Zakir Khan
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सिनेमा को लेकर आप हमेशा काफी सजग रहते हैं। आप कहते भी हैं कि आपका मन नहीं है सिनेमा में जाने का, ऐसी चिढ़ क्यों?
मैं आपको समझाने की कोशिश करता हूं। सिनेमा भी एक कला है। ये किसी की जागीर नहीं है। यहां कुछ लोगों ने खुद को जागीरदार समझ लिया है और कलाकार किसी का गुलाम नहीं होता। शोहरत हासिल करने के लिए सिनेमा रहा होगा किसी जमाने में इकलौता जरिया। लेकिन, आज के युवाओं को जो गायक, जो डीजे, जो कॉमेडियन सबसे ज्यादा पसंद हैं, उनमें से किसी को सिनेमा के सहारे की जरूरत नहीं है। हां, सिनेमावाले जरूर इन सबकी मदद लेते रहते हैं अपनी फिल्मों को लोगों तक पहुंचाने के लिए। मैंने सिनेमा को मना नहीं किया है लेकिन मैं सिनेमा को लेकर बेकरार नहीं हूं।
तो स्टैंड अप कॉमेडी का आपका मूल मंत्र क्या है?
हकीम कभी अपनी दवाई का नुस्खा नहीं बताता, बता देगा तो फिर हर कोई हकीम नहीं बन जाएगा। फिर भी मैं आपको बताता हूं। लोगों को हंसाना या गुदगुदाना सबसे टेढ़ी खीर है। यहां भी एहसास और जज्बात सबसे ज्यादा काम आते हैं। आपको लोगों के दिलों तक राह बनानी है। मैं अपनी कहानियां अपने आसपास से चुनता हूं। दर्शकों से रिश्ता जोड़ता हूं और फिर बीच में बिना उस बात पर जोर डाले, ऐसी बात कह देता हूं जो उन्हें याद रह जाती है। ये मां-बेटे के रिश्ते की बात हो सकती है, बाप-बेटे की आपसी समझ की बात हो सकती है, या फिर कुछ और।