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श्रीलंका से नहीं, आज के पाकिस्तान से था रानी पद्मावती का ताल्लुक, इतिहासकार का दावा

Mon, 27 Nov 2017 02:51 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
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देशभर में जहां फिल्म पद्मावती को लेकर घमासान मचा हुआ है, वहीं इतिहासकारों के बीच भी पद्मावती के अस्तित्व को लेकर विरोधाभास चल रहे हैं। आखिर पद्मावती कहां की राजकुमारी थी, इस मुद्दे को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राजस्थान सरकार के स्कूलों की किताबों में बताया गया है कि पद्मावती श्रीलंका से थी। लेकिन इतिहासकार इस बात पर गुटों में नजर आ रहे हैं। एक और इतिहासकार ने दावा किया है कि पद्मावती का नाता श्रीलंका से था ही नहीं, बल्कि राजपूताना के इतिहास के तहत वो तो जैसलमेर की राजकुमारी थी। जैसलमेर के वरिष्ठ इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा ने पद्मावती को जैसलमेर की राजकुमारी बताया है। वे इसके लिए पूरे तथ्य भी दे रहे हैं। उन्होंने बताया कि पद्मावती उर्फ पद्मिनी श्रीलंका की नहीं जैसलमेर के निवार्सित महारावल पुन्यपाल की राजकुमारी थी।
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जो सिंघल के नाम से था प्रसिद्ध, वो सिहर था

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इतिहासकार एनके शर्मा - फोटो : Amar Ujala
वरिष्ठ इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा ने बताया की सिंहल लोद्रवा के महारावल बाछुजी के दूसरे पुत्र सिंहराव ने सिंध के रोहड़ी वर्तमान में पाकिस्तान से 8 कोस की दूरी पर सिंहरार नामक कस्बा जो भाटियों ने आबाद किया था। जैसलमेर के सेवग लक्ष्मीचंद की तवारिख पृष्ठ संख्या 26 के अनुसार सिंहरावों ने 24 गांव आबाद कर खेरात में सैयद्दों को दिया था। वह आज तक उनके पास है। सिंहराव भाटियों के इस कस्बे को सिहर कहा जाता था। सिहर ही सिंहल जो सिंघल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इस क्षेत्र पर भाटियों के पूर्वजों का अधिकार था। भाटी सिद्ध रावल देवराज ने यहां पर विक्रम संवत 909 में देरावलगढ़ और राजधानी बनाया था। तवारिख पृष्ठ 23 के अनुसार देवराज ने गढ़ जालोर सोनगिरों को, देरावर भानजे दइयों को और मंडोर पड़िहारों को दिया था। नव कोटी मारवाड़ में आण फेरी थी। दूसरे गढ़ लौद्रवा, पूंगल, सातलमेर, किरोहर, भटनेर, किराड़ू, पारकर, रोहडी़, भखर खालसे रखे थे। 
 
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कई लोक गीतों में दी गई हैं पद्मिनी की उपमाएं

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वरिष्ठ इतिहासकार नंदकिशोर शर्मा ने बताया पद्मावती को श्रीलंका की राजकुमारी बताना, रतनसिंह का पद्मिनी पर मोहित हो जाना, फिर उससे विवाह का प्रस्ताव करना आदि इतिहास को जुठलाना जैसा है। पूंगल गढ़ की पद्मिनी पूगल क्षेत्र के सिंहल क्षेत्र की रहने वाली भाटियों की राजकुमारी थी। पद्मिनी जिसका पूंगल क्षेत्र में जन्म हुआ था। इसी कारण लोग उसे पूंगल की पद्मिनी कहते है। राजस्थान में कई लोक गीतों में पद्मिनी की उपमाएं दी जाती है। यदि वह लंका की होती, तो उसे श्याम वर्णी या श्याम सुंदरी कहा जाता।

