश्यों की पूरी शृंखला को बखूबी उकेरा गया है। हालांकि इसके संरक्षण के लिए कद्रदान न मिलने से मंदिर की दीवारों की रौनक बढ़ाने तक ही सीमित हैं।
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राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
जम्मू-पठानकोट रूट पर आवाजाही करने के लिए पहले ओल्ड सांबा-कठुआ रोड का ही विकल्प था। सुमवां गांव इसी सड़क से सटा हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि पंजाब से जम्मू की तरफ जाते समय सुमवां गांव चूंकि उज्ज दरिया से पहले पड़ता है। इसके अलावा बड़े बड़े जमींदारों का भी सुमवां में आना-जाना लगा रहता था। इसी को ध्यान में रखते हुए मंदिर और सराय का निर्माण किया गया, ताकि मुसाफिरों को रात में ठहरने के लिए ठिकाना मिल जाए। मंदिर के मुख्यद्वार पर लिखे अक्षरों के अनुसार मंदिर का निर्माण विक्रमी संवत 1957 में शुरू हुआ, जिसे विक्रमी संवत 1962 में अंजाम तक पहुंचाया गया।

 

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राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
शोधकर्ता शिव कुमार पाधा बताते हैं कि सुमवां राम मंदिर की दीवारों पर की गई पेंटिंग दुर्लभ श्रेणी की हैं। रंगों की चमक और चित्रकला की शैली इसे कई मायने में खास बनाती है। यह विश्व प्रसिद्ध बसोहली चित्रकला सहित विभिन्न कलाओं का मिश्रण है। इसमें बसोहली के अलावा कांगड़ा, गुलेर, चंबा और राजस्थानी चित्रकला की झलक साफ दिखाई देती है। इसे दुर्लभ फ्यूजन कहा जा सकता है। वॉल पेंटिंग श्रेणी की बात करें, तो यह म्यूरल पेटिंग है, जिसे भीतरी दीवारों पर किया जाता है।

 
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राम मंदिर - फोटो : अमर उजाला
ऐतिहासिक सुमवां गांव में स्थित श्री राम मंदिर परिसर दो भागों में बंटा हुआ था। प्रवेशद्वार के हिस्से में सराय मौजूद थी तो दूसरा भाग श्रीराम मंदिर के ढांचे का है। प्रवेशद्वार वाला हिस्सा दो मंजिला है, जिसमें सराय हुआ करती थी। झरोखे, अलग-अलग कमरे मौजूद थे। रखरखाव नहीं होने की वजह से यह बुरी तरह से जर्जर होती गई तो वहीं कुछ महीने पहले गिरा दी गई। मंदिर के मुख्यद्वार पर दी गई जानकारी के अनुसार इसका निर्माण जैलदार फूला ने करवाया था जिसे जैलदार कान सिंह ने संकल्प और मंदिर स्थापना उपरांत बुल्लो पंडित के सुपुर्द कर दिया। गांव के लोग लगातार इसे संरक्षित करने की मांग करते रहे हैं।
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