सिरोही के चौहानों की दोहिती थी पद्मावती

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पुन्यपाल की पुत्री उनकी दूसरी रानी देवड़ी सिरोही के चौहानों की राजकुमारी थी। उसका नाम जामकंवर था। जैसलमेर राज्य के भाटी वंशी महारावल पुण्यपाल 1331 संवत तथा 1274 ईस्वी में जैसलमेर के राज सिंहासन पर बैठे थे। इनके पिता महारावल लखनसिंह थे। इनकी राजनैतिक अनभिज्ञता के कारण इनको देश से निकाल दिया गया था। 
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कमल के फूल की तरह सुंदर थी पद्मिनी

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जैसलमेर के उत्तर पश्चिम में स्थित देरावर के पास इनके पूर्वर्जों के राज्य सिंहरार में ये आकर रहने लगे। इस समय यह क्षेत्र पूंगल का हिस्सा था। पृष्ठ 34 के अनुसार इनके बेटे लखनसिंह का बेटा राणगंदे ने गढ़ मारोट से पूंगल भीलों से तथा मूमण ब्राह्मण लेकर वहां के राव बन बैठे। सन 1285 में पुण्यपाल की दूसरी रानी जो सिरोही के देवड़ो चौहानों की राजकुमारी थी। उसने परम सुन्दर पद्मावती को जन्म दिया। पद्मिनी पद्म कमल के समान कोमल व कमल पुष्प के समान सुंदर थी। इस समय की अतिसुंदर कन्या पद्मिनी के रूप को पूगल की पद्मिनी की उपमा देकर लोगों ने सम्मान दिया। हर सुंदर नारी की उपमा एक मुहावरा बन गई और गीतों में गाई जाने लगी।
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उस समय खिलजी का यहां था आतंक

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मलिक मोहम्म्द जायसी ने भी सिंहल लिखा है। 1955 में राजऋषि उम्मेदसिंह राठौड़ ने लिखा है कि राणा रतनसिंह का विवाह सिंहल देश की राजकुमारी पद्मिनी के साथ हुआ था। चित्तौड़ की माटी पर सन 1302 में रतनसिंह प्रथम उर्फ भोमसिंह का विवाह पद्मिनी के साथ हुआ। पद्मिनी की मां चौहान थी व पिता भाटी थे। गौरा बादल उसके चचेरे नहीं बल्कि ममेरे भाई थे। परम सुंदरी पद्मिनी के पिता ने मेवाड़ के चित्तौड़ राणा रतनसिंह के पिता समरसिंह की आज्ञा से डोला भेजकर रतनसिंह से पद्मिनी का विवाह किया था। पुण्यपाल निर्वासित थे, बदनाम थे। ऐसी स्थिति में परम सुंदरी पद्मिनी का विवाह करना बड़ा कठिन हो गया था। उस समय अलाउद्दीन खिलजी हिंदू राजकुमारियों व रानियों का अपहरण कर रहा था। ऐसी स्थिति में पूंगल के सिंहल क्षेत्र के भाटियों ने डोला भेजकर उसका विवाह 1302 ईस्वी में रतनसिंह से करवाया था।
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अपनी सतीत्व की रक्षा के लिए पद्मावती ने किया था जौहर

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अलाउदीन खिलजी द्वारा उसे प्राप्त करने का बहुत बार असफल प्रयास किया। मगर राजपूती आन बान और शान पर जौहर की ज्वाला में जलकर भाटियों के कुल गौरव और गोहिलों के स्वाभिमान के लिए अपने अस्तित्व को मिटाकर सतीत्व धर्म का पालन करने वाली पद्मावती राजपूतों की गौरव गाथा बन गई। अलाउदीन ने परम सुंदरी पद्मिनी को पाने के लिए षड़यंत्र रचकर दर्पण में उसका मुख दिखाने के बहाने दुर्ग में प्रवेश करना, धोखे से रतनसिंह को धक्का देकर गिराना और बंदी बनाकर उसके बदले पद्मिनी की मांग करने जैसी हरकतें की थीं।
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